कोई 11 दिन 25 मिनट बिना सोए कैसे रह सकता है?

  • 15 जनवरी 2018
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Image caption नींद की कमी रैंडी गार्डनर की बास्केटबॉल खेलने की क्षमता पर असर नहीं डाल सकी.

एक अच्छे दिन की शुरुआत के लिए कम से कम आठ घंटे की नींद ज़रूरी मानी जाती है, लेकिन ज़्यादा से ज़्यादा कोई कितना जाग सकता है. एक दिन, दो दिन.... या फिर उससे भी ज़्यादा क्या!

लेकिन 60 के दशक में दो अमरीकी छात्रों ने 11 दिन 25 मिनट बिना सोए बिताए. रेंडी गार्डनर और ब्रूस मेकएलिस्टर ने रिकॉर्ड बनाने और स्कूल के लिए वैज्ञानिक प्रयोग करने के लिए ऐसा किया.

उस समय वैज्ञानिक इस सवाल का जवाब तलाश रहे थे कि कोई भी इंसान बिना सोए कितने समय तक रह सकता है. और बिल्कुल इसी वक्त कई लोग बिना सोए ज़्यादा से ज़्यादा वक्त तक रहने का गिनीज़ रिकॉर्ड भी बनाने की कोशिश कर रहे थे.

रैंडी, जिनकी उम्र उस वक्त महज़ 17 साल थी, वो होनोलुलु के एक डीजे का रिकोर्ड तोड़ना चाहते थे. उस डीजे ने 260 घंटे यानी कुल 11 दिन बिना सोए बिताए थे.

आख़िरकार रैंडी ये रिकोर्ड तोड़ना में कामयाब रहे. उन्होंने 11 दिन और 25 मिनट बिना नींद के बिताए.

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Image caption सांकेतिक तस्वीर

बिना सोए रहने का अनुभव

बीबीसी संवाददाता लुसी बर्न्स ने प्रयोग के दौरान मौजूद रहे दो लोगों से बात की. उनमें से एक हैं ब्रुस मेकएलिस्टर, जो बताते हैं कि वो "बहुत ही रचनात्मक" युवा थे जो नींद को लेकर किए जा रहे वैज्ञानिक प्रयोग का हिस्सा बनना चाहते थे.

शुरुआत में हम असाधारण क्षमताओं में नींद की कमी का असर देखना चहते थे, लेकिन हमें अहसास हुआ कि ऐसा करने का कोई तरीका नहीं है. फिर हमने ज्ञान संबंधी क्षमताओं पर नींद की कमी का असर देखने का फैसला किया.

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एक युवा अपने साथी की गतिविधियों की निगरानी के लिए जाग रहा था. लेकिन तीसरी रात के बाद ही उसे अहसास हो गया कि वो ये नहीं कर पाएगा, उसने अपने एक अन्य दोस्त जो मार्सीनो को साथ आने को कहा.

इस प्रयोग को ब्रूस के माता-पिता के घर सैन डिएगो में किया गया.

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वैज्ञानिक देखरेख

विलियम डीमेंट भी ग्रुप में शामिल हो गए. वो आज कैलिफोर्निया में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर एमेरिटस के तौर पर कार्यरत हैं. 1964 में वो एक वैज्ञानिक थे जो एक नए क्षेत्र: द साइंस ऑफ स्लिप यानी नींद के विज्ञान पर काम करने की तैयारी कर रहे थे.

प्रोफेसर डीमेंट ने युवा लड़कों के बारे में सैन डिएगो के अखबार में पढ़ा था.

डिमेंट बताते हैं कि उनके ग्रुप का हिस्सा बनने पर लड़कों ने राहत की सांस ली. "उन्हें डर था कि वो कुछ ऐसा कर रहे हैं जिससे उन्हें नुकसान हो सकता है. ये सवाल अब भी अनसुलझा है कि क्या ज़्यादा देर तक ना सोने पर इंसान की मौत हो सकती है."

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बिल्लियों के साथ एक प्रयोग किया गया था, लेकिन 15 दिन बिना सोए रहने के बाद उनकी मौत हो गई. अंतर ये था कि उन्हें रसायनों की मदद से जगाया गया था.

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मुश्किल वक्त

रात का समय सबसे मुश्किल था क्योंकि उनके पास करने के लिए ज़्यादा चीज़े नहीं थीं. दिन में वो बास्केटबॉल खेलकर एक्टिव रहते थे.

इस दौरान युवाओं को अलग-अलग स्वाद चखाए गए, गंध सुंघाई गई और आवाज़ें सुनाई गई. ब्रूस बताते हैं, "इसके बाद हमने बदलाव नोटिस करने शुरू किए. देखा गया कि इनकी ज्ञान संबंधि क्षमताओं पर असर पड़ने लगा, लेकिन बास्केटबॉल खेलने की उनकी क्षमता बेहतर हुई थी."

11 घंटे 25 मिनट का रिकोर्ड पूरा करने के बाद रैंडी लगातार 14 घंटे सोए. और वो तब उठे जब उन्हें बाथरूम जाना था.

दिन बितने के साथ उनके सोने का पैटर्न सामान्य हो गया. शुरू में तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई, लेकिन बाद में उन्होंने नींद ना आने की शिकायत की.

ब्रूस बताते हैं कि इस प्रोजेक्ट से विज्ञान में कुछ सीखें मिली.

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एरिज़ोना अस्पताल ने एक कम्प्यूटर भेजा था, जो पता लगा रहा था कि रैंडी का मस्तिष्क उस स्थिति में कैसे काम कर रहा है.

इस घटना ने मीडिया का काफी ध्यान खींचा था. राष्ट्रपति जॉन कनेडी की हत्या और बीटल्स के दौरे के बाद अमरीकी मीडिया में छाने वाली ये तीसरी सबसे लोकप्रिय खबर थी.

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