अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान इतना ताक़तवर कैसे?

  • 14 मार्च 2018
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20 जनवरी को शनिवार का का दिन था. काबुल के इंटरकॉन्टिनेंटल होटल में काफ़ी भीड़ थी. लोग अपने डिनर का लुत्फ़ ले रहे थे.

तभी पिछले दरवाज़े से घुसे 6 तालिबानी आतंकियों ने होटल पर हमला कर दिया. उन्होंने ग्रेनेड फेंके और लोगों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाईं.

जल्द ही अफ़ग़ानी सुरक्षा बलों ने भी मोर्चा संभाल लिया था.

जब 14 घंटे बाद सुरक्षा बलों का ऑपरेशन ख़त्म हुआ, तो दर्जनों लोगों की मौत हो चुकी थी. बड़ी तादाद में लोग ज़ख्मी हुए थे. इसके कुछ दिनों बाद ही तालिबान ने एक व्यस्त सड़क पर धमाका करके सौ से ज़्यादा लोगों की जान ले ली.

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तालिबानी आतंकियों ने काबुल में एक अस्पताल पर भी पिछले महीने हमला किया था, जिसमें सौ से ज़्यादा लोग मारे गए थे.

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Image caption राजधानी काबुल में जनवरी में हुआ एक आत्मघाती बम हमला

पिछले कुछ महीनों में अफ़ग़ानिस्तान

एक वक़्त था, जब तालिबान का अफ़ग़ानिस्तान पर राज था. मगर 2001 में अमरीकी हमले के बाद तालिबान की सत्ता को उखाड़ फेंका गया.

सवाल ये है कि आज 17 साल बाद भी तालिबान अफ़ग़ानिस्तान में इतना ताक़तवर कैसे है?

बीबीसी की रेडियो सिरीज़ द इन्क्वॉयरी में इसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की हेलेना मेरीमन ने.

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तालिबान का उदय

अफ़ग़ानिस्तान के नक़्शे पर सबसे पहले तालिबान 90 के दशक में उभरा था. उस वक़्त देश भयंकर गृह युद्ध की चपेट में था. तमाम ताक़तवर कमांडरों की अपनी-अपनी सेनाएं थीं. सब देश की सत्ता में हिस्सेदारी की लड़ाई लड़ रहे थे.

अफ़ग़ानिस्तान पर गहरी समझ रखने वाले पत्रकार अहमद रशीद कहते हैं कि जब उन्होंने तालिबान का नाम सुना, तो चौंक गए. उनके ज़हन में सवाल उठा कि अचानक कौन से लोग इतने ताक़तवर हो गए?

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रशीद, कई दशक से अफ़ग़ानिस्तान के हालात पर रिपोर्टिंग करते आए हैं. वो कहते हैं, ''जब मैंने पहली बार नब्बे के दशक में उनका नाम सुना तो चौंक गया. मैं अफ़ग़ानिस्तान के हर लड़ाके को जानता था. पर तालिबान का नाम पहले कभी नहीं सुना था.''

लेकिन, अचानक ही अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान बेहद ताक़तवर हो गया था. देश की सत्ता पर क़ब्ज़े के लिए उन्होंने भी दूसरे लड़ाकों से जंग छेड़ दी थी. उन्हें हर मोर्चे पर जीत मिल रही थी.

तालिबान ने जनता से वादा किया कि वो देश को ऐसे लड़ाकों से मुक्ति दिलाएंगे. उन्होंने कुछ ही महीनों में दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान के एक बड़े हिस्से के लड़ाकों को हथियार डालने पर मजबूर कर दिया.

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तालिबान को पाकिस्तान से हथियार मिल रहे थे. तालिबान के बारे में नई बात ये थी कि उनकी जो इस्लामिक विचारधारा थी, वो इससे पहले अफ़ग़ानिस्तान में नहीं सुनी गई थी. लेकिन, चूंकि वो युद्ध से परेशान अफ़ग़ानिस्तान के लोगों को शांति और स्थायी हुकूमत दे रहे थे, इसलिए तालिबान को स्थानीय क़बीलों का भी साथ मिलने लगा.

एक बार अहमद रशीद तालिबान के एक गुट के साथ युद्ध के मोर्चे पर गए. वो ये देखकर हैरान रह गए कि तालिबानी लड़ाके बेहद कम उम्र के थे. कई तो महज़ 16-17 बरस के ही थे.

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वो जहां भी जाते थे, जश्न का माहौल हो जाता था. अहमद रशीद बताते हैं कि गांव दर गांव जीतते हुए एक दिन वो राजधानी काबुल तक पहुंच गए. दो साल की घेरेबंदी के बाद 1996 में उन्होंने राजधानी पर क़ब्ज़ा कर लिया.

सत्ता में आने पर तालिबान ने पहला काम किया कि राष्ट्रपति नज़ीबुल्लाह को सरेआम फांसी दे दी.

अहमद रशीद बताते हैं कि जल्द ही तालिबानी पुलिस ने अपना निज़ाम क़ायम करना शुरू कर दिया था. औरतों के घर से निकलने पर पाबंदी लगा दी गई. उनकी पढ़ाई छुड़वा दी गई. तालिबान ने जल्द ही देश में गीत संगीत, नाच-गाने, पतंगबाज़ी से लेकर दाढ़ी काटने तक पर रोक लगा दी.

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नियम तोड़ने वाले को तालिबानी पुलिस सख़्त सज़ा देती थी. कई बार लोगों के हाथ-पैर तक काट दिए जाते थे.

जल्द ही उन्हें लेकर डर और नफ़रत का माहौल देश भर में बन गया. मगर सत्ता पर उनकी पकड़ बेहद मज़बूत थी.

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11 सितंबर 2001 को अमरीका में अल क़ायदा ने आतंकवादी हमले किए. जांच में जब ये पता चला कि इन हमलों की साज़िश रचने वालों ने अफ़ग़ानिस्तान में पनाह ली थी तो अमरीका ने तालिबान को चेतावनी दी कि या तो इन आतंकियों को उसके हवाले कर दें या फिर हमले झेलें.

इसके बाद अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला बोलने का फ़रमान दे दिया. कुछ ही हफ़्तों के अंदर तालिबान की शिकस्त हो गई. अफ़ग़ानिस्तान के लोग इस बात से बेहद ख़ुश हुए. उन्होंने राहत की सांस ली थी.

तालिबान ने सत्ता के साथ-साथ लोगों का समर्थन भी गंवा दिया था. उन्हें अच्छे लोग नहीं माना जाता था.

लेकिन, इससे तालिबान का ख़ात्मा नहीं हुआ.

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Image caption अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी

जब तालिबान ने की वापसी

पैट्रीशिया गॉसमैन ह्यूमन राइट्स वॉच की सीनियर रिसर्चर हैं. तालिबान की हार के बाद वो अफ़ग़ानिस्तान गई थीं. उस वक़्त ये लगा था कि तालिबान का पूरी तरह से ख़ात्मा हो गया है.

मगर ऐसा नहीं था. अफ़ग़ानिस्तान पर नाटो का क़ब्ज़ा होने के बाद बहुत से तालिबानी लड़ाके अपने-अपने गांव चले गए. नाटो कमांडरों को ये बात पता थी. वो इनका ख़ात्मा करना चाहते थे. इसके लिए नाटो ने तालिबान विरोधी लड़ाकों को हथियार मुहैया कराने शुरू कर दिए.

पैट्रीशिया बताती हैं कि वो दौर बेहद बुरा साबित हुआ. जिसे भी ज़मीन हड़पनी होती थी या किसी महिला से शादी ही करनी होती थी तो वो इसका विरोध करने वालों को तालिबानी कमांडर कहकर मार देता था. अमरीकी सेनाओं ने इसे नहीं रोका.

नतीजा ये हुआ कि तालिबान कमांडरों के ख़ात्मे के नाम पर ज़ुल्म की इंतेहां हो गई. पैट्रीशिया बताती हैं कि कई लोग बारातों के बारे में नाटो कमांडरों को ग़लत जानकारी देते थे कि ये तालिबानी लड़ाके हैं. नाटो के विमानों ने ऐसे कई काफ़िलों पर बम बरसाकर हज़ारों बेगुनाहों का ख़ून बहाया.

अफ़ग़ानिस्तान के ताक़तवर तालिबान विरोधी लड़ाकों ने पश्तूनों को निशाना बनाना शुरू कर दिया. वो अमरीकी या नाटो सैनिकों का इंतज़ार करने के बजाय ख़ुद ही हमले करके लोगों को मारने लगे.

पश्तूनों को लगा कि उनका तो इस देश में कोई नहीं. वो अमरीका, नाटो और तालिबान विरोधी लड़ाकों के निशाने पर थे.

काबुल में बैठी कठपुतली सरकार लाचार थी. अफ़ग़ानिस्तान के एक बड़े हिस्से में कोई निज़ाम ही नहीं था. सिर्फ़ अपनी-अपनी सत्ता क़ायम करने की जंग चल रही थी.

ऐसी लाचारी की हालत में पश्तूनों को लगा कि इनसे बेहतर तो तालिबानी राज ही था.

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जब अफ़ग़ानिस्तान में नहीं बची कोई सत्ता

इक्कीसवीं सदी में भी काबुल में हालात ऐसे थे जैसे लोग मध्य युग में रह रहे थे. उस दौर में सरकारी नौकरी कर रहे काबुल के निमिद बेज़ान कहते हैं कि लोग सरकारी दफ़्तरों में काग़ज़-क़लम लेकर काम करते थे. कंप्यूटर नहीं थे.

सरकार के काम-काज से भ्रष्टाचार बढ़ने लगा. विदेशी मदद पर चल रही सरकार बेअसर थी. निमिद कहते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान के पुनर्निर्माण के लिए ज़रूरी संसाधन नहीं थे. देश के एक बड़े हिस्से पर कोई हुकूमत ही नहीं थी. न पुलिस थी, न दूसरे सरकारी अमले.

सत्ता के इस शून्य में ही एक बार फिर से तालिबान की वापसी हुई.

तालिबानी लड़ाके गांव-गांव जाकर फिर समर्थन जुटाने लगे. बुनियादी चीज़ों के लिए जूझते लोगों पर दबाव बनाया. निमिद कहते हैं कि तालिबानी लड़ाके गांवों की बिजली काट देते थे. फिर जो पैसा देता था, उसी की बिजली सप्लाई बहाल होती थी. इस तरह से तालिबान ने करोड़ों की रक़म जुटा ली.

तालिबान ने अफ़ीम की खेती भी शुरू कर दी. हज़ारों टन अफ़ीम का उत्पादन करके तालिबान ने करोड़ों रुपए का कारोबार शुरू कर दिया. अवैध वसूली और अफ़ीम की खेती से हुई आमदनी से अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान एक बार फिर से ताक़तवर हो गया था.

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अब वो नए दौर के हिसाब से बदल भी रहे थे. कभी टीवी पर पाबंदी लगाने वाले तालिबानी लड़ाकों ने अपने प्रचार के लिए वीडियो बनाने शुरू कर दिए थे. वो दावा करते थे कि जनता उनके साथ है और वो एक बार फिर दुनिया को चौंकाने को तैयार हैं.

वो सोशल मीडिया, इंटरनेट और टीवी का बख़ूबी इस्तेमाल कर रहे थे. धीरे-धीरे तालिबानी राज फिर से पांव पसारने लगा था. गांवों से क़स्बों और क़स्बों से शहरों तक उनकी हुकूमत फैल रही थी.

अगर आप ये सोचें कि ये सब सिर्फ़ अवैध वसूली और अफीम की खेती से हुई कमाई से हुआ था, तो ऐसा नहीं था. अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के दोबारा उभरने के पीछे थी एक विदेशी ताक़त.

एंटोनियो जस्टोसी ने संयुक्त राष्ट्र संघ के लिए अफ़ग़ानिस्तान में काम किया है. एक दौर में वो आराम से काबुल से बाहर जाकर घूमकर लौट आते थे. ऐसे ही कई दौरों में वो तालिबानी लड़ाकों से भी मिले थे. मगर अब ऐसा करना ख़तरे से ख़ाली नहीं.

एंटोनियो कहते हैं कि तालिबान को कई देशों से समर्थन मिलता है. इनमें से पहले नंबर पर है पाकिस्तान. पाकिस्तान शुरू से ही तालिबान का समर्थन करता रहा है. वो उन्हें हथियार, पैसे और छुपने की जगह मुहैया कराता रहा है.

तालिबानी सेना में भर्ती के लिए पाकिस्तान में मौजूद अफ़ग़ानी शरणार्थी बहुत काम आते हैं. वो सताए हुए बेघर, बेमुल्क़ लोग अपने वतन के लिए लड़ने और जान गंवाने के लिए आसानी से तैयार हो जाते हैं.

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एंटोनियो कहते हैं कि आज की तारीख़ में अफ़ग़ानिस्तान में दो लाख या इससे भी ज़्यादा तालिबानी लड़ाके हैं. इनमें से ज़्यादातर पाकिस्तान के शरणार्थी कैंपों से आए हुए लोग हैं.

तालिबानी लड़ाकों की तादाद आज इस्लामिक स्टेट या अल-क़ायदा जैसे चरमपंथी संगठनों से भी ज़्यादा है.

इन लड़ाकों को नियमित रूप से तनख़्वाह देनी होती है. तालिबान ये ज़रूरत सिर्फ़ पाकिस्तान की मदद से पूरी नहीं कर सकता. इसलिए उसने नए दोस्त तलाश लिए हैं.

2005 में नाटो सेनाओं ने अफ़ग़ानिस्तान में अपना दायरा बढ़ाना शुरू कर दिया था. नाटो ने दक्षिण और पश्चिम में यानी ईरान से लगी सीमा पर हमले तेज़ कर दिए थे.

पाकिस्तान के अलावा ईरान ने भी तालिबान को एक दौर में पैसे, हथियार और छुपने की जगह मुहैया कराई थी. हालांकि अब ईरान, तालिबान को सपोर्ट नहीं करता.

मगर, तालिबान ने नया सहयोगी तलाश लिया है. अमरीका का आरोप है कि अब अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान को रूस से हथियार और दूसरी मदद मिल रही हैं. हालांकि रूस ने इससे इनकार किया है.

सवाल ये है कि रूस तालिबान की मदद क्यों कर रहा है? कुछ जानकारों का कहना है कि रूस इस्लामिक स्टेट से लड़ने के लिए तालिबान की मदद कर रहा है.

वहीं, एंटोनियो जस्टोज़ी कहते हैं कि रूस असल में अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका से अपनी कुछ बातें मनवाना चाहता है. इसीलिए वो तालिबान की मदद करके अमरीका को ये संकेत दे रहा है कि हमारी भी शर्तें मानो.

तालिबान के ठिकानों से मिले रूसी हथियार इस बात की तस्दीक़ करते हैं. लेकिन, इसमें कोई दो राय नहीं कि तालिबान को कई देशों से हथियार और पैसे मिल रहे हैं. पाकिस्तान और ईरान में उन्हें छुपने के ठिकाने भी मिल रहे हैं. इसीलिए वो आज की तारीख़ में दोबारा बेहद ताक़तवर हो गए हैं.

पाकिस्तान, ईरान और रूस से मिल रहे हथियार और अफ़ीम की खेती से तालिबान बेहद मज़बूत हालात में पहुंच गए हैं. युद्ध से बेहाल लोग उनकी पनाह में जाकर अमन चाहते हैं.

भले ही तालिबान आज अफ़ग़ानिस्तान में सत्ता के क़रीब न हों मगर उनके विरोधी हार ज़रूर रहे हैं.

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