'भूख से बेहाल क़ैदियों को पौधे खाने पर मार दिया'

  • 12 जनवरी 2018
थॉमस को 11 साल की उम्र में नाज़ी यातना कैंप से छुड़ाया गया, यहां थॉमस उस जवान के साथ नज़र आ रहे हैं जिसने उनके यहूदी होने का पता लगने पर उन्हें एक अनाथाश्रम पहुंचाया इमेज कॉपीरइट Thomas Buergenthal
Image caption थॉमस को 11 साल की उम्र में नाज़ी यातना कैंप से छुड़ाया गया, यहां थॉमस उस जवान के साथ नज़र आ रहे हैं जिसने उनके यहूदी होने का पता लगने पर उन्हें एक अनाथाश्रम पहुंचाया

"मुझे याद है एक क़ैदी किसी गार्ड के बच्चे की मां बनने वाली थी... उसके साथ क्या हुआ यह मैं कभी नहीं भूल सकता."

थॉमस बरगेनथाल सोच में डूबे हुए बोल रहे हैं, "बच्चे से छुटकारा पाने के कई तरीके आज़मा रहे उन लोगों ने उस औरत के पेट पर एक बोर्ड रखा और उस पर तब तक कूदते रहे जब तक बच्चा मर नहीं गया."

यह घटना किसी नाज़ी कैंप की नहीं बल्कि उत्तर कोरिया के एक जेल की है.

"वहां बहुत सी दिल दहलाने वाली घटनाएं होती थीं लेकिन इसे बयां करना मुश्किल है."

थॉमस के ये शब्द उनके उस अतीत का दरवाज़ा खोलते हैं, जिसे भुलाना नामुमकिन है.

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Image caption एक सोवियत फ़िल्म से ली गई तस्वीर जिसमें 1945 में आउशवित्ज़ कैंप में मिले बच्चे नज़र आ रहे हैं

हिटलर के यातना शिविर

नाज़ियों के दो यातना कैंप आउशवित्ज़ और ज़ेक्सनहाउज़ेन में बंदी रहे थॉमस यहूदियों के सामूहिक नरसंहार (होलोकॉस्ट) के भुक्तभोगी भी रहे हैं.

लेकिन उन्हें उत्तर कोरिया की जेल हिटलर के यातना कैंपों से भी ख़तरनाक लगती हैं.

थॉमस बरगेनथाल कहते हैं, "मैं ये देखकर हैरान रह गया कि उत्तर कोरिया की जेल में होने वाली कुछ घटनाएं जर्मनी के नाज़ी यातना गृहों से भी बुरी हैं."

लेकिन नाज़ियों के अत्याचार से बुरा क्या हो सकता है?

थॉमस का जवाब तैयार है, "नाज़ियों के यातना कैंप संगठित तरीक़े से बनाई गई किलिंग मशीन की तरह थे. वहां गार्ड ज़्यादातर वही करते थे जो उन्हें करने के लिए कहा जाता था. वे आदेश का पालन करते थे. लेकिन उत्तर कोरिया में गार्डों को मनचाहा करने की पूरी आज़ादी है. सोचिए ऐसी जगहों में क्या होता होगा? वहां अगर किसी ने शासन के ख़िलाफ़ कुछ कह दिया तो सिर्फ़ वह शख़्स ही नहीं, उसकी पूरी तीन पीढ़ियां भी जेल में डाल दी जाती हैं. असली फ़र्क यही है कि उत्तर कोरिया में जो भी भयानक चीज़ें हो रही हैं वो ज़्यादातर अनुशासन और संगठन की कमी की वजह से है."

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Image caption एडोल्फ़ हिटलर 28 जनवरी 1933 को जर्मनी के चांसलर बने

हिटलर के सत्ता में आने के बाद

थॉमस बरगेनथाल आगे बताते हैं, "जर्मनी के यातना कैंप में हर रोज़ लोगों को गैस चेम्बर में डाला जाता था. जो हुआ वो भयानक था लेकिन कम से कम सबको पता होता था कि क्या होने वाला है. यहां उत्तर कोरिया में गार्ड बिल्कुल अनुशासित नहीं हैं. ऐसे में हत्यारे शासन के साथ मिलकर उनका जैसा मन चाहे, वे लोगों के साथ वैसा सुलूक करते हैं."

थॉमस के माता-पिता यहूदी थे और जर्मनी में रहते थे. 1933 में हिटलर के सत्ता में आने के बाद थॉमस का परिवार उस समय के चेकोस्लोवाकिया चला गया.

थॉमस का जन्म 11 मई 1934 को वहीं के लुबोकना शहर में हुआ. जर्मनी में थॉमस के पिता बैंक में काम करते थे लेकिन चेकोस्लोवाकिया में उन्होंने एक होटल खोल लिया जिसमें हिटलर की नीतियों से आजिज़ आकर भागे बहुत से लोग रहे.

लेकिन हिटलर की ताक़त और पहुंच बढ़ती गई और 1938 में थॉमस के पिता के होटल पर स्थानीय सेना ने कब्ज़ा कर लिया.

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Image caption 13 महीने के थॉमस अपने पिता मुंडेक बरगेनथाल के साथ, यह तस्वीर जून 1935 में चेकोस्लोवाकिया में ली गई

ज़ेक्सनहाउज़ेन कैंप

सितंबर 1939 में थॉमस बरगेनथाल के परिवार को एक ट्रेन पकड़कर वहां जाना था जहां से एक जहाज़ ब्रिटेन रवाना होने वाला था लेकिन जर्मन सेना ने पोलैंड पर हमला कर दिया और उस ट्रेन को भी बम से उड़ा दिया गया.

थॉमस के परिवार को बतौर शरणार्थी एक घेटो और उसके बाद एक मज़दूर कैंप में भेज दिया गया.

थॉमस ने बताया, "1944 में मुझे माता-पिता के साथ आउशवित्ज़ भेज दिया गया."

वहां से थॉमस को ज़ेक्सनहाउज़ेन कैंप भेजा गया जहां से अप्रैल 1945 में सोवियत सेना ने उन्हें छुड़ाया.

तक़रीबन 11 साल के थॉमस को वहां से पोलैंड के एक अनाथाश्रम भेज दिया गया जहां 1946 में उन्हें उनकी मां मिल गई.

17 साल की उम्र में थॉमस अमरीका चले गए. वहां उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से पढ़ाई की.

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Image caption 1951 में अमरीका जाने से पहले अपनी मां के साथ थॉमस

उत्तर कोरिया की जेल

यहां से शुरू हुआ थॉमस बरगेनथाल का सफ़र इंटर-अमरीकी मानवाधिकार कोर्ट से होते हए संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय कोर्ट ऑफ़ जस्टिस तक पहुंचा. हेग की इस कोर्ट में थॉमस दस साल तक जज रहे.

थॉमस ने दो और जजों के साथ मिलकर उत्तर कोरिया की जेल में चल रही बर्बरता पर 'इंवेस्टीगेशन ऑफ़ क्राइम्स अगेंस्ट ह्यूमैनिटी इन द पॉलिटिकल प्रिज़न्स ऑफ़ नॉर्थ कोरिया' नाम की रिपोर्ट तैयार की जो दिसंबर में सामने आई.

इस रिपोर्ट को बनाने के लिए ज्यूरी ने 2016 में उत्तर कोरिया छोड़कर आए कई लोगों के बयान सुने. इनमें कई राजनीतिक बंदी, एक बहुत ऊंचे पद पर रहे अधिकारी और एक गार्ड भी शामिल हैं. इन लोगों ने उत्तर कोरिया में चल रही बर्बरता को या तो ख़ुद देखा है या उसे भोगा है.

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Image caption थॉमस दस साल तक इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस में जज रहे.

थॉमस बरगेनथाल की रिपोर्ट

ज्यूरी को इस मामले में 2014 में आई संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की एक रिपोर्ट से भी मदद मिली. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में कहा गया है कि "वहां ऐसे अत्याचार होते हैं जिन्हें बताया भी नहीं जा सकता. इसमें टॉर्चर, यौन हिंसा और ज़बरदस्त राजनीतिक दमन शामिल हैं."

जेनेवा में बीबीसी संवाददाता इमोजेन फ़ोक्स के मुताबिक़ "यह संयुक्त राष्ट्र की उत्तर कोरिया पर छापी गई सबसे विस्तृत और दिल दहलाने वाली रिपोर्ट है."

थॉमस बरगेनथाल की रिपोर्ट में सामने आई जानकारी भी कम ख़ौफ़नाक नहीं है.

थॉमस बताते हैं, "वहां के हालात पर यक़ीन करना मुश्किल है. उनके यहां चार बड़ी जेल हैं जिसमें एक लाख से भी ज़्यादा लोगों को बेहद खराब हालात में रखा गया है."

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Image caption थॉमस बरगेनथाल इस समय जॉर्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में क़ानून के प्रोफेसर हैं

इस रिपोर्ट में सामने आई कुछ अहम बातें

  • भूख से बेहाल कैदियों को इसलिए मार दिया गया क्योंकि वे ज़मीन खोदकर खाने लायक पौधे निकालने की कोशिश कर रहे थे.
  • एक क़ैदी ने मकई चुरा ली. डर के मारे उसने मकई को मुंह में छिपा लिया लेकिन उसे इतना मारा गया कि उसकी मौत हो गई.
  • वहां नियमित रूप से सार्वजनिक तौर पर क़ैदियों को मारा जाता है. इस दौरान बच्चे भी वहां मौजूद रहते हैं.
  • वहां जानबूझकर क़ैदियों को भूखा रखा जाता है, ज़्यादा काम करवाया जाता है और जबरन गर्भ गिरा दिए जाते हैं.
  • एक सुरक्षा अधिकारी ने बंदी महिला के साथ बलात्कार किया, उसे पीटा और फिर उसकी योनि में लकड़ी का डंडा डाल दिया. कुछ दिन बाद महिला की मौत हो गई.

रिपोर्ट में कहा गया है कि 'रोम समझौते में मानवता के ख़िलाफ़ किए जाने वाले जिन 11 अपराधों को शामिल किया गया है, उत्तर कोरियाई नेतृत्व के उनमें से दस जुर्म करने के सुबूत हैं. रंगभेद अकेला ऐसा जुर्म है जिसे करने के सुबूत नहीं मिले हैं.'

ग़ौरतलब है कि अंतरराष्ट्रीय क्रिमिनल कोर्ट इन्हीं 11 ग़ुनाहों की सुनवाई करता है.

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Image caption नाज़ियों के आउशवित्ज़ कैंप का उस वक़्त का नज़ारा जब सोवियत सेना वहां दाख़िल हुई

एमनेस्टी इंटरनेशनल

थॉमस बरगेनथाल बताते हैं कि कुछ लोगों को तो ये सब सिर्फ़ इसलिए झेलना पड़ा कि उन्होंने दक्षिण कोरिया का एक रेडियो स्टेशन सुन लिया था, "यही उनका संगीन जुर्म था."

उत्तर कोरिया अपने यहां ऐसी कोई भी राजनीतिक जेल होने से इंकार करता रहा है.

लेकिन 2016 में एमनेस्टी इंटरनेशनल ने दावा किया कि इलाक़े की सैटेलाइट तस्वीरों में साफ़ नज़र आता है कि न सिर्फ़ ऐसे कैंप हैं बल्कि उत्तर कोरिया का प्रशासन वहां मरम्मत का काम भी करवाता है.

2014 में संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट आने के बाद उत्तर कोरिया ने ख़बरिया एजेंसी रायटर्स को दिए एक बयान में कहा कि "वह साफ़ तौर पर पूरी तरह इन दावों को ख़ारिज करता है."

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Image caption उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग-उन

उत्तर कोरियाई नेतृत्व

ऐसे में थॉमस बरगेनथाल अपनी रिपोर्ट से क्या बदलाव आता देखते हैं?

"मैं बस यह चाहता हूं कि लोग इस रिपोर्ट को पढ़ें, मुझे उम्मीद है कि चीज़ें बेहतर हों. मेरा इरादा इस रिपोर्ट के ज़रिए कोई जंग छेड़ना नहीं है. अगर उत्तर कोरियाई नेतृत्व को लगे कि सारी दुनिया को पता चल गया है कि वहां क्या हो रहा है तो हो सकता है कि वे हालात बदलने के लिए कुछ करें."

लेकिन थॉमस एक ऐसे काम में समय क्यों लगा रहे हैं जो उन्हें उनके दर्दनाक अतीत की याद दिलाए?

"मैं क़िस्मत से बच गया. लेकिन मेरे पिता और दादा-दादी नहीं बच सके. अब मुझे लगता है कि ये मेरी उनके प्रति ज़िम्मेदारी बनती है. ऐसे सभी लोग जो बचकर निकल गए, उनकी ज़िम्मेदारी बनती है कि वे बाक़ी लोगों की रक्षा करें ताकि उन्हें वो ना भुगतना पड़े, जो हमने भुगता."

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