ब्रिटेन: एक मंदिर की अपील, हिंदू करें अंगदान

  • 28 जनवरी 2018
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Image caption लंदन का श्री स्वामीनारायण मंदिर

ब्रिटेन के सबसे बड़े मंदिरों में से एक मंदिर ने हिंदुओं से अपील की है कि वो अपने अंगदान करें.

ब्रिटेन में एशियाई मूल के लोगों में अंगदान एक बड़ी समस्या है.

इस मंदिर का कहना है कि शास्त्रों में अंगदान नहीं करने से संबंधित कोई उल्लेख नहीं मिलता है, इसलिए हिंदुओं को अंगदान करना चाहिए.

लंदन के सबसे बड़े मंदिर द बेप्स श्री स्वामीनारायण मंदिर में 50 लोग एकत्र होते हैं.

ये लोग यहां पूजा अर्चना के लिए नहीं बल्कि एक दूसरे से अंगदान के बारे में बात करने के लिए इकट्ठा हुए हैं.

हिंदुओं में अंगदान करने को लेकर कुछ गलतफहमियां हैं. इन गलतफहमियों को दूर करने के लिए मंदिर ने इन लोगों के साथ बैठक की है.

लंदन के इस मंदिर के प्रमुख पुजारी योगविवेक दास ने कहा, "हिंदू धर्म में किसी को ज़िंदगी का तोहफा देना या लोगों की जीने में मदद करने को भी दान माना गया है."

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'अंगदान नहीं है संस्कृति का हिस्सा'

सौजन्य (बदला हुआ नाम) लंदन के फेलथम में रहते हैं.

वो कहते हैं, "हम एशियाई लोग अपने रिवाज़ों में बहुत यकीन रखते हैं. हमारे धर्म में कहते हैं कि अंगदान नहीं करना चाहिए क्योंकि हम स्वर्ग में यकीन करने वाले लोग हैं. ऐसे में हमें अंगदान को लेकर हैरत होती है और ये हमारी संस्कृति का हिस्सा भी नहीं है."

सौजन्य की ये राय आंकड़ों से भी मेल खाती है.

साल 2017 में ब्रिटेन में क़रीब एक हज़ार एशियाई मूल के लोग अंग प्रत्यारोपण का इंतज़ार कर रहे थे.

इनमें से बड़ी संख्या ऐसे लोगों की थी, जो किडनी ट्रांसप्लांट के इंतज़ार में थे.

इस साल 79 एशियाई लोगों ने किडनी दान की और 29 लोगों ने मौत के बाद अंगदान करने का विकल्प चुना.

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ब्लैक, एशियन और अन्य अल्पसंख्यक

नेशनल हेल्थ सर्विस के मुताबिक, साल 2015 में अंग प्रत्यारोपण न होने पर 466 मरीज़ों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी और 881 लोगों का नाम अंग प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा सूची से हटाया गया था.

इनमें से काफी लोगों की कुछ वक्त बाद ही मौत हो गई थी. लेकिन यहां अल्पसंख्यकों के बीच किडनी की मांग औसत से काफी ज़्यादा है.

नेशनल हेल्थ सर्विस (बीएएमई) के मुताबिक, कि़डनी ट्रांसप्लांट का इंतज़ार कर रहे लोगों में 34 फीसदी लोग बीएएमई हैं.

बीएएमई यानी ब्लैक, एशियन और अन्य अल्पसंख्यक. ये कुल जनसंख्या के 11 फीसदी हैं.

अंगदान के लिए सामान नस्ल के लोगों की ज़रूरत ही क्यों होती है? इस सवाल का जवाब एनएचएस की वेबसाइट में समझाया गया है.

एनएसएस की वेबसाइट के ब्यौरे के मुताबिक, "एक सफल प्रत्यारोपण के लिए ख़ून और मांस की किस्मों का मिलना ज़रूरी है. अगर अंग दान करने वाला और अंग लेने वाला शख्स एक ही नस्ल से हो, तो ये ज़्यादा बेहतर रहता है."

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Image caption कीर्ति अपनी पत्नी मीना के साथ

कीर्ति की आपबीती

अंगदान के लिए लोगों के बीच जागरूकता फ़ैलाने वाले लोगों में से एक कीर्ति मोदी हैं. बीबीसी से ख़ास बातचीत में कीर्ति कुछ साल पहले क्रिसमस की आपबीती बताते हैं.

ये उस साल की बात है, जब कीर्ति अस्पताल में थे और उनकी दोनों किडनी फेल हो गई थीं.

वो बताते हैं, "जिन लोगों की किडनी फेल हो जाती हैं, उन लोगों के पास सिर्फ दो विकल्प होते हैं. या तो डायलिसिस पर ज़िंदा रहें या फिर किसी डोनर से अंगदान करवाएं."

उस वक्त में कीर्ति के परिवार ने एक ऐसा डोनर खोजना शुरू किया, जो किडनी दान कर सके. कीर्ति के भाई की सेहत अच्छी नहीं थी, ऐसे में वो किडनी नहीं दे सकते थे.

तब कीर्ति की पत्नी मीना ने अपनी किडनी दान की और उनकी जान बच सकी.

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'ज़िंदगी देना, सबसे बेहतर तोहफा'

कीर्ति कहते हैं, "ज़िंदा रहते हुए अपनी एक किडनी दान करने का मतलब ये है कि दोनों लोगों की सर्जरी एक साथ की जाएगी. इस सर्जरी के जो ज़ोखिम होते हैं, उस पर भी सोचना होता है. अंग प्रत्यारोपण सफल रहेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है. किसी मृतक की किडनी से काफी बेहतर किसी ज़िंदा डोनर की किडनी लेना होता है."

सर्जरी के कुछ दिनों के भीतर ही कीर्ति और मीना की हालत में सुधार होता है. दोनों आज स्वस्थ जीवन गुज़ार रहे हैं.

कीर्ति की पत्नी मीना कहती हैं, "मेरा किडनी दान करना कीर्ति के लिए ज़रूरी थी. ये मेरी बेटियों और मेरे लिए भी अच्छा था. मुझे कभी भी इस बात का अफसोस नहीं हुआ. मैंने अपनी ज़िंदगी में जो अच्छे काम किए हैं, ये उनमें से एक है."

वो कहती हैं, "अपने दिल में ये जानती थी कि अपने परिवार के लिए मैं ये अच्छा काम कर रही हूं. इस तरह से कीर्ति की तबीयत भी सही हो गई. बहुत सारे लोग अंग प्रत्यारोपण के लिए रजिस्टर होने के इंतज़ार में अपना वक्त बिता देते हैं. कुछ लोगों ने तीन से चार साल तक इंतजार किया है. इतने दिनों में हालत काफी ख़राब हो जाती है."

अब ये जोड़ा एशिया मूल के लोगों के बीच अंग दान करने को लेकर जागरूकता फैला रहे हैं.

अब खुशहाल ज़िंदगी बिता रही मीना आंखों में चमक के साथ कहती थीं, "किसी को ज़िंदगी को तोहफा देने से बेहतर कुछ नहीं हो सकता. ये सबसे बेहतर क्रिसमस गिफ्ट है."

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