क्या अफ़ग़ान उपराष्ट्रपति ने दिया था रेप का आदेश?

  • 2 फरवरी 2018
जनरल अब्दुल रशीद दोस्तम

अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (आईसीसी) के जज विचार कर रहे हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में हुई घटनाओं को युद्ध अपराधों की जांच के तौर पर अधिकृत किया जाए या नहीं.

अफ़ग़ानिस्तान में पीड़िताओं ने चिट्ठी के रूप में अपनी आपबीती आईसीसी को सौंपी है. जिसके विश्लेषण के बाद जज यह तय करेंगे कि संभावित जांच किस ओर केंद्रित होनी चाहिए.

2017 में आईसीसी के अभियोजक फैतू बैन्सूदा ने कहा था कि 'यह मानने के उचित आधार हैं' कि युद्ध अपराध हुए थे.

संभावित अपराधियों में तालिबान, सीआईए और अफ़ग़ान बल के लोग शामिल हैं.

चेतावनी: इस कहानी में नीचे दिया गया विवरण आपको विचलित कर सकता है.

बीबीसी को मालूम हुआ है कि कोर्ट में दी गई शिकायतों में जिन बड़े अधिकारियों पर आरोप लगे हैं, उनमें मौजूदा उपराष्ट्रपति जनरल अब्दुल रशीद दोस्तम भी शामिल हैं. दशकों से उन पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगते आए हैं.

एक बेहद गंभीर आरोप के बाद वह इस वक़्त तुर्की में निर्वासित हैं. 2016 में जनरल दोस्तम के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी अहमद इश्ची ने कहा था कि उन्हें दोस्तम के आदेश पर पीटा गया और उनसे अप्राकृतिक सेक्स किया गया.

इश्ची ने बताया था, ''उन्होंने अपने गार्ड्स से कहा कि ख़ून निकलने तक इसका रेप करो और वीडियो बनाओ. उन्होंने मेरे गुप्तांग में क्लाश्निकोव (राइफल) डाल दी और मैं दर्द से चिल्लाता रहा.''

जनरल दोस्तम ने अफ़ग़ानिस्तान में अदालत में पेश होने से इनकार कर दिया था. मई 2017 में वह इलाज के लिए तुर्की गए. कुछ विश्लेषकों का मानना था कि अफ़ग़ान सरकार ने उन पर देश छोड़ने के लिए दबाव डाला था.

जनरल दोस्तम ने पिछले साल जुलाई में अफ़ग़ानिस्तान लौटने की कोशिश की थी लेकिन उनके विमान को उतरने की अनुमति नहीं दी गई. क्योंकि दोस्तम अब भी तुर्की में हैं इसलिए इश्ची का मानना है कि आईसीसी को इस संबंध में हस्तक्षेप करना चाहिए.

इश्ची ने कहा, ''चौदह महीने हो चुके हैं और अभी तक दोस्तम ने किसी सवाल का जवाब नहीं दिया है. जैसे-जैसे वक़्त बीत रहा है मेरा भरोसा उठता जा रहा है कि अफ़ग़ान सरकार कभी उन्हें अंजाम तक पहुंचा पाएगी.''

जनरल दोस्तम के प्रवक्ता इससे पहले दोस्तम को हिरासत में लिए जाने या उन पर यौन हमला किए जाने के आरोप से इनकार कर चुके हैं.

'तालिबान से प्रताड़ित'

अफ़ग़ानिस्तान में कुछ लोग उम्मीद कर रहे हैं कि आईसीसी देश में विद्रोही समूहों की जवाबदेही तय करने में मदद कर सकता है.

32 साल की समारा काबुल के एक अनाथालय में कुक थीं. जुलाई 2017 में तालिबान के एक आत्मघाती हमले में उनकी मौत हो गई थी.

उनकी 17 साल की बेटी फ़ातिमा ने बीबीसी को बताया, ''मैंने टीवी पर देखा कि एक आत्मघाती हमला हुआ है. मैंने मां को फोन किया लेकिन एक पुलिसवाले ने फोन उठाया. उन्होंने कहा कि उन्हें ये फोन हमले वाली जगह से मिला है.''

फ़ातिमा ने भी आईसीसी को पत्र लिखा है. उन्हें भरोसा नहीं है कि अफ़ग़ान सरकार उनके परिवार को न्याय दिलाएगी.

क़ैदियों से जानिए कितना ख़तरनाक है ग्वांतानामो बे?

यातना सेंटर ग्वांतानामो बे फिर से खोलेंगे ट्रंप

वह कहती हैं, ''वे टीवी पर बताते हैं कि उन्होंने किसी को पकड़ा है और उसे अदालत में लेकर आ रहे हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद ही उसे छोड़ दिया जाता है और बम धमाके जारी रहते हैं.''

ख़तरे के बावजूद फ़ातिमा कहती हैं कि उन्हें बोलने से डर नहीं लगता.

वह कहती हैं, ''मेरी मां ने मुझे फुटबॉल टीम में भेजने और गिटार सिखाने के लिए रिश्तेदारों और सामाजिक दबाव से लड़ाई लड़ी थी. उन्होंने मेरे लिए बहुत कुछ किया है. अब उनके लिए लड़ने की मेरी बारी है.''

फ़ातिमा चाहती हैं कि अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय इन हमलों को रोकने में अफ़ग़ान सरकार की नाकामी की जांच करे और तालिबान के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाया जाए. हालांकि, ऐसा हो पाना आसान नहीं है.

मई 2003 के बाद की घटनाएं कवर होंगी

फ़िलिप सैंड्स क्यूसी यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में सेंटर ऑन इंटरनेशन कोर्ट्स एंड ट्रिब्यूनल्स के निदेशक हैं.

वह कहते हैं, ''आपको तालिबान को दबोचने के लिए सबूतों की ज़रूरत है. सबूत दस्तावेज़ों के रूप में होते हैं, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान होते हैं. लेकिन जिसके पास खुद की पुलिस सेवा ही न हो उनके लिए ये इकट्ठा करना बड़ी दिक्कत होगी.''

''न्यायालय की सिर्फ उच्च स्तरीय अधिकारियों के पीछे जाने की नीति है, वह निचले स्तर के सैनिक नहीं चाहते. इसलिए आपको ऐसे लोगों को पकड़ना होगा.''

इमेज कॉपीरइट AFP

आईसीसी में प्रस्तावित इस जांच में मई 2003 के बाद की घटनाओं को कवर किया जाएगा. इस तारीख के बाद देश में हुआ प्रत्येक कथित अपराध जांच के दायरे में होगा, भले ही उसमें कोई विदेशी नागरिक शामिल हो.

इसका मतलब है कि बगराम डिटेंशन सेंटर में उन कैदियों की कथित प्रताड़ना के मामले भी शामिल होंगे जिन्हें बाद में अफ़ग़ानिस्तान से ग्वांटानामो बे की जेल में भेज दिया गया था.

यह डिटेंशन सेंटर अमरीकियों ने बनाया था लेकिन बाद में इसे अफ़गानिस्तान के नियंत्रण में दे दिया गया.

'रिप्रीव' नाम का एक कैंपेन ग्रुप आईसीसी को ग्वांटानामो बे के वर्तमान और पूर्व कैदियों की ओर से चिट्ठियां लिख रहा है.

रिप्रीव की निदेशक माया फोवा ने बीबीसी से कहा कि बगराम में क़ैदियों को कथित तौर पर कई तरह यातनाएं दी गईं, जैसे बंदूकों के साथ रूसी रॉलेट (बंदूक के छह खानों में से एक में गोली डालकर ख़तरे का खेल खेलना), लोगों को कई दिनों तक तनाव वाली अवस्था में रखना और ऐसी यातनाएं देना जो इंसान को मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़ कर रख दे.

वह कहती हैं, ''इन यातनाओं को शीर्ष स्तर के कमांडर्स बढ़ावा देते थे. ऐसे ही लोगों को आईसीसी न्याय की कसौटी पर कसने की कोशिश कर रहा है.''

अमरीकी अधिकारियों ने कहा है कि वे तालिबान को न्यायिक अंज़ाम तक पहुंचाने के प्रयासों का समर्थन करते हैं लेकिन उन्होंने आईसीसी की जांच को अनुचित और नाजायज़ बताया है.

साल 2002 में अमरीकी कांग्रेस ने एक ऐसा क़ानून पास किया था जिसके मुताबिक अगर आईसीसी में किसी अमरीकी पर मुक़दमा चलता है तो अमरीका किसी भी हद तक जाकर उसे छुड़ाने की कोशिश करेगा.

इस कानून के चलते अमरीकी अधिकारियों का सफल अभियोग मुश्किल हो गया है. लेकिन, आईसीसी पर यह दिखाने का दबाव है कि वह राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों पर विचार कर सकता है. अब तक इसने अफ़्रीका की घटनाओं पर ही ज़्यादा ध्यान दिया है.

'सिर्फ अफ़्रीकी ही क्यों?'

यूसीएल के फ़िलिप सैंड्स ने बीबीसी को बताया, ''आईसीसी की वेबसाइट पर हर अभियुक्त अफ़्रीकी और काला है या दोनों हैं.''

"यह एक समस्या है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय अपराधों पर अफ़्रीका का एकाधिकार नहीं है."

"इससे एक ग़ुस्सा पैदा हुआ है. अफ़्रीकी देश कह रहे हैं कि हम पर ही ध्यान क्यों? दुनिया भर में क्या हो रहा है उसे भी देखें."

आईसीसी के न्यायाधीशों को अब भी यह तय करना है कि क्या एक औपचारिक जांच को अधिकृत करना चाहिए. हालांकि अफ़ग़ानिस्तान में कई लोग हिंसा के कई वर्षों बाद किसी तरह के न्याय के लिए अदालत की ओर देख रहे हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए