इंटरनेट पर सेंसर: चीन की दिखाई राह पर चल रहा है ईरान

  • 3 जनवरी 2018
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अगर आप इस लेख को पूरा नहीं पढ़ते हैं तो आपके लिए संक्षिप्त सा जवाब है, हां. ईरान की रूहानी सरकार को पूर्व की किसी सरकार की तुलना में इंटरनेट से ज़्यादा खतरा है.

दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी ये चलन देखा गया है कि जब लोग विरोध जताने के लिए सड़क पर आते हैं तो इंटरनेट पर पाबंदियों का सिलसिला शुरू हो जाता है. अगर इस दावे की वजह समझने में आप दिलचस्पी रखते हैं तो पूरा लेख पढ़ें.

साल 2013 में जब राष्ट्रपति हसन रूहानी की जीत हुई थी तो लोगों के बीच ये उम्मीद जगी कि ईरान में इंटरनेट सुविधाओं का विस्तार होगा, लोगों की इस तक पहुंच बढ़ेगी, इंटरनेट पर सेंसरशिप कम होगी.

लेकिन सत्ता में हसन रूहानी को आए पांच साल बीत चुके हैं और उम्मीदें अब ज़मीन पर बिखरती हुई दिख रही हैं. इंटरनेट पर पाबंदियां कम होने की बात तो दूर हसन रूहानी के दूसरे कार्यकाल में ये सेंसरशिप बढ़ी ही है. इसका ताजा उदाहरण है टेलीग्राम और इंस्टाग्राम पर नई पाबंदी.

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नीति में कोई बदलाव नहीं

ईरान में मौलवियों के सत्ता में आने के उदाहरणों को देखें तो ये कहा जा सकता है कि तेहरान ने अपनी सेंसरशिप पॉलिसी में कोई बदलाव नहीं किया है. यहां तक कि अलग-अलग ऑनलाइन टूल्स और सर्विसेज़ तक लोगों की पहुंच को कई कोशिशों से रोका गया है.

लेकिन पिछली सरकारों और इस मौलवीशाही के बीच एक बड़ा फर्क देखने में आ रहा है. मौजूदा रूहानी सरकार अलग-अलग मोबाइल ऐप्स पर कंट्रोल कर रही है जबकि पिछली सरकारों ने ईरानी इंटरनेट यूजर्स को फ़ेसबुक, ट्विटर और दूसरी वेबसाइटों पर जाने से रोका था.

हसन रूहानी के कार्यकाल में इससे पहले मैसेजिंग ऐप वीचैट पर भी पाबंदी लगाई गई थी. नीति और पाबंदी वाले प्लेटफॉर्म में आए इस बदलाव की एक वजह दिखती है कि मोबाइल फोन के इस्तेमाल का चलन बढ़ा है. 3जी और 4जी सेवाएं शुरू हुई हैं. लोग घर के बाहर भी इंटरनेट का इस्तेमाल अपने मोबाइल फोन पर करने लगे हैं.

ईरान के अलग-अलग सरकारी महकमें कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं लेकिन इस पर नज़र भी रखी जाती है और नज़दीकी भविष्य में इसमें कमी आने की कोई संभावना नहीं है.

रूहानी सरकार और पिछली सरकारों की इंटरनेट नीति को देखें तो एक बात कही जा सकती है कि मौजूदा सेंसरशिप पॉलिसी पहले से ज्यादा जटिल हो गई है. रूहानी सरकार इंटरनेट यूजर्स के बर्ताव में बदलाव लाने की कोशिश करती हुई दिख रही है.

इस मक़सद से ऐसी कोशिशें की जा रही हैं कि ईरानी लोग केवल ईरान में बने डिवाइस इस्तेमाल करें और इंटरनेट पर केवल ईरानी वेबसाइट्स देखें.

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इंटरनेट ट्रैफिक मैनेजमेंट

ईरान की सरकार टेलीकॉम सर्विस मुहैया कराने वाली कंपनियों के साथ मिलकर कुछ इस तरह का ढांचा तैयार करने की कोशिश कर रही है, जिससे इंटरनेट यूजर्स केवल ईरानी वेबसाइटों पर जाना पसंद करें. इसके लिए उन्हें इंटरनेट बैंडविथ बचाने का प्रलोभन दिया जा रहा है.

इसके लिए जरूरी है कि इंटरनेट से जुड़ी इंटरनल सर्विसेज (यानी आंतरिक सेवाओं) का ढांचा तैयार करना. इसका मॉडल चीन पर आधारित है. सरकार चाहती है कि आने वाले समय में लोग ग़ैर-ईरानी वेबसाइटों पर जाने के बजाय घरेलू ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स का ज्यादा इस्तेमाल करें और इससे सूचनाओं के प्रवाह पर उनका नियंत्रण बना रहे.

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चीन अपने यहां इसे कामयाबी से लागू कर चुका है. ईरान चीन की दिखाई राह पर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है. इस सिलसिले में दो उदाहरण लिए जा सकते हैं. ईरान ने यूट्यूब के देसी वर्जन की शुरुआत की है और टेलीग्राम की जगह पर मोबाग्राम लाया गया है.

फारसी भाषा वाले चैटिंग ऐप मोबोग्राम में ईरान की सरकार का दखल कुछ ऐसा है कि वो अपनी सुविधा और पसंद के हिसाब से इसके कंटेंट को हटा सकती है या इसे ब्लॉक कर सकती है.

इसे दूसरे लफ्जों में कुछ इस तरह से कहा जा सकता है कि वैसे कंटेंट हटाए जा सकते हैं जो ईरान सरकार के नज़रिए से मेल नहीं खाते हों या फिर सरकार को वो ग़ैरवाजिब लगे.

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नेशनल इंफोर्मेशन नेटवर्क

इसी कड़ी में ईरान की नेशनल इंफोर्मेशन नेटवर्क का नाम लिया जाता है. इसे नेशनल इंटरनेट के नाम से भी जाना जाता है. सरकार का साइबर क्राइम मैनेजमेंट इसी का हिस्सा है और बीते सालों में इसे 'हलाल इंटरनेट' या 'इंटरनेट क्लीनर' के तौर पर पेश किया गया है.

नेशनल इंटरनेट लोगों को कुछ सेवाएं मुफ्त में मुहैया कराता है ताकि लोग इस पर ज्यादा से ज्यादा वक्त गुजार सकें और उन्हें लगे कि इससे उनका खर्च कम हो रहा है. नेशनल इंफोर्मेशन नेटवर्क सरकार की दोनों इटरनेट पॉलिसी का बुनियादी ढांचा है.

हकीकत तो ये है कि अतीत की किसी भी सरकार के बनिस्बत रूहानी सरकार इंटरनेट से सबसे ज्यादा खतरा महसूस कर रही है. इसकी वजहें साफ़ हैं. सरकार यूजर्स का बर्ताव बदलना चाहती है और इंटरनेट की दुनिया के बारे में उनकी सोच भी.

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