कैसे और कहां होगी ट्रंप और किम जोंग उन की मुलाकात

  • 12 मार्च 2018
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Image caption दक्षिण कोरिया के सियोल में दोनों नेताओं के बातचीत के लिए सहमत होने की ख़बर देखते लोग

कुछ महीने पहले की ही बात है जब अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग-उन को 'मैडमैन' और 'रॉकेटमैन' कहा था.

और ज़्यादा वक़्त नहीं बीता है जब किम जोंग-उन ने अमरीका को धमकी देते हुए कहा था कि परमाणु बम का बटन उनकी मेज़ पर ही है.

लेकिन दक्षिण कोरिया में हुए शीतकालीन ओलंपिक में उत्तर कोरिया की भागीदारी के बाद कूटनीतिक हालात तेज़ी से बदलकर ऐसे हो गए हैं जिसकी उम्मीद हाल-फ़िलहाल में किसी को नहीं थी. राष्ट्रपति ट्रंप ने एक दक्षिण कोरियाई अधिकारी के ज़रिये बीते गुरुवार को यह कहकर पूरी दुनिया को चौंका दिया कि वह किम जोंग-उन से मिलने को तैयार हैं.

तैयारी कैसे करेंगे?

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दोनों के बीच अगर मुलाक़ात हुई तो माना जा रहा है कि इसका मुख्य मुद्दा उत्तर कोरिया में परमाणु निरस्त्रीकरण होगा. इसके अलावा इस बैठक के संभावित लक्ष्यों के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है.

यह अमरीकी राष्ट्रपति का अनूठा दांव है. वह अपने उत्तर कोरियाई समकक्ष से मिलने वाले पहले अमरीकी राष्ट्रपति बन सकते हैं. अंतरराष्ट्रीय बातचीत में जैसी सचेत तैयारी और महीन कूटनीति की ज़रूरत होती है, वह 'टीम ट्रंप' का नैसर्गिक गुण नहीं रहा है. लेकिन अमरीकी इतिहास का सबसे हाईप्रोफ़ाइल द्विपक्षीय सम्मेलन अब इसी टीम के हाथों में है.

यह बातचीत दो महीनों के भीतर होनी है. दोनों पक्षों के लिए तैयारी एक अहम मसला है, लेकिन आप अप्रत्याशित फ़ैसलों के लिए कुख्यात दो नेताओं के बीच मुलाक़ात की तैयारी कैसे करेंगे?

स्टाफ़ की भर्ती

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Image caption नंवबर 2017 में दक्षिण कोरिया के सोल में अपनी यात्रा के दौरान अमरीकी राष्ट्रपति

अमरीका अपने विदेश मंत्रालय में खाली पड़े अहम कोरियाई पदों से शुरुआत करेगा. मुख्य उत्तर कोरियाई राजदूत जोसेफ़ युन ने फ़रवरी में इस्तीफ़ा दे दिया था और इसी महीने सोल में राजदूत के तौर पर विक्टर चा की नियुक्ति भी एक नीतिगत मतभेद की वजह से नहीं हो पाई थी.

उत्तर कोरिया के प्योंगयांग में ब्रिटिश मामलों के प्रभारी रहे जिम होर कहते हैं, "मुझे लगता है कि उन्हें कुछ समस्याएं पेश आने वाली हैं."

"अगर उनके पास पूर्व एशिया से डील करने का उचित तंत्र नहीं है तो यह बिल्कुल अलग हो सकता है. उनके पास पूर्वी एशिया के मामलों पर काम करने वाला सिर्फ़ एक अधिकारी है. विदेश मंत्रालय की हालत पस्त है और दक्षिण कोरिया में कोई राजदूत नहीं है. तो मुझे नहीं पता कि ट्रंप उत्तर कोरिया के बारे में किससे बात कर रहे हैं. मुझे नहीं पता किसी को भी यह पता भी है या नहीं."

'अव्यवस्थित और अचानक'

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कहा जा रहा है कि इस ऐतिहासिक मुलाक़ात के लिए सहमति बहुत ही अचानक और अव्यवस्थित ढंग से सामने आई है, जो इस नए अमरीकी प्रशासन के लिए बिल्कुल भी असामान्य बात नहीं है. 'न्यूयॉर्क टाइम्स' के मुताबिक, राष्ट्रपति को जब पता चला कि दक्षिण कोरियाई अधिकारी चुंग युइ-योंग व्हाइट हाउस में हैं तो उन्होंने उन्हें ओवल ऑफ़िस का बुलावा भेजा और किम के बारे में पूछा.

जब मिस्टर चुंग ने कहा कि उत्तर कोरियाई नेता आपसे मिलना चाहते हैं तो राष्ट्रपति तुरंत इस पर सहमत हो गए और चुंग से कहा कि वह प्रेस के सामने यह ऐलान कर दें.

एक बार फिर ट्रंप के विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन इसके लिए तैयार नहीं थे. इस अप्रत्याशित ऐलान के बाद टिलरसन ने रिपोर्टरों से कहा, "सीधी बातचीत के संदर्भ में, हमारे बीच बातचीत एक दूर का सफ़र है."

'कारगर हो सकती है ट्रंप की शैली'

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अमरीका के पूर्ववर्ती राष्ट्रपति उत्तर कोरिया जाने से बचते रहे हैं. कहा जाता है कि बिल क्लिंटन ने अपने विदेश मंत्री के वहां से लौटने के बाद साल 2000 में प्योंगयांग जाने पर विचार किया था, लेकिन अंतत: वे अपने कार्यकाल के आख़िरी वक़्त की प्राथमिकताओं में लग गए.

दक्षिण कोरिया में अमरीकी राजदूत रहे क्रिस्टफर हिल कहते हैं, "अमरीकी राष्ट्रपति से मुलाक़ात एक बेशकीमती राजसी सिक्का है. और यहां हमारे पास एक राष्ट्रपति हैं जो बिना यह सोचे कि उत्तर कोरियाई लोगों के मन में क्या है, उनसे मिलने को तैयार हैं."

पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे स्टीफ़न हेडली के मुताबिक, अमरीकी राष्ट्रपति की बार-बार उपहास उड़ाने वाली और अप्रत्याशित फ़ैसले लेने वाली शैली इस मामले में कारगर साबित हो सकती है.

वह कहते हैं, "उनकी शैली की बदौलत पहले ही एक अहम कामयाबी मिल चुकी है. उत्तर कोरिया पर उनकी बयानबाज़ी की ख़ूब आलोचना की गई. उसे ग़ैरज़िम्मेदार और लड़ाकू माना गया, लेकिन इसने उत्तर कोरिया और चीन दोनों का ध्यान खींचा. "

"अब खेल चीन को इस बात के लिए मनाने का है कि मौजूदा स्थिति बनाए रखने योग्य नहीं है. साथ ही उत्तर कोरिया को भी इस पर राज़ी करना है कि परमाणु हथियार अपने पास रखना उनकी सुरक्षा के लिए ज़्यादा बड़ा ख़तरा है, बजाय उन्हें छोड़ देने के."

"और मुझे लगता है कि ट्रंप के रवैये का इन दोनों ही दिशाओं में अहम असर है."

मुलाक़ात की जगह?

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बातचीत का स्थान क्या होगा, यह भी एक दिलचस्प पहेली बना हुआ है. किम जोंग-उन उत्तर कोरिया के नेता बनने के बाद से अपने देश से बाहर नहीं गए हैं और बहुत कम आसार हैं कि वह वॉशिंगटन आने का न्योता स्वीकार करेंगे.

ट्रंप प्योंगयांग जाएंगे तो इसे उत्तर कोरिया के लिए एक पीआर तोहफ़े के तौर पर देखा जाएगा और इसके आसार भी बहुत कम हैं.

होर कहते हैं, "प्रोटोकॉल का पालन करना बहुत मुश्किल होने वाला है. कौन किससे असहमत है और किन हालात में आदि. इसलिए एक तटस्थ जगह चुनना बहुत ज़रूरी है."

इन जगहों में चीन, दोनों कोरियाई देशों के बीच का असैन्य स्थान और अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में कोई स्थान हो सकता है.

मुलाक़ात की संभावित जगहें और वहां की दिक़्कतें:

  • अमरीका: ट्रंप की सुरक्षा कोई मसला नहीं, लेकिन किम के सहमत होने के आसार कम.
  • उत्तर कोरिया: किम की सुरक्षा कोई मसला नहीं, लेकिन ट्रंप के सहमत होने के आसार कम.
  • पैनमुंजोम (उत्तर और दक्षिण कोरिया की सीमा पर असैन्य इलाक़ा): दक्षिण कोरिया का असर बढ़ जाएगा.
  • चीन: बातचीत में चीन एक पक्ष बन जाएगा और उसके हित इसमें सीधे तौर पर शामिल हो जाएंगे.
  • अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र: तटस्थ जगह. नेताओं के सहमत होने के आसार.

लक्ष्यों की जानकारी

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राष्ट्रपति ट्रंप के लिए उत्तर कोरिया के संबंध में अमरीकी लक्ष्यों की सूक्ष्म जानकारी रखना जगह के चुनाव से ज़्यादा अहम होगा. होर कहते हैं, "अगर वे होमवर्क करके नहीं जाते तो उन्हें दिक़्कत होगी. वे ऐसे लोगों का सामना करेंगे जो अमरीकी मामलों पर वर्षों से काम कर रहे हैं. वे बोलेंगे नहीं, पर वे मिस्टर किम को अच्छी तरह सब कुछ समझा चुके होंगे."

एक और चुनौती होगी कि सब कुछ कैसा दिखेगा. यह 1961 का दौर नहीं है जब राष्ट्रपति जॉन कैनेडी विएना में निकिता ख्रुश्चेव से मिले थे. यह चौतरफ़ा मीडिया की मौजूदगी वाला दौर है जिसमें प्रत्येक शब्द तुरंत प्रसारित किया जाएगा और शारीरिक भाव-भंगिमाओं का भी सूक्ष्म विश्लेषण किया जाएगा.

लेकिन अगर ट्रंप कूटनीतिक त्रुटियों से ख़ुद को बचा सके और किम से संबंध बेहतर कर सके तो उनकी 'स्ट्रेट शूटिंग स्टाइल' वाली राजनीति उत्तर कोरिया की चुनौती से निपटने में कारगर साबित हो सकती है.

स्टीफ़न हेडली कहते हैं, "किम को बातचीत की मेज़ पर लाकर वह पहले ही बहुत लोगों को चौंका चुके हैं. हो सकता है कि उनकी अपरंपरागत राजनीति इस मुलाक़ात से चौंकाने वाले नतीजे लाने में कामयाब हो जाए."

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