उर्दू प्रेस रिव्यू: नवाज़ शरीफ़ न प्रधानमंत्री रहे, न पार्टी अध्यक्ष

  • 4 मार्च 2018
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पाकिस्तान से छपने वाले उर्दू अख़बारों में इस हफ़्ते शहबाज़ शरीफ़ को मुस्लिम लीग (नून) का अध्यक्ष चुने जाने और सीनेट के चुनाव से जुड़ी ख़बरें सुर्ख़ियों में रहीं.

सबसे पहले बात नवाज़ शरीफ़ की.

पिछले हफ़्ते पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका की सुनवाई के बाद अंतरिम फ़ैसला सुनाया था कि नवाज़ शरीफ़ अपनी पार्टी मुस्लिम लीग (नून) के अध्यक्ष पद पर नहीं बने रह सकते.

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Image caption शहबाज़ शरीफ़

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल (2017) नवाज़ शरीफ़ को पनामा लीक्स मामले में भ्रष्टाचार का दोषी पाया था और उन्हें प्रधानमंत्री पद पर बने रहने के अयोग्य ठहरा दिया था. अदालती फ़ैसले के बाद नवाज़ शरीफ़ ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. लेकिन वो पार्टी के अध्यक्ष बने हुए थे और इसके लिए उन्होंने संसद से एक बिल भी पास करवा लिया था.

लेकिन उनके विरोधियों ने उस बिल को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. उसी याचिका की सुनवाई करते हुए अदालत ने पिछले हफ़्ते उन्हें न सिर्फ़ पार्टी प्रमुख पर बने रहने के अयोग्य ठहरा दिया था बल्कि इस दौरान लिए गए उनके सभी फ़ैसलों को भी रद्द कर दिया था.

इस हफ़्ते सुप्रीम कोर्ट ने अपना पूरा फ़ैसला सुनाया.

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Image caption सुप्रीम कोर्ट, पाकिस्तान

'किंग बनने के योग्य नहीं'

अख़बार नवा-ए-वक़्त के अनुसार सुप्रीम कोर्ट का कहना था, ''जो किंग बनने के योग्य नहीं, उसे किंग मेकर बनने के लिए फ़्री हैंड नहीं दे सकता.''

अदालत ने कहा कि सिर्फ़ एक व्यक्ति यानी कि नवाज़ शरीफ़ को फ़ायदा पहुंचाने के लिए बनाया गया क़ानून दरअसल अदालत को आंख दिखाने जैसा है.

इस सियासी संकट का हल तलाशते हुए पार्टी ने नवाज़ शरीफ़ की जगह उनके छोटे भाई और पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री शहबाज़ शरीफ़ को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया है.

और नवाज़ शरीफ़ को जीवनभर के लिए मुस्लिम लीग (नून) पार्टी का संरक्षक चुन लिया गया है.

अख़बार जंग के अनुसार छह मार्च को होने वाली बैठक में शहबाज़ शरीफ़ को विधिवत रूप से अध्यक्ष चुन लिया जाएगा.

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शरीफ़ का जजों पर आरोप

अख़बार एक्सप्रेस के अनुसार इस अवसर पर पार्टी नेताओं को संबोधित करते हुए नवाज़ शरीफ़ ने सुप्रीम कोर्ट के जजों पर जमकर हमला किया.

उन्होंने कहा कि संविधान को छोड़कर किसी सैन्य शासक के हाथों वफ़ादारी की शपथ लेना सबसे बड़ा जुर्म है.

नवाज़ शरीफ़ ने किसी का नाम नहीं लिया लेकिन उनका इशारा पूर्व सेना प्रमुख और राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ की तरफ़ था.

ग़ौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जजों ने मुशर्रफ़ के कार्यकाल (1999-2007) के दौरान लाए गए प्रोविज़नल कंस्टीट्यूशनल ऑर्डर (पीसीओ) के तहत अपने पद की शपथ ली थी.

इस दौरान मुशर्रफ़ ने पाकिस्तान के संविधान को स्थगित कर दिया था और उसकी जगह नया अध्यादेश लाया था जिसे पीसीओ कहा जाता है. हालांकि कई जजों ने पीसीओ के तहत शपथ लेने से इंकार कर दिया था और अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.

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नवाज़ शरीफ़ ने कहा, ''ऐसे जज हमारे ख़िलाफ़ फ़ैसले दें और हम सर झुका कर उसी स्वीकार कर लें, ऐसा नहीं हो सकता.''

उन्होंने आगे कहा, ''70 साल से इस मुल्क में चुने हुए प्रधानमंत्रियों को काम नहीं करने दिया जा रहा, हमें इस बात पर ग़ौर करने की ज़रूरत है कि आख़िर कब तक ऐसा होता रहेगा, ये स्थिति जारी रही तो आख़िर मुल्क कैसे चलेगा?''

नवाज़ शरीफ़ ने कहा कि राजनेता सबसे आसान निशाना हैं, लेकिन सैन्य शासकों को कोई हाथ नहीं लगाता.

अख़बार जंग के संपादकीय पन्ने पर एक लेख छपा है जिसका शीर्षक है 'अगर नवाज़ शरीफ़ जेल चले गए तो'.

इसके लेखक अम्मार मसूद कहते हैं कि जेल जाने से सबसे ज़्यादा फायदा नवाज़ शरीफ़ की पार्टी को होगा. इसी साल के आख़िर में आम चुनाव होने वाले हैं और अगर उनकी पार्टी संसद के दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर लेती है तो वो फिर अपने हिसाब से सारे क़ानून पास कराने में सफल हो जाएगी.

लेख के मुताबिक़ नवाज़ शरीफ़ अब जो बात कह रहे हैं वो सिर्फ़ उनका निजी मामला नहीं रहा बल्कि वो संस्थागत परिवर्तन की बात कह रहे हैं. ऐसे में उनकी पार्टी की जीत से एक नए पाकिस्तान के बनने की संभावना बन रही है.

Image caption कृष्णा कोहली पाकिस्तान की पहली दलित सांसद

सीनेट की 52 सीटों के लिए चुनाव

इस हफ़्ते की दूसरी सबसे बड़ी ख़बर पाकिस्तानी संसद के ऊपरी सदन सीनेट की 52 सीटों के लिए होने वाला चुनाव है.

इस चुनाव में पंजाब में मुस्लिम लीग (नून) ने बाज़ी मारी तो सिंध प्रांत में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को सबसे ज़्यादा सीटें मिलीं.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के कारण मुस्लिम लीग नून के उम्मीदवार आज़ाद उम्मीदवार की हैसियत से चुनाव लड़े क्योंकि नवाज़ शरीफ़ के पार्टी अध्यक्ष रहते हुए उनको नामांकित किया गया था.

सीनेट चुनाव की सबसे ख़ास बात शायद कृष्णा कोहली को चुना जाना है.

सिंध प्रांत से पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की टिकट पर उन्हें चुना गया है. सिंध के थरपाकर की रहने वाली और अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय से आने वाली कृष्णा कोहली संसद पहुंचने वाली पहली दलित महिला हैं.

कृष्णा एक बहुत ही ग़रीब परिवार से आती हैं. उनके पिता एक ज़मींदार के यहां नौकरी करते थे.

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