पाकिस्तान के इनकार से अमरीका को कितनी मुश्किल होगी?

  • हारून रशीद
  • बीबीसी उर्दू, इस्लामाबाद
पाकिस्तान, अमरीका

पाकिस्तान के दो केंद्रीय मंत्रियों ने घोषणा की है कि ट्रंप प्रशासन की तरफ़ से सैनिक सहायता बंद करने के जवाब में उन्होंने अमरीका से खुफिया जानकारी शेयर करने पर रोक लगा दी है.

ऐसे में ये सवाल उठना लाज़िमी है कि मौजूदा हालात में दोनों देशों के बीच कितनी खुफिया जानकारी का आदान-प्रदान हो रहा था और वो किस किस्म की थी, उसकी क्वॉलिटी क्या थी? क्या ये कदम अमरीका के लिए परेशानी का सबब बन सकता है?

विशेषज्ञों का मानना ​​है कि इस ऐलान का सांकेतिक महत्व ज्यादा है. पाकिस्तान और अमरीका के बीच खुफिया जानकारी साझा करने का एक लंबा इतिहास रहा है.

अफगानिस्तान में तत्कालीन सोवियत संघ से जंग के पहले शीत युद्ध के दौरान पेशावर के एयरफोर्स कैंप में 1959 में अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने सोवियत संघ के ख़िलाफ़ खुफिया पोस्ट कायम किया था. ये पाकिस्तान और अमरीका के खुफिया संबंधों का पहला गवाह है.

अमरीका की ज़रूरत

इसके बाद सोवियत संघ ने जब 1979 में अफगानिस्तान की ओर रुख किया तो दोनों देशों (पाकिस्तान और अमरीका) की खुफिया एजेंसियों ने संयुक्त रूप से अगले दो दशकों तक ऑपरेशन 'मुजाहिदीन' प्रोजेक्ट चलाया और आखिरी जानकारी तक ये प्रोजेक्ट 'तालिबान सरकार को खत्म करने' के बाद से लेकर आज तक जारी है.

अमरीकी लेखक और नॉर्थ कैरोलाइना यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर जेम्स इगोय वॉल्श ने अपनी किताब 'द इंटरनेशनल पॉलिटिक्स ऑफ़ इंटेलिजेंस शेयरिंग' में लिखा है कि अमरीका को पाकिस्तान जैसे देशों से दो प्रकार गोपनीय जानकारी की जरूरत होती हैं.

प्रोफेसर जेम्स इगोय वॉल्श के मुताबिक़, "पश्चिम में सक्रिय कई चरमपंथी संगठनों के समर्थक, उन्हें वित्तीय सहायता देने वाले और इन संगठन के सक्रिय कार्यकर्ता पाकिस्तान जैसे देशों से संबंध रखते हैं या वहीं रहते हैं. इन देशों की स्थानीय खुफिया एजेंसियों के पास ऐसे लोगों के बारे में जानकारी इकट्ठी करने के लिए जरूरी स्टाफ़ होता है, उनके पास कल्चरल और भाषाई समझ होती और ऐसा करने के लिए उनकी कानूनी हैसियत भी होती है."

वे यह भी कहते हैं कि चूंकि ऐसे देश कोई बहुत अधिक लोकतांत्रिक नहीं होते तो उसका लाभ भी अमरीका को होता है.

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अमरीका और पाकिस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन और हिना रब्बानी खार

ह्यूमन इंटेलीजेंस

नाइन इलेवन के बाद पाकिस्तान के कबायली इलाके फाटा में बड़ी संख्या में अलकायदा और अफ़गान तालिबान के लड़ाके सक्रिय थे. पाकिस्तान और अमरीका के बीच हालिया दौर का इंटेलीजेंस शेयरिंग इसके बाद शुरू होता है.

उन दिनों के बारे में फाटा (पाकिस्तान का फेडरली एडमिनिस्टर्ड एरिया) में आईएसआई के पूर्व अफसर ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) असद मुनीर ने बीबीसी को बताया कि पाकिस्तान के पास बेहतर ह्यूमन इंटेलीजेंस था जबकि तकनीकी जानकारी के मामले में अमरीका बेहतर स्थिति में था.

असद मुनीर कहते हैं, "सिर्फ तकनीकी जानकारी के सहारे खुफिया सूचना हासिल करना हर समय आसान नहीं होता है. अगर कोई भी टेलीफोन पर बात ही नहीं करे तो टेक्नीकल इंटेलीजेंस वहां पर काम ही नहीं करेगा. ऐसे मामलों में अमरीका को ह्यूमन इंटेलीजेंस हासिल नहीं हो पाएगी. वैसे इस किस्म की इंटेलीजेंस शेयरिंग अब काफी कम हो गई है."

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पाकिस्तान की निशानदेही क्यों कर रहे हैं अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप?

ओसामा की मौत

हालांकि 1993 के वर्ल्ट ट्रेड सेंटर पर हुए हमले में कथित तौर पर शामिल रामज़ी यूसुफ को 1995 में और फिर सीआईए अधिकारी की हत्या में संदिग्ध मीर अमल कांसी को 1997 में पाकिस्तान ने अमरीका के हवाले कर दिया था. लेकिन इस सहयोग के नतीजे में होने वाली गिरफ्तारियों में नाइन इलेवन के बाद और इजाफा हुआ.

खालिद शेख मोहम्मद (ओसामा बिन लादेन के बहनोई) को रावलपिंडी से 'टेलिफोन सर्विलेंस सॉफ़्टवेयर' की मदद से गिरफ्तार किया गया. साल 2004 में लाहौर से मोहम्मद नईम नूर खान और एक साल बाद मरदान से अबू फराज अलवी भी इस सहयोग के नतीजे में गिरफ्तार हुए थे. ये सिलसिला लंबे समय तक चलता रहा.

ओसामा बिन लादेन की मौत भी दोनों देशों के बीच खुफिया जानकारी के आदान-प्रदान का ही परिणाम था. ओसामा के बेहद करीबी समझे जाने वाले अल कुवैती की टेलीफोन कॉल पाकिस्तान ने ट्रेस कर ली लेकिन कार्रवाई बाद में अमरीका ने की.

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'पाकिस्तान-अमरीका में दूरियां बनी रहेंगी'

अलकायदा और तालिबान

फिर अमरीका ने अपने ही मालूमात के आधार पर मुल्ला अख्तर मंसूर और कई दूसरे चरमपंथियों को ड्रोन अटैक में मार गिराया. अमरीका ने पाकिस्तान को बताए बिना उसकी ज़मीन पर ये ड्रोन हमले किए थे. ऐसे में ये सवाल उठता है कि राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाने अभी ही फैसला क्यों किया?

आम धारणा ये है कि दोनों देशों के बीच इस क्षेत्र में चरमपंथियों से निपटने के लिए ज्यादा सहयोग नहीं हो रहा है.मौजूदा हालात में अमरीका और अन्य पश्चिमी देशों को दरअसल खुद को इस्लामिक स्टेट कहने वाले चरमपंथी संगठन से मुकाबला करना पड़ रहा है और पाकिस्तान में इस्लामिक स्टेट का कोई ख़ास असर नहीं है.

असद मुनीर कहते हैं कि जहां तक अलकायदा और तालिबान का खतरा था, तो उनकी एक बड़ी संख्या पाकिस्तान में रहती थी. उस वक्त अमरीका का काम पाकिस्तान के बगैर नहीं चल सकता था. उनको मालूम है कि तालिबान और अलकायदा और आईएमयू जैसे चरमपंथी संगठनों के लोग अब अफगानिस्तान में हैं.

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"अमरीका हमसे सीखे दहशतगर्दी कैसी रोकी जाए"

पाकिस्तान और अमरीका

उन्हें शायद ये लगता होगा कि चूंकि पाकिस्तान में अब इऩकी कोई ज्यादा तादाद नहीं रही,, इसलिए उन्हें पाकिस्तान की पहले जैसी ज़रूरत नहीं रही. पाकिस्तान और अमरीका के बीच इंटेलीजेंस शेयरिंग कोई पहली बार नहीं रोकी गई है. इससे पहले रेमंड डेविस और सलाला की घटना के बाद काफी समय तक ये सहयोग रुक गया था.

असद मुनीर कहते हैं कि ऐसी ऊंच-नीच होती रहती है और दोनों देशों के बीच किसी न किसी स्तर पर बातचीत जारी होगी और उसे जल्द ही हल कर लिया जाएगा.

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