पैमाने पर रहम नहीं करने वाले व्लादिमीर पुतिन

  • 26 मार्च 2018
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Image caption 1999 में पुतिन रूस की सत्ता में आए

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप उनके प्रशंसक हैं और उनके प्रतिद्वंदी उनके जोशीले तेवर से घबराते हैं.

व्लादिमीर पुतिन ग़रीबी में पले-बढ़े. वो सेंट पीटर्सबर्ग के एक छोटे से अपार्टमेंट में रहे और आज दुनिया के सबसे ताक़तवर हस्तियों में से एक हैं. हाल ही में वो चौथी बार रूस के राष्ट्रपति चुने गए हैं.

वो बीते 18 साल से रूस पर राज कर रहे हैं, लेकिन उन्होंने ऐसा कैसे किया ये कइयों के लिए एक पहेली है. सच ये है कि वो इस धरती पर सबसे निडर नेताओं में से एक हैं.

बीबीसी की नई डॉक्युमेंट्री "पुतिन, द न्यू ज़ार" में उनके करियर के उतार-चढ़ावों के बारे में बताया गया है.

ब्रिटेन के पूर्व विदेश मंत्री विलियम हेग ने उनके लिए कहा था, "वो एक ऐसे शख़्स हैं जिन्होंने पश्चिमी नेताओं की कमज़ोरी का फ़ायदा उठाया और एक नए तरह का युद्ध छेड़ दिया."

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लेकिन रूस के पूर्व सीनेटर सर्गेई पगाचेव जैसे लोग उनके लिए कुछ ऐसा कहते हैं, "वो एक कमज़ोर, लालची, ईर्ष्या से भरे और हमेशा झूठ बोलने वाले इंसान हैं."

सच्चाई ये है कि पुतिन की मानसिकता की पीछे उनकी ताक़त है. अब वो फिर से चुनाव जीतकर 2024 तक सत्ता पर क़ाबिज़ हो गए हैं. उन्होंने आठ अन्य उम्मीदवारों को पीछे छोड़ जीत हासिल की है.

दशकों से पुतिन के पारिवारिक दोस्त रहे और चुनावी मैदान में चुनौती देने की कोशिश करने वाले लोगों में एक क्सेनिया सोबचक कहते हैं कि चुनाव से पहले ही रूस के लोगों को पता था कि चुनाव में जीत पुतिन की ही होगी.

उन्होंने कहा, "पुतिन ने ऐसा सिस्टम बनाया कि उन्होंने किसी को जीतने ही नहीं दिया. ये एक अन्यायपूर्ण सिस्टम था."

लेकिन सुरक्षा सेवा 'केजीबी' से जुड़ा एक मामूली सा कर्नल आख़िर कैसे सत्ता के शिखर तक पहुंच गया?

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केजीबी से राजनीति तक का सफ़र

बात 1970 की है जब 'भविष्य के ज़ार' का कोई नामो निशान नहीं था.

पुतिन का जन्म एक बेहद ग़रीब परिवार में हुआ और वो सेंट पीटर्सबर्ग के पड़ोसी इलाक़े में बहुत ही मुश्किलों भरे हालात में पले-बढ़े. लेकिन उन्होंने संघर्ष से विश्विद्यालय में पढ़ाई पूरी की और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कमेटी, केजीबी में एक मामूली सा ओहदा हासिल किया.

लेकिन ये नौकरी सोवियत संघ के बिखरने तक ही जारी रही.

पूर्व सीनेटर सोबचक कहते हैं, "मैं पुतिन को 1992 से जानता हूं. हम डाचा (कंट्री हाउस) के पड़ोसी थे."

"केजीबी में पुतिन बहुत ही साधारण से पद पर तैनात थे. वहां उनके जैसे हज़ारों थे. उन्हें सिस्टम ने, सोवियत संघ ने त्याग दिया था. वो सड़क पर आ गए थे, उन्हें किसी तरह की महत्वकांक्षाएं नहीं थीं. और राजनीतिक महत्वकांक्षा तो बहुत ही कम थी. मेयर ऑफिस तक पहुंचना उनके लिए संयोग की बात थी."

उस समय की उथल-पुथल में सेंट पीटर्सबर्ग, एनाटोली सोबचक को एक मज़बूत शख़्स की ज़रूरत थी और तब उन्हें केजीबी का अधिकारी इसके लिए एकदम सही विकल्प लगा.

इसलिए, केजीबी का एक विनम्र एजेंट होने की वजह से एक साधारण से सरकारी नौकर पुतिन ने अपने राजनीतिक पारी की शुरुआत की.

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Image caption 1999 में पुतिन बोरिस येल्तसिन के उत्तराधिकारी बने

जब पुतिन चुनाव बिना बने राष्ट्रपति

1990 के अंत में सोवियत रूस टूटने की कगार पर था. देश एक शराबी राष्ट्रपति के हाथों में था और माफियाओं की लड़ाई से जूझ रहा था. इस बीच कई भ्रष्ट पूंजीपति ऐसे थे जो खुलेआम क़ानून और व्यव्स्था से खिलवाड़ कर रहे थे.

कई लोगों को लगता है कि उस वक़्त देश को एक ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत थी जो उन्हें इन परिस्थितियों से उबार सके. येल्तसिन साफ़ तौर पर उप प्रधानमंत्री बोरिस नेमत्सोव के उत्तराधिकारी थे, जो कि एक करिश्माई व्यक्तिव वाले, अच्छे वक्ता और सैद्धांतिक आदमी थे.

लेकिन जब उन्होंने चेचन्या के युद्ध का विरोध किया तो येल्तसिन को उनसे नफ़रत हो गई.

हालांकि एक और शख़्स था जो संभावित उम्मीदवार हो सकता था. वो थे पुतिन, जो मॉस्को में 1996 में सरकार से जुड़े थे लेकिन वो साधारण कर्मी के तौर पर रखे गए थे.

येल्तसिन के जन संपर्क अधिकारी ग्लेब पावलोव्सकी के राष्ट्रपति के उत्तराधिकार का काम सौंपा गया था. उन्होंने बीबीसी से कहा, "मैं एक राष्ट्रपति को चुनने के लिए एक मशीन बना रहा था, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा कि वो राष्ट्रपति कौन था."

"मैंने अभियान की 'स्क्रिप्ट' तैयार की. मेरे पास वो सब कुछ था जो जीत के लिए ज़रूरी था. बूढ़े और बीमार पूर्व राष्ट्रपति येल्तसिन से ज़्यादा युवा, ऊर्जा से भरा हुआ और खिलाड़ी उम्मीदवार. मेरे ख़्याल में, पुतिन उस स्क्रिप्ट पर पूरी तरह खरे उतरने लगे थे."

लेकिन चुनाव सिर्फ़ छह महीने दूर थे और रूस के मतदाताओं के लिए पुतिन अनजाना चेहरा थे. पुतिन ने उम्मीदवारी के लिए हां करने से इनकार कर दिया था.

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एक अनुभवहीन नेता की कोशिशें

उस वक़्त रूसी राष्ट्रपति भवन 'क्रेमलिन' के सलाहकार रहे सर्गेई याद करते हैं, "पुतिन ने कहा कि वो इसके लिए तैयार नहीं है."

आज के वक़्त में राष्ट्रपति के धुर आलोचक सर्गेई कहते हैं, "मैं चाहता था कि येल्तसिन राष्ट्रपति पद छोड़ दें और पुतिन को उनकी जगह अंतरिम राष्ट्रपति नियुक्त कर दिया जाए. इससे पुतिन को राष्ट्रपति बनने के लिए चुनावों का सामना नहीं करना पड़ता."

रूस के कई नागरिक ख़ुद से सवाल कर रहे थे कि उनका राष्ट्रपति आख़िर है कौन.

डबलिन में ट्रिनीटी कॉलेज के इंस्टिट्यूट ऑफ द न्यूरोसाइंस के निदेशक इयन रोबर्टसन के मुताबिक उसके बाद से पुतिन एक पब्लिक फिगर बन गए.

"अगर आप राष्ट्रपति मान लिए जाते हैं तो आपके अंदर एक अलग सी ऊर्जा का संचार होने लगता है."

"क्योंकि आपको कभी सिखाया ही नहीं गया कि शक्ति की कुछ सीमाएं हैं. आपको इस तरह के सिस्टम की तालीम मिली है जहां किसी तरह का लोकतंत्र और विचारधारा नहीं है. कम्युनिस्ट विचारधारा ख़त्म हो चुकी थी और जो बचा थी वो थी पैसे की विचारधारा और उसकी ताक़त."

पुतिन का कोई बैकग्राउंड और राजनीतिक अनुभव नहीं है, उन्होंने बहुत कम मौक़े पर भाषण दिए होंगे. जो लोग उन्हें उस वक़्त जानते थे वो बताते हैं कि राष्ट्रपति की गद्दी पर पहुंचने से वो बहुत ही घबराए हुए और हैरान थे.

लेकिन वो एक बहुत ही चतुर इंसान भी थे. अपने कार्यकाल के पहले साल में उन्होंने दुनिया के बाक़ी हिस्सों के साथ रूस के रिश्तों को फिर से बेहतर करने की कोशिशें की. उन्होंने पश्चिम के शीर्ष नेताओं में जगह बनाने की भी पूरी कोशिश की.

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पुतिन के लिए पैसे का महत्व

जब रूस के लोगों ने विश्व पटल पर अपने राष्ट्रपति को मिल रहे सहयोग को देखा और सुस्त चल रही अर्थव्यवस्था को जिस तरह पुतिन ने संभाला. इन सभी कारणों ने उनकी लोकप्रियता को बढ़ाने में अहम रोल निभाया.

लेकिन दूसरी ओर पुतिन की निजी पुरस्कार पाने की चाहत भी जागी.

सिनेटर सर्गेई कहते हैं, "पुतिन को लग रहा था कि वो ज़्यादा समय तक राष्ट्रपति नहीं रहने वाले. उन्होंने सोचा कि उन्हें हटा दिया जाएगा और इसलिए वो चाहते थे कि उन्होंने जो कुछ भी किया उसके लिए उन्हें मोटा इनाम दिया जाए."

"वो इनाम चाहते थे ताकि वो अपनी बाक़ी बची ज़िंदगी शांति, ख़ुशी और ऐशो आराम से बिता सकें. उनके लिए ये सब सिर्फ़ पैसे से हो सकता था, पुतिन ग़रीब थे, बहुत ज्यादा ग़रीब."

इसके बाद राष्ट्रपति ने अपने चारों ओर अपने परिचितों का घेरा बना लिया, इनमें ज़्यादातर उनके केजीबी के पूर्व सहयोगी थी.

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Image caption पुतिन की पहली सरकार में परिवहन उप मंत्री रहे और पूर्व केजीबी डिप्यूटी व्लादिमीर याकुनिन

आर्थिक नियंत्रण

ख़ुद को और ताक़तवर बनाने की कड़ी में पुतिन ने रूस की बड़ी कंपनियों के लिए नियमों में कई बदलाव कर दिए.

पुतिन की पहली सरकार में परिवहन उप मंत्री रहे और पूर्व केजीबी उप प्रमुख व्लादिमीर याकुनिन ने बीबीसी से कहा, "उस वक़्त रूसी संघ की 46% जीडीपी आठ परिवारों की निजी कंपनियां से आ रही थी."

"और डर था कि अर्थव्यवस्था की नियंत्रण इन्हीं आठ परिवारों के हाथ में आ जाएगा. ये डर ऐसा था जो देश के किसी भी हिस्से में एक सा होगा: वो था असमानता का डर."

पुतिन ने अपना ध्यान अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण करने वाली उन आठ कंपनियों पर केंद्रित किया.

2003 की शुरुआत में एक तरफ़ रूस का नेतृत्व करने वाला था तो दूसरी तरफ़ वो था जो आधी आबादी का मालिक था. दोनों के बीच का मुख्य विवाद था: भ्रष्टाचार.

मिखाइल जोडोरकोवस्की कु वर्ग के प्रवक्ता और दुनिया के चौथे सबसे अमीर इंसान थे. क्रेमलिन को संदेह था कि वो अपने अथाह धन को राजनीतिक प्रभाव में बदलने की कोशिश करेंगे.

लेकिन उस नियोक्ता ने एक गंभीर चूक कर दी. बैठक के दौरान उन्होंने देश में भ्रष्टाचार के उदाहरण के तौर पर बहुत बड़े तेल व्यापार में हुए क़रार को पेश किया. ये एक ऐसा मोलभाव था जिसके बारे में पुतिन को जानकारी थी.

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इसके कुछ समय बाद ही, उस शक्तिशाली उद्योगपति को गिरफ्तार कर लिया गया और उनपर धोखाधड़ी का मामला दर्ज हुआ. सरकार ने उनकी सारी संपत्ती को फ्रीज़ कर दिया और उनकी तेल कंपनी यूकोस को बेच दिया. पहले साइबेरिया का एक वोदका बिज़नेसमैन और फिर पुतिन के करीबी सलाहकार के नियंत्रण वाली एक कंपनी.

पश्चिम में इस फैसले को लेकर हैरानी जताई गई, क्योंकि यूकोस रूस के तेल उद्योग के लिए एक मॉडल की तरह था और इसकी पश्चिम में काफी सराहना भी की जाती थी. कई लोगों को ये बहुत ही जोखिम भरी नीति लगी, लेकिन पुतिन के लिए जोडोरकोवस्की को सज़ा देना इसलिए ज़रूरी था क्योंकि ऐसा ना करने से आर्थिक मोर्चा पिछड़ सकता था.

और रूस के लोगों ने इस क़दम का उत्साह से स्वागत किया. लोग मानते थे कि उनका राष्ट्रपति कुलिन वर्ग से लड़ रहा है.

नई कैबिनेट और पुतिन ने देश में स्थिरता और शांति को स्थापित किया. ऐसा लग रहा था कि पुतिन ने बड़े से देश में सालों से छाएं अधेरे को छांटने में सफल रहे.

पड़ोसी देशों के विवाद

पुतिन अंदरूनी तौर पर तो मज़बूत हो गए थे, लेकिन रूस के पड़ोसी देशों में समस्याएं उठ खड़ी हुईं. जॉर्जिया में उनके सहयोग से एक क्रांति का समापन हो गया था और सुधारक सत्ता में आय, जिसका नाम था: मिखाइल साकाशविली.

पुतिन के लिए ये बहुत ही खीज की बात थी कि साकाशविली ने अपने पूर्ववर्तियों से उलट रूस से दूर जाकर अमरीका की ओर झुकाव कर लिया था.

रूस के पड़ोसी देश यूक्रेन में भी क्राति की लौ जलने लगी थी. इस बार, 2004 का "ओरेंज रिवॉल्यूशन" इस देश के राष्ट्रपति विकटोर यानुकोविच के लिए भारी पड़ा. वो अपने प्रतिद्वंदी विकटोर युशचेंको के हाथों चुनाव हार गए. क्रेमलिन ने युशचेंको को वॉशिंगटन के हाथों की 'कठपुतली' मानती थी.

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पावलोवस्कि ने कहा, "पुतिन का मानना था कि युशचेंको की जीत के पीछे अमरीकियों का हाथ है, लेकिन असल में ये एक खुला युद्ध था जिसे मॉस्को हार चुका था."

ये पुतिन के लिए बहुत ही शर्मिंदगी की बात थी और 18 साल के कार्यकाल में सबसे मुश्किल वक्त.

मॉस्को में कई लोग ये सोचने लगे थे कि क्या राष्ट्रपति अपने कार्यकाल के अंत तक टिक पाएंगे.

जॉर्जिया और यूक्रेंन रूस और पश्चिम के बीच विवाद का नया क्रेंद्र बन गया.

पूर्व ब्रिटिश विदेश मंत्री जैक स्ट्रॉ का मानना है कि इन नए तनावों में सबकी बराबर की ज़िम्मेदारी है.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "पश्चिम की नज़र में ये कहानी का अंत था, उदार पूंजीवाद की जीत हुई थी. ये रूसियों के लिए मुश्किल था, लेकिन हमें इसे अलग तरीके से संभालना चाहिए था. हमने सोचा ही नहीं कि रूस पर इसका क्या असर होगा. हमने रूस के लोगों को इस बात से डराने की कोशिश की कि वो हमेशा विरोधियों से घिरे रहते हैं."

"बीती बातों को देखते हुए मुझे लगता है कि हमने उन चिंताओं को जन्म दिया और हम ऐसा करने से बच सकते थे. इसी के आधार पर पुतिन की बाद की नीतियां बनीं."

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अंदरूनी चुनौतियां

हालांकि 2005 में सब कुछ बदल गया. पुतिन ने रूस और उसके लोगों पर ध्यान केंद्रित करने का फ़ैसला किया.

आधुनिकीकरण हुआ और पश्चिम को लुभाने की कोशिश की गई. फिलहाल पश्चिम के लिए पुतिन के मन में सिर्फ़ अविश्वास है. एक नया नारा जो गुंजने लगा वो था: पुतिन रूस है और रूस पुतिन. वो अपने देश के पुर्ननिर्माण के लिए प्रतिबद्ध हैं.

लेकिन एक समस्या थी, दो साल में पुतिन को सत्ता छोड़नी पड़ी. एक नए राष्ट्रपति का चुनाव किया जाना था और उदारवादी क्षेत्रों के उम्मीदवार अभियानों के लिए तैयारी कर रहे थे. उनमें से एक थे देश के जाने माने और रूतबेदार आदमी, गैरी कासपारोव.

कारपारोव ने बीबीसी से कहा, "2007 में पुतिन के लिए चले जाने की अच्छा अवसर था. वो दुनिया के शायद सबसे अमीर आदमी बन चुके थे. वो काफी प्रभावित और अच्छी प्रतिष्ठा वाले आदमी बन चुके थे."

लेकिन राष्ट्रपति पद तक पहुचंने की जल्दबाज़ी ने उनकी राह की मुश्किलें बढ़ा दी.

पत्रकार माशा गेसन ने कहा, "एक हफ़्ते में ही कारपारोव के कैम्पेन को रोकने की कोशिशें होने लगीं. उनके विमान को देश में लैंड करने की इजाज़त नहीं दी गई. वो जहां बैठकें करना चाहते थे उन्हें नहीं करने दी जाती थीं."

कासपारोव ने बताया "वो समय ऐसा था कि अगर कोई पुतिन के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन करता था तो उसे पांच से 10 साल की सज़ा हो सकती थी."

पूर्व प्रधानमंत्री मिखाइल कास्यानोव, जो कि पुतिन की पहली सरकार का हिस्सा थे, वो भी भाग गए थे.

अपने आवेदन खारिज किए जाने के बारे में बताते हुए वो कहते हैं, "हमें ये करने के लिए 20 लाख हस्ताक्षरों की ज़रूरत थी और हमें वो मिल भी गए थे. चुनाव में हमारा समर्थन 6% से 18% बढ़ गया था. चुनाव के एक महीने पहले उन्होंने मुझे दौड़ से बाहर कर दिया, उनका दावा था कि 35 हस्ताक्षर ग़लत थे."

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कासपारोव और कास्यानोव के दौड़ से बाहर हो जाने के बाद पुतिन के उम्मीदवार दिमित्री मेदवेदेव राष्ट्रपति चुनाव जीत गए. व्लादिमीर पुतिन ने प्रधानमंत्री के तौर पर पद संभाला.

कास्यानोव कहते हैं, "रूस में ये सभी को पता था कि उनके उत्तराधिकारी सिर्फ़ उनके काम की देखभाल कर रहे हैं."

चार साल बाद 2012 में पुतिन राष्ट्रपति बनकर फिर लौटे. इस बार उनका कार्यकाल चार नहीं बल्की छह साल का था और इस बार मेदवेदेव को उन्होंने अपना प्रधानमंत्री बनाया.

राष्ट्रपति के तीसरे कार्यकाल के दौरान पुतिन को अपने पुराने प्रतिद्वंदी बोरिस नेमत्सोव से चुनौती मिली.

नेमत्सोव ने एक किताब प्रकाशित की जिसमें दावा किया गया कि रूस के राष्ट्रपति के पास 58 जेट, दो नौका, एक समर पैलेस है और वो दुनिया के सबसे अमीर आदमी हैं.

फ़रवरी 2015 में नेमत्सोव की मॉस्को में क्रेमलिन की दिवारों के सामने हत्या कर दी गई. उन्हें पीठ और सिर में गोली मारी गई थी.

उनकी मौत के आरोप में चार लोगों को गिरफ्तार किया गया, लेकिन उनके समर्थक आज भी इस सवाल का जवाब तलाश रहे हैं कि आख़िर उनकी हत्या के लिए असल ज़िम्मेदार कौन था.

किताब के सह लेखक व्लादिमीर मिलोव ने बीबीसी से कहा, "अगर आप घटनास्थल पर रुक कर देखते हैं तो लगेगा कि ये बिना किसी की अनुमति या आदेश के नहीं हो सकता था."

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क्षेत्रीय हस्तक्षेप

जॉर्जिया और यूक्रेन से झटका लगने के बाद क्रेमलिन ने पड़ोस से रिश्ते सुधारने की कोशिशें की.

साकाशविली याद करते हैं, "हम उस समय युद्ध की कगार पर थे, इसलिए यूरोपियन और अमरीकी बयानबाज़ी करने लगे थे."

"मैंने मेदवेदेव से बात करने की कोशिश की. वो उस वक़्त आधिकारिक राष्ट्रपति थे लेकिन उन्होंने कहा कि पुतिन मुझसे बात करना चाहते हैं."

उन्होंने कहा, "तुमने मेदवेदेव को कॉल क्यों किया? पूरा ऑपरेशन मैं चला रहा हूं. "मैंने कहा, "हम बहुत चिंतित हैं. यूरोपीय संघ और व्हाइट हाउस के बयानों को देखिए". उन्होंने कहा, "हां, मैंने बयान देखे हैं, वो बहुत ही कड़े हैं. इन पर कई कागज़ खर्च किए गए हैं. तुम पश्चिम के अपने दोस्तों को कॉल क्यो नहीं करते."

एक ओर जहां पूरी दुनिया बीजिंग ओलंपिक देख रही थी, व्लादिमीर पुतिन ने सोवियत संघ के विघटन के बाद पहली बार टैंक भेजे थे.

पश्चिम रूस के इस कदम से डर गया था, लेकिन उसने तब राहत की सांस ली जब व्हाइट हाउस के एक कड़े बयान के बाद रूस ने अपने कदम पीछे खींच लिए. लेकिन पांच दिनों के युद्ध ने ही रूस को ये एहसास करा दिया था कि उनका देश एकबार फिर शक्तिशाली हो गया है.

परेशान यूरोपीय सरकारों ने फैसला किया कि वो एक बार फिर रूस की ओर हाथ बढ़ाएंगी.

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2014 में सोची का विंटर ओलंपिक रूस को दुनिया पर अपना दबदबा कायम करने का एक और मौक़ा दे रहा था.

पुतिन जो कि एक बार फिर राष्ट्रपति की गद्दी पर थे उन्होंने इस डील के लिए अच्छा समय और पैसा लगाया. लेकिन ओलंपिक गेम के बावजूद रूस की अगली विदेश नीति ने दुनिया को एक बार फिर विचलित कर दिया था. रूस ने क्रिमिया पर आक्रमण करने का फैसला किया.

अपने देश में निरंकुश सत्ता और पड़ोसी देशों में क्षेत्रीय हस्तक्षेप के साथ रूस से राष्ट्रपति अपने प्रभाव का विस्तार करने को तत्पर हैं.

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