ब्लॉगः 'भले ही पाकिस्तान रवांडा से हार जाए पर भारत हरगिज़ नहीं जीतना चाहिए'

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वैसे तो संयुक्त राष्ट्र के लिए बनाई गई ख़ुशबाश-मस्त देशों की ताज़ा हैपीनेस इंडेक्स में पाकिस्तान अपने सभी हमसायों से कई प्वाइंट्स आगे है.

मगर ये कोई उछलने वाली बात नहीं. क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान ख़ुश है कि नहीं, हमें क्या? ईरान से आजकल बस दुआ-सलाम, नमस्कार की हद तक लेना-देना है.

वो ख़ुश है या उदास, वो जाने. श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश की ख़ुशी-नाख़ुशी भी हमारे लिए दूर को कौड़ी जैसी है.

असल ख़ुशी तो ये है कि इस सूची के अनुसार भारत, पाकिस्तान जैसे मस्त देश से पक्का-पक्का 58 अंक पीछे है.

अगर मामला उलटा होता तो फिर हम निराश और भारत ख़ुश होता.

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'भले रवांडा से ही हार जाए...'

भले डिप्लोमेसी, क्रिकेट हो या अंतरराष्ट्रीय हैपीनेस इंडेक्स, हम जीतें या न जीतें, कोई दुख नहीं.

पर दूसरा हरगिज़-हरगिज़ नहीं जीतना चाहिए, भले रवांडा से ही हार जाए... मगर हार जाए.

बस यही तो हमारी जीत है, यही तो हमारी ख़ुशी है.

बिल्कुल ऐसी ही जैसे एमनेस्टी और ह्यूमन राइट्स वॉच वगैरह मानवाधिकार को लेकर कश्मीर के मुद्दे, मीडिया, पत्रकारों की कम होती आज़ादी और जकड़बंदियों पर जब भारत को रगेदते हैं तो हम फूले नहीं समाते- देखा हम न कहते थे, भारत को दूसरे पर उंगली उठाने से पहले अपने गिरेबां में झांकना चाहिए.

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ये रिपोर्ट भी न...

और जब यही एमनेस्टी और ह्यूमन राइट्स वॉच बगैरह बिल्कुल इसी रिपोर्ट में पाकिस्तान में अल्पसंख्यक वर्गों के रोज़-ब-रोज़ होते बुरे हालात या गुप्तचर संस्थाओ के हाथों राजनीतिक, सामाजिक कार्यकर्ताओं के ग़ायब हो जाने की घटनाओं की निंदा करते हैं तो उस वक़्त जश्न मनाने की बारी भारत की और ये कहने की बारी हमारी होती है कि एमनेस्टी बगैरह की रिपोर्टें तो हैं ही झूठी, जिनका उद्देश्य भारत, अमरीका और यहूदी लॉबी की शह पर पाकिस्तान को बदनाम करना है.

भारत चाहे तो मस्त-ख़ुशबाश देशों की सूची ये कहके रद्द कर सकता है कि ऐसा कैसे हो सकता है कि जब शिक्षा, रक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक तरक्की के मैदान में पाकिस्तान हमसे पीछे है तो हमसें 58 प्वांइट्स ज़्यादा ख़ुश कैसे माना जा सकता है?

जब भारत ये ऐतराज़ उठाएगा तो हमारे पास भी कहने को होगा कि ख़ुशी अगर तरक्की से आती तो इस वक़्त कम से कम चीन को तो पाकिस्तान से ज़्यादा ख़ुश नज़र आना चाहिए था.

मगर वो इस सूची में पाकिस्तान से 11 पायदान पीछे क्यों है? तो क्या इसका मतलब ये हुआ कि तरक्की करने के बारे में सोचना ही नहीं चाहिए.

क्या हमें अंतरराष्ट्रीय सर्वे और रिपोर्टों को देख कर अपनी-अपनी किस्मतों के फ़ैसले करने चाहिए?

इन सवालों पर भी समय आने पर गौर करेंगे पर अगला अंतरराष्ट्रीय सर्वे आने तक तो ख़ुश होने दें.

हां तो भारतवासियों आख़िर तुम ख़ुश नहीं हो? इस सवाल का तुम जो भी उत्तर दो हम सुनेंगे थोड़ी, क्या तुम हमारे उत्तर सुनते हो?

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