तस्वीरों में: एक गांव जहां फरवरी में मनाया जाता है क्रिसमस

  • 21 फरवरी 2018
क्रिसमस इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption क्रिसमस के जश्न के दौरान शिशु ईसा मसीह की लकड़ी की प्रतिमा की आराधना की जाती है.

दुनियाभर में क्रिसमस का त्यौहार 25 दिसंबर को मनाया जाता है, लेकिन कोलंबिया का एक गांव ऐसा है जहां फरवरी के महीने में क्रिसमस मनाया जाता है.

क्विनामायो में फरवरी में क्रिसमस क्यों मनाया जाता है? इसके पीछे गांव वाले ख़ास कारण बताते हैं. वो कहते हैं कि फरवरी में क्रिसमस मनाने की परंपरा उनके पुरखों के ज़माने से चली आ रही है. उस वक्त वो लोग गुलाम थे, जिन्हें 24 दिसंबर को क्रिसमस मनाने की इजाज़त नहीं थी. उन्हें क्रिसमस के लिए कोई और दिन चुनने को कहा गया.

तब इन गांव वालों के पुरखों ने फरवरी के मध्य में क्रिसमस मनाने का फ़ैसला किया और तबसे आजतक ये परंपरा यू हीं चली आ रही है.

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption गांव वालों का कहना है कि इस परंपरा को सहेजने में युवा पीढ़ी का अहम किरदार है.

क्विनामायो गांव के लोग इस दिन काले शिशु ईसा मसीह की प्रतिमा की आराधना करते हैं. इस रंगारंग जश्न के दौरान आतिशबाज़ी के साथ लोग नाच-गाना करते हैं.

इस इवेंट का आयोजन करने वाले होल्म्स लाराहोंडो कहते हैं, "हमारे समुदाय की मान्यता है कि किसी भी महिला को जन्म देने के बाद 45 दिन का उपवास करना होता है. इसलिए हम दिसंबर की बजाए फरवरी में क्रिसमस मनाते हैं, ताकि मैरी भी हमारे साथ डांस कर सके."

53 वर्षीय शिक्षिका बाल्मोरस वायाफरा ने एजेंस फ्रांस प्रेस को बताया कि 24 दिसंबर का दिन उनके लिए "किसी भी आम दिन" की तरह है. लेकिन ये जश्न "एक पार्टी की तरह है जहां हम अपने प्रभु के प्रति सम्मान प्रकट करते हैं."

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption फरवरी में क्रिसमस मनाने की परंपरा गुलामी के दिनों से चली आ रही है.

इस जश्न के तहत गांव वाले घर-घर जाकर शिशु यीशु को ढूंढ़ते हैं. यीशु की ये प्रतिमा लकड़ी की होती है, जिसे कोई भी एक गांववाला अपने घर में पूरे साल के लिए सुरक्षित रखता है.

प्रतिमा मिल जाने पर उसे पूरे गांव में घुमाया जाता है. इस परेड में गांव के हर उम्र के लोग शामिल होते हैं. ये लोग परियों और सिपाहियों की पोशाक पहने होते हैं.

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption 'फूगा' नृत्य बेड़िया पहने गुलामों के कदमों की याद दिलाता है.

इस दौरान एक ख़ास तरह का नृत्य फूगा (एस्केप) किया जाता है. इस डांस में लोग हाथ-पैर में बेड़ी लगाए हुए दासों के कदमों की नकल करते हैं.

ये त्योहार अगले दिन सुबह-सुबह खत्म होता है.

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption इस दिन खूब आतीशबाज़ी की जाती है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

मिलते-जुलते मुद्दे