BBC SPECIAL: ऐसे बना ऑस्ट्रेलिया का पहला गुरुद्वारा

  • विनीत खरे
  • बीबीसी संवाददाता, वूलगूलगा, ऑस्ट्रेलिया
वूलगूलगा का गुरुद्वारा
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वूलगूलगा का गुरुद्वारा

ऑस्ट्रेलिया के 'मिनी पंजाब' वूलगूलगा में आएं तो दूर से गुरुद्वारे का चमकता हुआ गुंबद नज़र आ जाएगा.

ग्रिल से घिरे गुरुद्वारे के बाहर सफ़ेद बोर्ड पर अंग्रेज़ी में लिखा है- 3 जनवरी 1970 को सबसे पहले खुला.

ये है वूलगूलगा का दूसरा गुरुद्वारा.

कुछ ही दूरी पर है ऑस्ट्रेलिया में 1968 में बना पहला गुरुद्वारा - इसका डिज़ाइन पारंपरिक गुरुद्वारे से अलग है.

दिन रविवार था और अंदर से गुरुग्रंथ साहब के पाठ के स्वर तैरते हुए कानों में पहुंच रहे थे.

सुबह के नौ बजे थे इसलिए इक्का-दुक्का लोग ही गुरुद्वारा पहुंच पाए थे.

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वूलगूलगा गुरुद्वारा

150 साल पुरानी कहानी

अंदर पुरुष, महिलाएं, बच्चे, सिर ढक कर सफ़ेद चादर पर बैठे हुए पाठ सुन रहे थे. जो किन्हीं कारणों से नीचे नहीं बैठ सकते थे, उनके लिए दीवार से सटी कुर्सियां थीं.

ऑस्ट्रेलिया में सिखों के आगमन की कहानी करीब 150 साल पुरानी है.

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अमरजीत सिंह मोर

1901 से ऑस्ट्रेलिया में रह रहे

वूलगूलगा के इस गुरुद्वारे के बाहर मेरी मुलाकात पंजाबी और अंग्रेज़ी में रवां अमरजीत सिंह मोर से हुई.

उनके दादा ठाकुर सिंह ने साल 1901 में दो साथियों के साथ जालंधर से ऑस्ट्रेलिया जाने का फ़ैसला किया था.

वो बताते हैं, "पंजाब से ऑस्ट्रेलिया आने का कारण पंजाब में ज़मीन की कमी हो सकती है. हो सकता है वो ज़िंदगी में जोखिम लेना चाहते हों."

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ठाकुर सिंह - अमरजीत सिंह मोर के दादा

साथियों ने साथ छोड़ा फिर भी ऑस्ट्रेलिया पहुंचे

ठाकुर सिंह और उनके दो साथी जब ऑस्ट्रेलिया जाने के लिए बंदरगाह पहुंचे तो महासागर देखकर एक साथी के हाथ पांव फूलने लगे. वो घबराकर वापस लौट गया.

लेकिन ठाकुर सिंह दूसरे साथी के साथ ऑस्ट्रेलिया पहुंचे.

ये साफ़ नहीं कि ठाकुर सिंह जैसे लोग भारत से किस रास्ते ऑस्ट्रेलिया आते थे लेकिना माना जाता है कि वो सबसे पहले पश्चिमी छोर पर स्थित शहर पर्थ पहुंचते थे और उसके बाद ज़मीन या जहाज़ के रास्ते सफ़र करते थे.

रश्मीर भट्टी और वर्न ए डुसेनबेरी ने ऑस्ट्रेलिया, खासकर वूलगूलगा में, सिखों के बसने पर किताब लिखी है.

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साल 1858 में ब्रिटिश 15वीं पंजाब इन्फ़ैंट्री रेजिमेंट के सिख जवान

फ्रॉम सोजर्नर्स टू सेटलेर्स

किताब का नाम है 'ए पंजाबी सिख कम्युनिटी इन ऑस्ट्रेलिया - फ्रॉम सोजर्नर्स टू सेटलेर्स.'

किताब के मुताबिक जब ब्रितानी सेना में तैनात सिख सैनिक सिंगापुर और हांगकांग जैसे दक्षिण एशियाई देशों में गए तो उन्हें ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में काम के बारे में पता चला.

जल्द ही बात पंजाब के गावों में फैल गई.

19वीं शताब्दी के आखिरी सालों में जब सिख ऑस्ट्रेलिया पहुंचने लगे तो वहां माहौल एशियाई लोगों के ख़िलाफ़ था.

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19वीं सदी के आखिरी सालों में पंजाब से ऑस्ट्रेलिया आने वाले लोग

चुनौतीपूर्ण परिस्थितियां

गोरे ऑस्ट्रेलियाई लोगों को डर था कि बाहरी लोग उनकी नौकरियां, उनका काम ले लेंगे.

भारत से आने वाले ये लोग अनजान समुदायों के बीच बेहद मुश्किल परिस्थितियों में काम करते थे.

भारत में ब्रितानी शासन के कारण कई लोग अंग्रेज़ी भाषा से पूरी तरह अंजान नहीं थे लेकिन पंजाब में परिवारों से सालों दूर रहना बेहद चुनौतीपूर्ण था.

ये लोग कुछ साल ऑस्ट्रेलिया के गन्ने, भुट्टों, केले के खेतों आदि जगहों में काम करते और फिर पैसे कमाकर वापस भारत लौट जाते. और फिर वापस ऑस्ट्रेलिया आ जाते.

भारत और ऑस्ट्रेलिया दोनों पर ब्रिटेन का शासन था इसलिए आने-जाने में परेशानी नहीं थी.

भारत से आने वाले लोगों को 'हिंदूज़' कहा जाता था. किताब के अनुसार साल 1897 तक ऑस्ट्रेलिया के क्लेरेंस, रिचमेंड और ट्वीड ज़िलों में 521 हिंदू रहते थे.

वूलगूलगा-कॉफ़्स हार्बर में रहने वाला पंजाबी सिख समुदाय इन्हीं का वंशज है.

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वूलगूलगा हेरिटेज वॉक पर लगी तस्वीर

ऑस्ट्रेलिया में एशियाईयों के आने पर प्रतिबंध

ऑस्ट्रेलिया में बाहरी लोगों का डर इतना बढ़ा कि साल 1901 में इमिग्रेशन रिस्ट्रिक्शन ऐक्ट कानून पास हुआ. इसे व्हाइट ऑस्ट्रेलियन नीति के नाम से जाना जाता है, यानी क़ानूनन ऑस्ट्रेलिया में एशियाई लोगों के आने पर प्रतिबंध लग गया.

किताब के मुताबिक ब्रितानी अधिकारियों को चिंता थी कि अगर ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों के ख़िलाफ़ खुला भेदभाव हुआ तो असर ब्रिटिश और भारतीयों के बीच संबंधों पर पड़ेगा.

उधर हकीकत ये थी कि एशियाई अप्रवासन नियंत्रित तो किया गया लेकिन वो जारी रहा.

लोगों को वूलगूलगा के केले के खेतों में काम दिखा और वो यहां आने लगे.

जब लोगों को लगा कि महिलाओं के लिए ये जगह सुरक्षित है तो वो परिवारों को भी पंजाब से साथ लाने लगे.

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रघबीर कौर

रघबीर और मनजीत की कहानी

रघबीर कौर भी पिता के बुलावे पर ऑस्ट्रेलिया आ गईं.

गुरुद्वार की पहली मंज़िल पर बिछी दरी पर बैठकर वो गुज़रे दिनों को याद करती हैं, "यहां सब गोरे होते थे, मेरे पिताजी के पास न कोई कार थी न कुछ. उनका एक गोरा दोस्त था जिसकी गाड़ी वो काम में इस्तेमाल करते थे. चार साल यहां रहने के बाद मैं भारत वापस चली गई."

पंजाब में रघबीर की शादी हो गई और फिर वो पति के साथ वापस ऑस्ट्रेलिया आ गईं. लेकिन नए देश में घर का खाना जुटाना आसान न था.

वो बताती हैं, यहां खाना मिल जाता था. दाल भी मिल जाती थी. पिसा मसाला, हल्दी लोग पंजाब से ले आते थे. केले के फ़ार्म में बिजली नहीं हुआ करती थी. हम लकड़ी के चूल्हे पर रोटी बना लेते थे. पानी चूल्हे पर गर्म करके उसी से नहा लेते थे.

मनजीत दोसांझ का जन्म ऑस्ट्रलिया में हुआ. उनके घर में उनका संयुक्त परिवार रहता है.

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संयुक्त परिवार में रह रहीं मनजीत दोसांझ का जन्म ऑस्ट्रेलिया में हुआ है

'नई पीढ़ी को पूर्वजों के किए का पता नहीं'

बचपन में वो अपने मां जिंदो सिंह और पिता झालमन फूनी के साथ केले के खेतों में काम करती थीं.

जहां पुरुष केले को कंधों पर लादकर पहाड़ों के ऊपर या नीचे लेकर जाते थे, महिलाएं केले को पैक करने के लिए हाथों से लकड़ी के बक्से बनाती थीं.

मनजीत गुज़रे दिनों को याद करके भावुक हो जाती हैं, "परिवारों के लिए खाने, कपड़ों का इंतज़ाम करना सबसे बड़ी चुनौती होती थी लेकिन मैंने किसी को शिकायत करते नहीं सुना. हम आज जो हैं, अपने माता-पिता की मेहनत की वजह से हैं. आज की नई पीढ़ी को पता भी नहीं होगा कि हमारे पूर्वजों ने हमारे लिए क्या क्या किया.

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ऑस्ट्रेलिया आने वाले लोगों के लिए ज़िंदगी आसान नहीं थी

जब अपमानित हुए सिख...

अमरजीत सिंह मोर मां और बहन से साथ 1964 में वूलगूलगा पहुंचे. उनके पिता दो साल पहले यहां आए थे.

उनके लिए यहां हज़ारों मील दूर आना बहुत बड़ा बदलाव था.

वो याद करते हैं, "उस वक्त वूलगूलगा की जनसंख्या लगभग 200-300 होगी और पांच या छह सिख परिवार होंगे. मैंने गांव के स्कूल में पढ़ाई की थी और अंग्रेज़ी नहीं आती थी."

अमरजीत सिंह मोर के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया के पहले गुरुद्वारे के पीछे 1967 की एक घटना है.

एक कम्युनिटी मैगज़ीन में वो लिखते हैं, "एक स्थानीय झगड़े के हल के लिए गांव के पंचायत की पार्क में एक बैठक हुई.... विदेशी भाषा में तेज़ आवाज़ में बात करते हुए जब केयरटेकर ने सुना तो उसे गुस्सा आ गया और उसने उन्हें पार्क से चले जाने को कहा."

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पहले गुरुद्वारे के बाद दूसरा और अब तीसरा

इकट्ठा जाट सिख इससे बेहद अपमानित हुए और उन्होंने गुरुद्वारा बनाने का निश्चय किया.

रश्मीर भट्टी बताती हैं, "वो गुरुद्वारे के लिए चर्च का डिज़ाइन लेकर आए लेकिन कुछ लोग इस बात से असहमत थे क्योंकि वो पारंपरिक गुरुद्वारा चाहते थे."

इसलिए पहला गुरुद्वारा बनने के दो साल बाद दूसरा नया पारंपरिक गुरुद्वारा बना.

पहला गुरुद्वारा बनने के 50 साल पूरा होने के उपलक्ष्य में अब नज़दीक ही तीसरा गुरुद्वारा बन रहा है जिस पर काम करने के लिए कारीगर पंजाब से आए हैं.

पंजाब से आए सिखों के पास आज बड़ी-बड़ी ज़मीने हैं और वो शानदार घरों में रह रहे हैं.

केले में आमदनी कम होने के बाद खेतों में केले के बजाय ब्लूबेरी उगने लगी है.

खाली सड़कों के दोनों ओर अलग अलग मेड़ों पर ब्लूबेरी के पेड़े सीधी लाइनों में लगे थे.

पंजाब से आने वाले लोग शायद पंजाब को वूलगूलगा बनाना चाहें क्योंकि यहां रहने वालों के दिलों में पंजाब हमेशा के लिए बसा है.

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