बिली ग्राहम, जिन्हें ईश्वर का दूत कहा गया था

  • 21 फरवरी 2018
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Image caption बिली ग्राहम अस्सी के दशक तक ईसाई धर्म पर उपदेश देते रहे

कभी उन्हें ईश्वर का दूत कहा गया था. ईसाई मत के प्रचार के लिए उन्होंने दुनिया भर की यात्राएं कीं.

20वीं सदी के सबसे प्रभावशाली उपदेशकों में से एक बिली ग्राहम ने बुधवार को इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

बिली ग्राहम की नरम और मीठी ज़ुबान उनके दौर के ज़्यादातर उपदेशकों से अलग थी जो आग लगाने वाले लहज़े में ईसाई धर्म पर ज्ञान देते थे.

साठ सालों तक वो धर्म उपदेश देते रहे. उन्होंने दुनिया के 185 देशों में तकरीबन 21 करोड़ लोगों को सीधे संबोधित किया था.

इसके अलावा लाखों लोगों ने उन्हें टीवी और रेडियो पर सुना. शुरुआत में उनके ज़्यादातर श्रोता गोरे, मध्य वर्गीय और परंपरावादी लोग थे.

लेकिन अमरीका में जैसे ही नागरिक अधिकार आंदोलन ने जोर पकड़ा, बिली ग्राहम ने अलगाववाद के ख़िलाफ़ उपदेश देना शुरू कर दिया.

हालात यहां तक पहुंच गए कि मार्टिन लूथर किंग से उनके रिश्ते कुछ समय के लिए ख़राब हो गए.

बिली ग्राहम यानी विलियम फ़्रैंकलिन ग्राहम जूनियर का जन्म 7 नवंबर, 1918 को नॉर्थ कैरोलिना के शैरलट में हुआ था. उनका परिवार डेयरी चलाता था.

बिली के माता-पिता कंज़र्वेटिव एसोसिएशट रिफ़ॉर्म्ड प्रेसबिटेरियन चर्च के मेंबर थे.

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Image caption बिली ग्राहम जब 17 साल के थे

सेना में जाना चाहते थे

जब अमरीका में साल 1933 में शराबबंदी खत्म हुई तो बिली ग्राहम के पिता ने उन्हें बियर पीने के लिए मजबूर किया.

लेकिन बिली ने आख़िरी दम तक अपने पिता को शराब के ख़तरों से आगाह करने की कोशिश की. बिली ने ताउम्र शराब को हाथ नहीं लगाया.

जब वो सोलह साल के थे तो उन्होंने खुद को क्राइस्ट के प्रति समर्पित कर दिया. 1939 में वो पादरी बन गए.

द्वितीय विश्व युद्ध के समय वो सेना में पादरी का काम करना चाहते थे लेकिन मम्प्स (गल गंड रोग) के कारण उनका ये ख़्वाब अधूरा रह गया.

1943 में वो फ़्लोरिडा बाइबल इंस्टीट्यूट चले गए और रथ मैक्यू बेल से शादी कर ली.

इसके बाद वो एक पूर्ण कालिक धर्म उपदेशक बन गए. नौजवान लोगों को पादरी बनने के लिए प्रेरित करना उनका काम था.

लेकिन एक वक़्त ऐसा भी था जब बिली ग्राहम ने सेल्समैन का काम किया. वो मंदी का समय था और बिली घूम-घूम कर सामान बेचा करते थे.

तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि ये शख़्स एक दिन ईसाई धर्म के महान प्रचारकों में शुमार होगा.

साल 1949 में दुनिया की नज़र उस वक्त बिली ग्राहम पर गई जब वो आठ हफ़्तों तक लॉस एंजीलिस में एक विशाल टेंट के नीचे लोगों को उपदेश देते रहे.

नागरिक अधिकार आंदोलन के बढ़ते असर से मजबूर होकर बिली ग्राहम ने अमरीकी समाज में जारी नस्लवाद का विरोध करना शुरू किया.

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Image caption कैनवस कैथेड्रल में अपने संगीत निर्देशक के साथ ग्राहम

अमरीका में नस्लवाद

शुरुआत में बिली ग्राहम बदलाव की ज़रूरत को लेकर दुविधा में थे लेकिन पचास के दशक की शुरुआत में उन्होंने ऐसे माहौल में उपदेश दिए थे जहां नस्ल के आधार पर लोगों के बैठने का इंतज़ाम था.

तभी कोर्ट ने ये फ़ैसला दिया कि अमरीकी स्कूलों में नस्ल के आधार पर अलग-अलग बैठने की व्यवस्था असंवैधानिक है.

इसके बाद ग्राहम ने अपनी मीटिंग्स में लोगों के साथ बैठने पर जोर देना शुरू कर दिया.

वो साम्यवाद के मुखर विरोधी थे. बिली ग्राहम का ये मानना था कि साम्यवाद ईश्वर, क्राइस्ट व बाइबल और सभी धर्मों के ख़िलाफ़ है.

अमरीका में मिली कामयाबी के बाद बिली अपना संदेश दुनिया भर में फैलाना चाहते थे और इसकी शुरुआत उन्होंने 1954 में लंदन से की.

ये एक सोच-समझ कर लिया गया जोखिम था. उस ज़माने में केवल 10 फ़ीसदी ब्रितानी ही नियमित रूप से चर्च जाते थे जबकि अमरीका में ये तादाद 50 फ़ीसदी थी.

ब्रिटेन का प्रेस भी उनको लेकर संशकित था. लोग ये समझ नहीं पा रहे थे कि ये अमरीकी आख़िर चाहता क्या है.

एक सांसद ने उनके ब्रिटेन में दाखिल होने पर रोक लगाने की मांग तक कर डाली. लेकिन तब भी उन्होंने लंदन में 12 हज़ार लोगों की भीड़ को संबोधित किया.

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Image caption 1954 में बिली को सुनने लंदन में हजारों लोग इकट्ठा होते थे

ब्रिटेन में उनकी दीवानगी इस कदर देखी गई कि तीन महीनों तक हर रात 12000 लोगों की क्षमता वाला ऑडिटोरियम भरा रहा.

बिली के ब्रिटेन अभियान का आख़िरी पड़ाव वेंबली स्टेडियम था जहां उन्हें सुनने के लिए 120000 लोग इकट्ठा हुए थे. बिली की वैश्विक यात्रा की ये शुरुआत थी.

उनके धार्मिक अभियान की योजनाएं बेहद सतर्कतापूर्वक बनाई जाती थीं. जैसे-जैसे बिली की इज़्ज़त बढ़ी, उन्हें सुनने आने वालों की तादाद भी.

न्यूयॉर्क से लेकर नाइजीरिया तक जाने कितने लोग उनसे प्रभावित थे. कोरिया में दस लाख से ज़्यादा लोग उन्हें सुनने के लिए इकट्ठा हो गए थे.

मार्टिन लूथर किंग से रिश्ते

1957 में उन्होंने सिविल राइट मूवमेंट के नेता मार्टिन लूथर किंग को न्यूयॉर्क में अपने साथ शामिल होने के लिए न्योता दिया.

16 हफ्तों तक चले इस इवेंट में 20 लाख से ज़्यादा लोग उन्हें सुनने के लिए आए. लेकिन ग्राहम और मार्टिन लूथर किंग के रिश्तों में उतार-चढ़ाव आता रहा.

वियतमान युद्ध पर मार्टिन लूथर किंग के स्टैंड को लेकर बिली ने उनकी आलोचना की और यहां तक कि उनकी देशभक्ति पर भी सवाल उठाए.

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Image caption मार्टिन लूथर किंग और बिली ग्राहम के रिश्ते हमेशा सहज नहीं रहे

बिली ने मांगी थी माफ़ी

लेकिन 1968 में जब मार्टिन लूथर किंग की हत्या कर दी गई तो बिली ख़ुद को भावुक होने से रोक नहीं सके.

उन्होंने कहा कि अमरीका ने एक 'सोशल लीडर' और 'ईश्वर का दूत' खो दिया.

60 सालों तक बिली लोगों को उपदेश देते रहे. साल 2005 के जून में उन्होंने न्यूयॉर्क में आख़िरी बार उपदेश दया. तब वो 86 साल के थे. उन्होंने कहा भी, "मैं जानता हूं कि ये ज़्यादा समय तक नहीं चलने वाला है."

दूसरे नामचीन पादरियों के विपरीत विवाद हमेशा बिली ग्राहम से दूर रहे. वो तकरीबन हर अमरीकी राष्ट्रपति के साथ देखे गए.

बिली ने निक्सन का समर्थन किया था लेकिन वाटरगेट स्कैंडल में वो उनकी आलोचना करने से पीछे नहीं हटे.

1972 में रिचर्ड निक्सन के साथ निजी बातचीत में उन्होंने यहूदियों के लेकर नकारात्मक टिप्पणी की थी. ये टेप्स बाद में सार्वजनिक हुए तो 2002 में उन्होंने इसके लिए सार्वजनिक तौर पर माफ़ी मांगी थी.

लेकिन जो बात सबसे ज्यादा असर पैदा करती थी, वो उनके धार्मिक उपदेश थे और दुनिया भर के लाखों लोग इसके गवाह हैं.

उनका संदेश यही था कि उम्मीद की लौ जलती रही तो लोग ईश्वर के जरिये मोक्ष पा लेंगे.

कभी उन्होंने कहा था, "मैंने बाइबल का आखिरी पन्ना पढ़ा है. आख़िर में सबकुछ ठीक हो जाएगा."

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