क़ैदियों से जानिए कितना ख़तरनाक है ग्वांतानामो बे?

  • 31 जनवरी 2018
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ग्वांतनामो बे जेल बंद न करने को लेकर अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किया है. ट्रंप ने इसकी घोषणा संघीय संबोधन में की है.

ट्रंप की यह घोषणा पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के उलट है. ओबामा ने कहा था कि वो विवादित ग्वांतनामो बे को जल्द से जल्द बंद करना चाहते हैं. क्यूबा स्थित इस जेल को दुनिया की सबसे ख़तरनाक जेल कहा जाता है.

इसे 2001 में 11 सितंबर को अमरीका में चरमपंथी हमले के बाद शुरू किया गया था.

ग्वांतनामो बे के लिए दुनिया भर में अमरीका की आलोचना होती है. ट्रंप ने मंगलवार को दिए अपने भाषण में कहा, ''आतंकवादी महज़ एक अपराधी नहीं हैं. ये हमारे दुश्मन हैं. इन्हें विदेशी ज़मीन से पकड़ा गया है. इनके साथ एक आतंकवादी की तरह ही व्यवहार किया जाएगा. अतीत में मूर्खतापूर्ण फ़ैसले के बाद कई ख़तरनाक आतंकवादियों को छोड़ा गया है.''

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आख़िर ग्वांतनामो बे जेल कितनी ख़तरनाक है? इस जेल में पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के भी काफ़ी क़ैदी हैं. जानिए 2002 में रिहा हुए क़ैदियों से ही इस जेल की कहानी-

2002 में क्यूबा के ग्वांतनामो बे स्थित अमरीकी सैनिक अड्डे से छूटे अफ़ग़ानिस्तान के तीन लोगों ने जेल के अंदर के माहौल की सनसनीख़ेज़ दास्तान बयान की थी.

इन तीन लोगों ने बीबीसी को बताया कि 'उन्हें हालाँकि अमरीकी सैनिकों ने मारा पीटा तो नहीं, लेकिन उन्हें छोटी-छोटी पिंजरेनुमा कोठरियों में रखा गया जिनमें भयंकर गर्मी थी.'

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इन तीन लोगों की उम्र 70 वर्ष के आसपास बताई जाती है और उन्हें रिहाई के बाद काबुल के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था.

ये पहले ऐसे लोग हैं जिन्होंने ग्वांतानामो बे की जेल के अंदर के माहौल के बारे में पहली बार कोई आधिकारिक जानकारी दी थी.

उस वक़्त ग्वांतानामो बे की जेल से सोमवार को सिर्फ़ चार लोगों को रिहा किया गया था, जिनमें तीन अफ़ग़ानिस्तान के लोगों के अलावा एक पाकिस्तानी भी था.

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दूसरी तरफ़ अफ़ग़ानिस्तान से 30 अन्य लोगों को गिरफ़्तार करके पूछताछ के वास्ते ग्वांतानामो बे की जेल पहुँचाया गया था.

इस जेल में अब भी क़रीब 600 संदिग्ध चरमपंथियों को पहले से ही क़ैद में रखा गया है.

जान महोम्मद की कहानी

इन चार लोगों को ये दलील देते हुए छोड़ा गया था कि इनसे सुरक्षा को अब कोई ख़तरा नहीं है.

इनमें से एक जान मोहम्मद ने पत्रकारों को बताया था कि ग्वांतानामो बे की जेल में बाक़ी दुनिया से उनका संबंध बिल्कुल समाप्त हो गया था.

यहाँ तक कि छूटने से तीन दिन पहले तक उसे उसके परिवार की कोई चिट्ठी तक भी नहीं मिली थी.

जान मोहम्मद ने कहा था, "मैंने एक भी अपराध नहीं किया. तालिबान ने मुझे उनके संगठन में शामिल होने के लिए मजबूर किया था."

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"मुझे कुंदूज़ में गिरफ़्तार करने के बाद अमरीकी सैनिकों को सौंप दिया गया था. पहले कंधार ले जाया गया और कुछ पूछताछ के बाद क्यूबा की ग्वांतानामो बे जेल."

जान मोहम्मद ने कहा था, "मैं वहाँ 11 महीने तक बंद रहा, उन्होंने मुझे मारा पीटा तो नहीं, लेकिन 15 दिन तक बहुत सख़्ती से पूछताछ की."

एक अन्य अफ़ग़ानी हाजी फ़ैज़ मोहम्मद ने कहा था कि उन्हें अभी तक पता नहीं कि उन्हें आख़िर गिरफ़्तार ही क्यों किया गया.

"मैंने उनकी गुहार लगाई थी कि मैं तो एक बूढ़ा आदमी हूँ और बिल्कुल बेक़सूर भी हूँ." लेकिन हाजी फ़ैज़ मोहम्मद ने कहा था कि उन्हें अच्छा खाना दिया गया और नमाज़ पढ़ने की भी पूरी सुविधा दी गई.

अमरीका पर 11 सितंबर के हमले के कुछ ही पहले इस्लाम का प्रचार करने अफ़ग़ानिस्तान पहुँचे पाकिस्तान के मोहम्मद सग़ीर को उत्तरी गठबंधन के जनरल अब्दुल रशीद दोस्तम की सेना ने गिरफ़्तार कर अमरीकियों को सौंप दिया था.

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सग़ीर ग्वांतानामो बे की जेल में कई महीने बिताकर 27 अक्तूबर 2002 को पाकिस्तान लौटे थे.

कहा जा रहा है कि सग़ीर के ऊपर बहुत दबाव था कि वे अपने अनुभव पत्रकारों को न बताएँ.

लेकिन बीबीसी संवाददाता हारून रशीद ने पट्टन जाकर मोहम्मद सग़ीर से बात की थी.

मोहम्मद सग़ीर जब ग्वांतानामो बे से इस्लामाबाद लौटे तो सबसे पहले पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों ने उनसे पूछताछ की थी.

लेकिन उनसे जब पूछा कि इस्लामाबाद में क्या हुआ तो वो चुप होकर दूसरी तरफ़ देखने लगे थे.

लेकिन उत्तरी पाकिस्तान के दूर दराज़ के कोहिस्तान इलाक़े के शहर पट्टन में उनके पड़ोसी ने बताया था कि हाल ही में ख़ुफ़िया एजेंसी के एक अधिकारी ने भी उनको चेतावनी दी थी.

इस छोटे से शहर के लोग बताते हैं कि जब लोगों से बात करते हुए मोहम्मद सग़ीर ने कुछ बातें बताईं तो उसके तुरंत बाद इस एजेंट ने उन्हें चुप रहने की हिदायत दे डाली थी.

इसी कारण मोहम्मद सग़ीर की बातों को कई लोग अर्धसत्य की संज्ञा दे रहे हैं.

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मोहम्मद सग़ीर ने जैसा बताया था कि वो वैसे के वैसे हम आपके सामने रख रहे हैं.

"हमें उत्तरी गठबंधन के जनरल दोस्तम की सेनाओं ने कंटेनरों में बंद कर दूसरे शहर भेज दिया जहाँ हमें अमरीकियों के हवाले कर दिया गया.

कंधार में अमरीकियों ने हमें सोने नहीं दिया और इबादत भी नहीं करने दी.

पूरा सच क्या यही है?

हमारी आँखों पर पट्टी बाँध दी गई और हाथ पीठ के पीछे बाँध दिए गए.

ग्वांतानामो बे ले जाने के पहले उन्होंने हमारे सिर के बाल और दाढ़ी काट डाली.

फ़्लाइट में भी हमें आँखों पर पट्टी बाँधकर ले जाया गया.

ग्वांतानामो जा रहे लोगों में चेचन, उज़्बेक, तुर्कमेन, फ़लस्तीनी और पाकिस्तानी हमारे साथ थे.

कुछ और देशों के लोग भी वहाँ थे, लेकिन मुझे कुछ याद नहीं.

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क्यूबा तक की फ़्लाइट 22 घंटे की थी और बहुत ही ख़राब थी.

ग्वांतानामो बे की जेल में भी अमरीकियों ने हमें न तो हमें अज़ान बोलने दी न ही इबादत की इजाज़त दी. सभी क़ैदियों को 6 फ़ुट लंबे और 6 फ़ुट चौड़े कमरों में रखा गया.

हफ़्ते में दो बार हमें बाहर खुले में चलने की इजाज़त दी जाती.

जब हमने भूख हड़ताल कर दी तो आख़िरकार अमरीकियों ने हमें इबादत की इजाज़त दी."

पूछताछ

"अमरीकी हमसे पूछते थे- अल क़ायदा के बारे में क्या जानते हो?

फिर ओसामा का फ़ोटो दिखाकर पूछते थे क्या इस आदमी को जानते हो?

अमरीकियों ने मुझसे 20 बार पूछताछ की और हर बार उन्होंने कुछ विशेष सवाल ही किए.

पूछताछ दिन में भी होती थी और रात को भी.

पूछताछ के दौरान अमरीकियों ने मुझे कोई तकलीफ़ नहीं पहुँचाई लेकिन बाक़ी लोगों पर अत्याचार किए या नहीं मुझे नहीं पता.

मुझे एक अमरीकी ने कहा,"सग़ीर तुम निर्दोष हो."

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फिर उन्होंने मुझे छोड़ दिया.

मुझे अमरीकियों के प्रति कोई वैर-भाव नहीं है. शायद अल्लाह को यही मंज़ूर था."

पट्टन के कई लोग कहते हैं कि सग़ीर निश्चय ही दबाव में आकर अमरीका के विषय में अच्छी बातें कह रहे हैं और सच को दबा रहे हैं.

कोहिस्तान ज़िला एक कट्टरपंथी इस्लाम का एक गढ़ माना जाता है.

अमरीका के बारे में बात करते ही पट्टन के एक गाँव के रहवासी हाजी मीर आलम कहते हैं,"हम अमरीका से ख़ुश नहीं हैं. अमरीका हर क़ीमत पर इस्लाम को बर्बाद करने पर आमादा है जो हम होने नहीं देंगे."

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