अमरीका में एक राय हुए हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी

  • 4 मार्च 2018
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अमरीका में रहने वाले दक्षिण एशियाई समुदाय के अधिकतर लोगों ने बंदूकों को लेकर सख़्त क़ानूनों की मांग का समर्थन किया है. इनमें भारतीय और पाकिस्तानी दोनों शामिल हैं.

फ़्लोरिडा के पार्कलैंड एक स्कूल में हुई गोलीबारी में 17 छात्रों की मौत के बाद अमरीका में बंदूक क़ानूनों को लेकर बहस तेज़ हो गई है. अब दक्षिण एशियाई समुदाय भी इस बहस में शामिल हो गया है.

बंदूक़ों को लेकर ये मांग ऐसे समय में उठ रही है जब ट्रंप प्रशासन पहले से ही हथियारों की बिक्री पर सख़्त क़ानून लाने को लेकर दबाव में है.

हमले में बचे छात्र बंदूकों के ख़िलाफ़ अभियान चला रहे हैं और वो मार्च करते हुए देश की राजधानी वाशिंगटन भी पहुंच गये हैं.

डोनल्ड ट्रंप ने किया बंदूक रखने के नियमों में सुधार का समर्थन

अमरीका में गन कंट्रोल को लेकर सड़क पर उतरने की तैयारी में छात्र

स्कूल के लिए निकलने का डर

24 मार्च को छात्रों के साथ प्रदर्शन में उनके अभिभावक और कार्यकर्ता भी शामिल होंगे जो बंदूक क़ानूनों में कॉमन सेंस लागू करने की मांग करेंगे.

वहीं 14 मार्च को देशभर में बच्चों ने स्कूलों से वॉकआउट की घोषणा भी कर दी गई है.

14 फ़रवरी को जब स्टोनमैन डगलस स्कूल में एक पूर्व छात्र ने गोलीबारी की तो दक्षिणी फ्लोरिडा के पार्कलैंड में सक्रिय सामुदायिक नेता शेखर रेड्डी को उनके एक दोस्त ने कॉल किया था. उनका चौदह साल का बेटा हमले में घायल था और वो वो बहुत घबराए हुए थे. शेखर तुरंत स्कूल पहुंचे और घायल छात्र को अस्पताल पहुंचाया. फिलहाल उनके दोस्त के बेटे का इलाज चल रहा है और वो ख़तरे से बाहर है.

70 के दशक में भारत के हैदराबाद से अमरीका आकर बसे रेड्डी ने बीबीसी से कहा, "मैं स्कूल के काफी पास रहता हूं. अपने दोस्त के बेटे के बारे में सुनकर मैं भी बहुत घबरा गया था. हालांकि वो ख़तरे से बाहर है लेकिन जो उसने झेला है वो लंबे समय तक उसके साथ रहेगा. ये बच्चे जिस खौफ़ से गुज़रे हैं उसे सुनकर ही लोग कांप जाते हैं. उस दिन वो अपने घरों से इसलिए स्कूल के लिए नहीं निकले थे कि शाम को कफन में लिपटकर घर पहुंचें."

पीड़ित छात्र के परिवार ने बीबीसी से पहचान सार्वजनिक न करने की गुज़ारिश की है.

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रेड्डी दक्षिणी फ़्लोरिडा में एक कायमाब रिटेल व्यापारी हैं. उनके दो बच्चे हैं जो अमरीका में ही पले-बढ़े हैं. पहले वो बंदूक अधिकारों के समर्थक रहे हैं. लेकिन अब उनका मानना है कि 21 साल से कम उम्र के किसी भी व्यक्ति को बंदूक रखने का लाइसेंस नहीं दिया जाना चाहिए.

रेड्डी कहते हैं, "मैं संविधान में हुए दूसरे संशोधन का समर्थक हूं जो लोगों को बंदूक लेकर चलने का अधिकार देता है. लेकिन मैं मानता हूं कि बंदूकों के दुरुपयोग को रोकने के लिए सख़्त क़ानूनों की भी ज़रूरत है. ना ही मेरे पास बंदूक है और न ही दक्षिणी फ्लोरिडा में रह रहे करीब ढाई हज़ार हिंदू परिवारों के पास बंदूक है. हममें से बहुत से लोग बंदूकों के प्रति आकर्षित भी नहीं है क्योंकि हम एक शांतिप्रिय समुदाय से हैं लेकिन जो लोग शिकार के लिए बंदूक रखना चाहते हैं उनके पास बूंदकें होनी चाहिए."

स्कूल में बंदूक रखने की संस्कृति!

हाल ही में वाशिंगटन आए और जॉर्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों की पढ़ाई कर रहे अर्जुन शर्मा बूंदकें रखने के अधिकार के बिलकुल ख़िलाफ़ हैं. अन्य विकसित देशों से तुलना करते हुए अर्जुन कहते हैं, "ब्रिटेन या यूरोपीय देशों में स्कूलों में गोलीबारी की कोई घटना नहीं होती है क्योंकि वहां बंदूक रखने की संस्कृति को बढ़ावा नहीं दिया जाता है. हमारे पास बंदूक होनी ही क्यों चाहिए?"

अमरीका: स्कूल में गोलीबारी से 17 की मौत, संदिग्ध गिरफ़्तार

फ़्लोरिडा में हुई हिंसा पारंपरिक रूप से एक दूसरे के विरोधी रहे भारतीय और पाकिस्तानियों को भी एक साथ ले आई है. 80 के दशक में अमरीका में आए वाशिंगटन में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार अनवर इक़बाल के घर में तनाव है.

अपनी चिंता ज़ाहिर करते हुए इक़बाल कहते हैं, मेरे तीन बेटे हैं, तीनों एक साथ पैदा हुए थे. ये ख़बर सुनते ही हम स्कूल में अपने बच्चों की ओर दौड़े. हमारे बच्चे अब स्कूल में सुरक्षित नहीं है. ये क्या पागलपन है कि कोई भी हाथ में बंदूक लेकर स्कूल में आ सकता है और गोली चला सकता है. सुरक्षा के न कोई मानक हैं और न ही कोई इंतेज़ाम है.

स्कूल के वॉकआउट

इक़बाल अपने समूह 'साउथ एशियन फ्रेंड्स' के साथ 14 मार्च को होने वाले वॉकआउट में भाग लेने की तैयारी कर रहे हैं.

गोलीबारी की घटना फ्लोरिडा में हुई थी, लेकिन हमले में बचे छात्रों और शिक्षकों को देशभर में समर्थन मिल रहा है. प्रदर्शनकारियों ने गन लॉबी और बंदूकों पर नरम रवैया रखने वाले राजनेताओं को निशाना बनाया है. बढ़ते दबाव के बीच राष्ट्रपति ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि बंदूक ख़रीदने की उम्र कम से कम 21 वर्ष की जा सकती है.

उन्होंने आश्वासन दिया है कि मानसिक रूप से परेशान लोग बंदूक नहीं खरीद सकेंगे और ख़रीददारों की पृष्ठभूमि की सख़्ती से जांच की जाएगी. राष्ट्रपति ट्रंप ने शिक्षकों को छुपाकर रखे जाने वाले हथियारों से लैस करने का सुझाव भी दिया है. देश में जहां बहुत से लोग इस विचार का विरोध कर रहे हैं वहीं नेशनल राइफ़ल एसोसिएशन यानी एनआरए और ट्रंप के समर्थकों ने इसका स्वागत किया है.

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दुनियाभर के विकसित राष्ट्रों में गोली का शिकार हुए 15 साल से कम उम्र के 91 प्रतिशत बच्चे अमरीकी थे. लेकिन अमरीका में बंदूक बेचने वाली लॉबी इतनी ताक़तवर है कि बंदूकों की ख़रीददारी पर सख़्त क़ानून लाने के प्रयासों को वो नाकाम कर देती है. यही नहीं जो नेता ऐसा करने के प्रयास करते हैं उन्हें भी हरा दिया जाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी कंसेंसर रिपोर्ट में ये बात कही थी.

हिंदू अमरीकन फ़ाउंडेशन (एचएएफ़) ने भी बंदूक हिंसा को रोकने में नाकाम रहने पर सरकार की आलोचना की है. अपने बयान में संस्था ने कहा है कि बंदूक हिंसा से होने वाली मौतों से सभी अमरीकी नागरिक प्रभावित होते हैं जिनमें हिंदू अमरीकी नागरिक भी शामिल हैं.

बंदूक कानून पर छात्रों की मांग

अपने बयान में संस्था ने कहा है, "यह प्रांतीय सरकारों और संघीय सरकार की ज़िम्मेदारी है कि बंदूकों को लेकर निष्पक्ष, प्रभावी और कॉमन सेंस नियम स्थापित और लागू किए जाए ताकि हिंसा रोकी जा सके और समाज में नागरिकों की रक्षा की जा सके."

एचएएफ़ ने स्टोनमैन डगलस स्कूल में हुई गोलीबारी में बचे छात्रों की मांगों का समर्थन किया है. प्रदर्शन कर रहे छात्रों की मांग है कि देशभर में बंदूक बिक्री का कंप्यूटरीकृत रजिस्टर हो जिसमें ख़रीददारों के बारे में जानकारी हो और प्रत्येक बंदूक को बेचे जाने से पहले ख़रीददार के मानसिक स्वास्थ्य और आपराधिक रिकॉर्ड की सख़्ती से जांच की जाए.

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छात्रों की मांग है कि असॉल्ट राइफ़लों, सेना के स्तर के हथियारों, उच्च क्षमता वाली मैगज़ीनों की बिक्री पर भी रोक लगाई जाए.

सरकार से नाराज़गी

वाशिंगटन में कार्यरत मानवाधिकार कार्यकर्ता संजीव बैरी सरकार की आलोचना करते हुए कहते हैं, "एनआरए ने नेताओं को ख़रीद लिया है. कोई बदलाव कैसे आ सकता है जब बंदूक निर्माता ही इन नेताओं को अमीर बना रहे हैं."

ये पहली बार नहीं है जब अमरीका में बंदूक रखने और जीवन के अधिकार पर गंभीर चर्चा हो रही है. साल 2012 में एक स्कूल पर हुए हमले में 26 लोग मारे गए थे जिनमें बीस छात्र थे. उस समय भी सरकार से सुधार लागू करने की मांग उठायी गई थी लेकिन कुछ नहीं हुआ था. एक अनुमान के मुताबिक साल 2012 के बाद से अमरीका में एक हज़ार से अधिक गोलीबारी की घटनाएं हुई हैं जिनमें 18 हज़ार से अधिक लोग मारे जा चुके हैं.

हर घटना के बाद प्रदर्शनकारियों के भाषण में अमरीका की बंदूक संस्कृति को निशाना बनाया गया है, इस पर सेमिनार हुए हैं और शोध किए गए हैं, जांचें शुरू की गई हैं. हालांकि सरकार ने बंदूक हिंसा रोकने की मांगों को कभी नहीं माना है.

हालांकि इस बार अमरीका में नौजवानों का एक बड़ा हिस्सा आंदोलन में सामने आया है. हालांकि विशेषज्ञों का अभी भी यही मानना है कि अमरीका सुधार से दूर है.

अमरीका की राजनीति से परिचित पत्रकार इक़बाल कहते हैं, "इस साल चुनाव होने हैं. और तमाम दबाव के बावजूद कांग्रेस की ओर से कोई ठोस सुधार होने की उम्मीद नहीं है. मुझे लगता है कि इस बहस को और खींचा जाएगा और फिर ये भी बाकी मुद्दों की तरह हवा हो जाएगा. जैसा कि हादसों के बाद अकसर होता रहा है."

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