क्या अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान बनेगा राजनीतिक दल?

  • 6 मार्च 2018
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Image caption अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी

बुधवार 28 फ़रवरी को अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ने तालिबान के सामने अपने प्रशासन का सबसे साहसी शांति प्रस्ताव रखा.

उन्होंने ये बात 'पहले से किसी भी शर्त को रखे बिना' कही. इस प्रस्ताव में उन्होंने तालिबान के साथ न केवल बातचीत का प्रस्ताव दिया बल्कि अपने कार्यालय में उसे एक वैध राजनीतिक इकाई के तौर पर मान्यता देने की बात भी कही.

अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति ने कहा, "हम सभी अफ़ग़ानियों के लिए एक शांतिपूर्ण और प्रतिष्ठित जीवन का रास्ता प्रशस्त करने में विश्वास रखते हैं." उन्होंने आगे कहा कि, "शांति स्वीकार करें और इसे सम्मान से स्वीकार करें."

नागरिकों के ख़िलाफ़ बढ़ती हिंसा

हाल में काबुल में हुए एक धमाके में 100 से ज़्यादा लोग मारे गए थे, इस धमाके की ज़िम्मेदारी तालिबान ने ली थी. इसके ख़िलाफ़ ग़नी ने काफ़ी तीखी प्रतिक्रिया दी थी.

कुछ सप्ताह पहले उन्होंने तालिबान की निंदा करते हुए कहा था कि अफ़ग़ान सरकार "अपने लोगों के ख़ून का बदला लेगी."

आम नागरिकों को निशाना बनाने की वजह से तालिबान को आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है. इसके बाद उसने इन हमलों को उचित ठहराते हुए बयान जारी किया था. उसका कहना था कि उनका निशाना केवल "अमरीका और आक्रमणकारी देशों के नागरिक थे."

जनवरी 2018 में हुआ हमला बीते कुछ सालों में ऐसा सबसे बड़ा कोई आत्मघाती हमला था.

15 फ़रवरी को अफ़ग़ानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन की रिपोर्ट में बताया गया था कि सरकार विरोधी तत्वों के हमलों में नागरिकों को जानबूझकर निशाना बनाया गया और 2017 में हुए हमलों में मारे गए लोगों में 27 फ़ीसदी आम नागरिक थे.

यहां तक कि काबुल वार्ता के दौरान अफ़ग़ान मीडिया केंद्रों ने एक घटना को रिपोर्ट किया था जिसमें दक्षिणी प्रांत के उरुज़गान में तालिबान ने 19 लोगों को अगवा किया था और छह पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी थी.

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Image caption तालिबान के हमलों में कई आम नागरिक मारे गए

एक आख़िरी प्रयास?

कुछ समीक्षकों ने ग़नी की आलोचना करते हुए इसे डर की वजह से हताशा भरा क़दम बताया गया है जो चरमपंथी समूहों को 'प्रोत्साहित' कर सकता है.

राजनीतिक समीक्षक आसिफ़ आशना ने 28 फ़रवरी को ट्वीट किया था, "ग़नी का शांति प्रस्ताव आतंकी बिरादरी के बीच एक खुला प्रोत्साहन है. यह प्रचार टीम की तरफ से की गई केवल एक राजनीतिक पैंतरेबाज़ी है.

31 जनवरी को जारी हुए बीबीसी के एक अध्ययन के अनुसार, तालिबान इस समय अफ़ग़ानिस्तान के 70 फ़ीसदी हिस्से में 'खुले तौर पर सक्रिय है' और जिसमें से छह फ़ीसदी पर उसका पूरा नियंत्रण है.

हालांकि, अफ़ग़ान सरकार ने इस अध्ययन के निष्कर्षों को ख़ारिज कर दिया था लेकिन बहुत से मीडिया केंद्रों ने राष्ट्रपति भवन पर 'लोगों से तथ्य छिपाने के प्रयास' करने का आरोप लगाया है.

एक समाचार पत्र मांदेगर ने सात फ़रवरी को लिखा था, "इसमें कोई शक़ नहीं है कि अफ़ग़ानिस्तान सरकार ने लोगों से दूरी बनाते हुए देश के कई हिस्सों में विद्रोही समूहों की उपस्थिति को मज़बूत किया है.

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राजनीतिक समर्थन बढ़ाना

ग़नी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय एकता सरकार (एनयूजी) अपने भीतर ही राजनीतिक विरोध का सामना कर रही है. 2014 में जिस समझौते के तहत अफ़ग़ान राष्ट्रपति के सहयोगियों ने एकजुट सरकार बनाई थी उनमें से कुछ सहयोगी 2019 में होने वाले चुनाव से पहले अपना समर्थन वापस लेने की धमकी दे चुके हैं.

सलाहुद्दीन रब्बानी के नेतृत्व वाली जमियत-ए-इस्लामी पार्टी का इस समय एनयूजी के साथ कुछ विवाद चल रहा है, वे बल्ख़ के गवर्नर अट्टा मोहम्मद नूर की अनौपचारिक बरखास्तगी से नाराज़ हैं.

मतभेद तो ग़नी और अफ़ग़ानिस्तान के पहले उप राष्ट्रपति अब्दुल राशिद दोस्तुम के बीच भी चल रहा है.

अफ़ग़ानिस्तान के एक पूर्व सिपहसालार जो फिहलाल निर्वासन की स्थिति में तुर्की में रह रहे हैं, उन्होंने हाल ही में चैनल वन टीवी से कहा था, ''सबसे पहले तो हमें आपसी मतभेद दूर करने होंगे, हमें आपस में एकजुट होने की ज़रूरत है, मैं जिस बात पर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं वह यह है कि तालिबान के साथ किसी भी तरह का समझौता जनरल दोस्तुम की गैरमौजूदगी में नहीं हो सकता.''

अगर ग़नी तालिबान को समझौते की मेज़ तक लाने में कामयाब होते हैं तो इससे उन्हें राजनीतिक फ़ायदा तो मिलेगा ही साथ ही जनता का समर्थन भी मिल सकता है, क्योंकि फिलहाल तो उन पर हार का खतरा मंडरा रहा है.

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तालिबान की शांति

ग़नी के प्रस्ताव पर अभी तालिबान ने आधिकारिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. तालिबान के प्रवक्ता ने 28 फ़रवरी को बीबीसी अफ़ग़ान सेवा को बताया था कि वे फ़िलहाल इस प्रस्ताव पर अपने समूह के बड़े नेताओं की प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहे हैं.

1 मार्च को तालिबान ने वाइस ऑफ जिहाद वेबसाइट पर एक लेख प्रकाशित किया जिसे खालिद अफ़ग़ानज़ई नामक व्यक्ति ने लिखा था, इस लेख में उन्होंने शांति प्रयासों की जमकर आलोचना की.

लेख में लिखा गया है, ''तालिबान ने हमेशा से यही कहा है कि लड़ाई के पीछे उनका सबसे प्रमुख उद्देश्य विदेशियों को अफ़ग़ान धरती से बाहर करना है, जब तक विदेशी उनकी जमीन पर नौकरी करते रहेंगे तब तक किसी तरह की शांति प्रक्रिया बेबुनियाद है.''

इससे पहले भी तालिबान ने अफ़ग़ान सरकार के साथ बातचीत करने के तमाम प्रस्ताव ठुकरा दिए थे. तालिबान हमेशा से ही अफ़ग़ान सरकार को 'कठपुतली का प्रशासन' कहता आया है.

अमरीकी कांग्रेस और वहां की जनता के नाम एक ओपन लेटर प्रकाशित होने के दो हफ्ते के भीतर ही 26 फ़रवरी को तालिबान ने एक बयान जारी किया जिसमें उन्होंने शांतिपूर्ण समाधान के लिए अपनी तरफ़ से एक रास्ता भी सुझाया, इस बयान में कहा गया था कि अमरीका क़तर में मौजूद तालिबान के राजनीतिक दफ़्तर के साथ सीधी बातचीत करे.

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'अफ़ग़ान-नेतृत्व अफ़गान-स्वामित्व' वाली शांति प्रक्रिया

तालिबान की तरफ से दिए गए बातचीत के ताज़ा प्रस्ताव पर अमरीका ने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया है. अमरीकी सरकार 'अफ़गान नेतृत्व और अफ़गान स्वामित्व' वाली शांति प्रक्रिया के लिए ही प्रतिबद्ध है.

अमरीकी गृह मंत्रालय ने 27 फरवरी को कहा, ''अंततः इस राजनीतिक स्थिति का एक राजनीतिक समाधान होना चाहिए. और अगर तालिबान बातचीत करने के लिए तैयार है तो यह सबसे बेहतर विकल्प हो सकता है, निश्चित तौर पर अमरीकी सरकार की भी इसमें अहम भूमिका रहेगी.''

वहीं पाकिस्तान की तरफ देखें तो उसने भी ग़नी के प्रस्ताव का स्वागत किया है, पिछले कुछ महीनों से अमरीका ने पाकिस्तान पर तालिबान और हक्कानी नेटवर्क को मदद पहुंचाने के आरोप लगाए हैं जिससे पाकिस्तान पर दबाव भी बढ़ा है.

पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नसीर खान जनजुआ ने कहा, ''पाकिस्तान में शांति के लिए अफ़ग़ानिस्तान में शांति होना बेहद ज़रूरी है, पाकिस्तान प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय राजनीतिक सुलह की कोशिशों का समर्थन करता है.''

तालिबान के साथ होने वाली किसी भी शांति प्रक्रिया की कोशिश में पाकिस्तान का समर्थन बेहद आवश्यक है. काफी समय पहले अफ़ग़ानिस्तान सरकार ने पाकिस्तान पर तालिबान को आर्थिक मदद पहुंचाने और अपने क्षेत्र में शरण देने के आरोप लगाए थे.

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तालिबान के पास क्या विकल्प?

तालिबान के पास सीधे तौर पर दो रास्ते हैं- पहला तो वह ग़नी के प्रस्ताव को ठुकरा दे और सीधे अमरीका से बातचीत करने की बात पर टिका रहे, दूसरा वह प्रस्ताव को मान ले और अपने हथियार डाल दे.

पहला रास्ता अपनाने पर यथास्थिति ही लंबे समय तक बरकरार रहेगी, और इस लंबे संघर्ष में कोई भी पक्ष जीतता हुआ नज़र नहीं आता.

अमरीकी राष्ट्रपति का भी कहना है कि वह अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी सेना की कार्रवाई की समयसीमा बेवजह नहीं बढ़ाना चाहते.

वहीं अगर तालिबान दूसरा रास्ता अपनाता है तो निश्चित तौर पर शांति प्रक्रिया की तरफ यह अहम पहल होगी.

एक अफ़ग़ान विशेषज्ञ जमशीदी ने नूर टीवी चैनल के साथ बातचीत में कहा, ''अगर तालिबान इस प्रस्ताव को मान जाता है तो इसका मतलब है कि काबुल वार्ता एक अच्छे माहौल में हुई थी.''

वैसे अगर तालिबान अफ़ग़ानिस्तान सरकार के प्रस्ताव को मान भी लेता है फिर भी उसके भीतर मौजूद तमाम दूसरे नेतृत्व उसमें बाधा खड़ी कर सकते हैं.

पिछले कुछ महीनों में तालिबान के दो प्रमुख धड़े बन गए हैं. एक मुल्ला हेबतुल्लाह अखुंद्ज़ादा के नेतृत्व वाला और दूसरा मुल्ला रसूल के नेतृत्व वाला.

दोनो ही धड़े एक दूसरे से विपरीत कार्य करते नज़र आते हैं. एक जहां शांति प्रयासों की तरफ अग्रसर है तो दूसरा उसे मानने से इंकार करता है.

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और अगर तालिबान आधिकारिक तौर पर भी इस प्रस्ताव को मान लेता है, तब भी यह मानना मुश्किल है कि उसके सदस्य आसानी से हिंसा का रास्ता छोड़ देंगे.

जैसा कि अफ़गान मामलों के जानकार सलीम सफ़ी ने पाकिस्तान के चैनल दुनिया में 28 फरवरी को कहा था, ''तालिबान अफ़गानिस्तान में शांति बहाल करने के लिए एकजुट और उतना ताकतवर नहीं है.''

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