शीत युद्ध: क्या पश्चिमी देशों से रूस का झगड़ा सोवियत संघ के दिनों की वापसी के संकेत हैं

  • 27 मार्च 2018
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Image caption अमरीका के 60 रूसी राजनयिकों के निष्कासन के बाद पश्चिमी दुनिया के साथ रूस का तनाव बढ़ता हुआ दिख रहा है

किसी को इस बात की उम्मीद नहीं थी कि पश्चिमी देश इस तरह की एकता का प्रदर्शन करेंगे.

लेकिन जो कुछ भी हुआ, उससे रूस और पश्चिमी देशों के बीच पुरानी तल्खियों को एक बार फिर से हवा मिल गई है.

ब्रिटेन में पूर्व रूसी जासूस को ज़हर देकर मारने के जवाब में सोमवार को अमरीका और उसके सहयोगी देशों ने दर्जनों रूसी राजनयिकों के निष्कासन का फ़ैसला कर लिया.

शीत युद्ध के दिनों में जब तत्कालीन सोवियत संघ के साथ पश्चिमी देशों का तनाव चरम पर था, उसके बाद से राजनयिकों को इतने बड़े पैमाने पर निष्कासित किया गया है.

अब एक बार फिर से रूस और पश्चिमी दुनिया के बीच कूटनीतिक संकट गहराता हुआ दिख रहा है और शीत युद्ध जैसी स्थिति पैदा होने की आंशका जताई जा रही है.

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Image caption बर्लिन की दीवार, तस्वीर 13 जनवरी, 1962 की है, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी दो भागों में बंट गया था, एक ने अमरीका का साथ चुना तो दूसरे ने सोवियत संघ को अपनाया

क्या था शीत युद्ध?

द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद ये साल 1945 से 1989 के बीच का दौर था. दुनिया दो ध्रुवों के बीच बंट गई थी और ये दो ध्रुव थे अमरीका और सोवियत संघ.

शीत युद्ध शब्द का इस्तेमाल अमरीका और सोवियत संघ के बीच उस दौर में जारी रहे तनावपूर्ण संबंधों के लिए किया जाता है.

परमाणु युद्ध की आशंका से दोनों ही पक्ष कभी भी सीधे तौर पर एक दूसरे से युद्ध में नहीं उलझे लेकिन उस वक्त करोड़ों लोग इस डर के साये में जी रहे थे.

कई इतिहासकार इसे सरकार चलाने की दो तरह की व्यवस्थाओं (पूंजीवाद और साम्यवाद) के बीच की लड़ाई के तौर पर भी देखते हैं.

इसमें अमरीका पूंजीवादी व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता था और रूस साम्यवादी प्रणाली का.

देश चलाने का दोनों ही देशों का तरीका अलग था और दोनों ही ये मानते थे कि उनका सिस्टम ज़्यादा बेहतर है.

दोनों ही देश ये मानने लगे थे कि दूसरा पक्ष अपने सिस्टम को दुनिया भर में लागू करने के लिए कोशिशें कर रहा है और तनाव का एक बड़ा कारण ये भी था.

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Image caption चांद पर अमरीकी अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रॉन्ग. शीत युद्ध के दिनों में दोनों देशों की प्रतिस्पर्धा अंतरिक्ष शोध की दिशा में भी एक दूसरे से आगे निकलने को लेकर थी

इसकी शुरुआत कैसे हुई?

इसका कोई एक जवाब नहीं दिया जा सकता है लेकिन इतिहासकारों की ये राय है कि साल 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होना वो मोड़ था जहां से इसकी शुरुआत हुई.

ऐसा इसलिए था क्योंकि युद्ध के दिनों में रूस और सोवियत संघ एक दूसरे के सहयोगी थे और नाज़ी जर्मनी उनका साझा दुश्मन था.

लेकिन हकीकत ये थी कि युद्ध खत्म होने के बाद नाज़ी जर्मनी का वजूद मिट चुका था.

इस युद्ध ने यूरोप को बांट दिया था और दोनों ही देश दुनिया के दो सबसे ताकतवर दबंग देशों की तरह उभरे थे.

विश्व खत्म होने के बाद दोनों ही देश दुनिया को अपने-अपने तरीके से चलाना चाहते थे और उनके बीच इस बात को लेकर भी मतभेद था कि यूरोप को कैसे बांटा जाए.

इसी वजह से अमरीका और सोवियत संघ के बीच दुश्मनी का दौर शुरू हुआ क्योंकि दोनों ही देश दुनिया पर अपना दबदबा बढ़ाने की होड़ में उलझ गए.

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Image caption साल 1962 में क्यूबा मिसाइल संकट के दिनों में परमाणु युद्ध की संभावना चरम पर पहुंच गई थी

फिर क्या हुआ?

दोनों ही देशों ने अपने सहयोगी देशों का गठबंधन बनाना शुरू कर दिया. अमरीका और पश्चिमी देशों ने मिलकर नैटो का गठन किया.

दूसरी तरफ़ सोवियत संघ ने पूर्वी यूरोप के पोलैंड और हंगरी जैसे देशों के साथ वॉरसा पैक्ट किया.

दोनों ही पक्षों को एक दूसरे के हमले का डर था और इसका नतीजा हथियारों की होड़ के तौर पर देखने को मिला. उन्होंने अपने हथियारों का भंडार बढ़ाना शुरू कर दिया.

साठ के दशक आते-आते अमरीका और सोवियत संघ ने अपनी ताकत इस कदर बढ़ा ली थी कि उनकी परमाणु मिसाइलें महादेशों की सीमा पार कर हमला कर सकते थे.

साल 1962 में क्यूबा मिसाइल संकट के दिनों में परमाणु युद्ध की संभावना चरम पर पहुंच गई थी.

दुनिया के दूसरे जंगी मैदानों में या फिर जहां कही भी गृह युद्ध की स्थिति थी, अमरीका और सोवियत संघ का बिना एक दूसरे पर वार किए परोक्ष रूप से लड़ना आम बात थी.

लीवरपूल जॉन मूरीस यूनिवर्सिटी के सीनियर लेक्चरर मैलकम क्रेग कहते हैं, "शीत युद्ध कभी शीतल नहीं था. दोनों महाशक्तियों की परोक्ष लड़ाई में लाखों लोग मारे गए थे."

"कम्बोडिया, कांगो, कोरिया, इथियोपिया, सोमालिया जैसी जगहों पर लोगों के लिए शीत युद्ध एक बर्बाद कर देने वाली लड़ाई थी."

"इन जगहों पर अमरीका और सोवियत संघ ने लड़ रहे पक्षों की पीठ पर अपनी बंदूक़ रखी और ये भी नहीं देखा कि उनका संघर्ष बेहद स्थानीय किस्म का था."

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Image caption अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने साल 1986 में दर्जनों रूसी राजनयिकों को निष्कासित कर दिया था

मौजूदा तनाव की शीत युद्ध से तुलना?

इसमें कोई शक नहीं कि रूसी राजनयिकों के निष्कासन के हालिया फ़ैसले ने शीत युद्ध के दिनों की यादें ताज़ा कर दी हैं.

उदाहरण के लिए साल 1986 में अमरीका और सोवियत संघ कई हफ़्कों तक इसी तरह राजनयिकों के निष्कासन का फ़ैसले करते रहे थे.

ये एक दूसरे के साथ जैसे को तैसा वाली कार्रवाई की तरह था.

अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने 80 रूसी राजनयिकों को निष्कासित कर दिया था. उनमें से पांच पर जासूसी का आरोप लगाया गया था.

पूर्व रूसी जासूस को ज़हर दिए जाने के मामले की शीत युद्ध के दिनों में सोवियत संघ के बर्ताव से भी तुलना की जा रही है.

प्रोफ़ेसर माइकल कॉक्स लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में इंटरनेशनल रिलेशंस के एमीरेटस प्रोफ़ेसर हैं.

वे कहते हैं, "सोवियत संघ ने विदेशी ज़मीन पर उन लोगों के कत्ल की कोशिश की जिन्हें वे पसंद नहीं करते थे. इसलिए कहा जाए तो रूस कोई नहीं चीज़ नहीं कर रहा है."

रूस के ऐसे बर्ताव का पुराना इतिहास रहा है और ये शीत युद्ध से भी पहले से देखा जाता रहा है.

मैलकम क्रेग कहते हैं, "ये तौर तरीके पहले भी ख़बरों में आते रहे हैं. जैसे किसी का कत्ल. ये शीत युद्ध के ज़माने से भी पुराना चलन है."

"इसलिए ये कहना कुछ हद तक ग़लत है कि इन तौर तरीकों की वजह से हम शीत युद्ध के एक नए दौर का सामना कर सकते हैं."

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Image caption यूरोपीय संघ के साथ रूस के अहम कारोबारी संबंध हैं, इसलिए अगर रूस पर प्रतिबंध लगते हैं तो उसके गंभीर नतीजे सामने आ सकते हैं

चिंतित होना कितना ज़रूरी?

माइकल कॉक्स कहते हैं, "हमारे पास अभी भी परमाणु हथियार हैं और वे अब भी प्रतिरोध के बड़े हथियार हैं. रूस और यूरोपीय संघ के बीच महत्वपूर्ण आर्थिक रिश्ते हैं."

"और उनकी भी अहमियत कम नहीं है. कई रूसी लोग हैं जो पश्चिमी देशों में रहते हैं.

उस वक्त के सोवियत संघ और आज के रूस में भी कई बुनियादी अंतर हैं और इस वजह से मौजूदा तनाव उतना परेशान करने वाला नहीं है.

मैलकम क्रेग के मुताबिक़, "रूस सोवियत संघ नहीं हैं और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां काफी अलग हैं."

"सोवियत संघ के दिनों की तुलना में आज दुनिया की अर्थव्यवस्था कहीं ज़्यादा एक दूसरे से जुड़ी हुई है. इसलिए आर्थिक दबाव के लिहाज से ये ज़्यादा संवेदनशील है."

मैलकम क्रेग की बात को आगे बढ़ाते हुए माइकल कॉक्स कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि राष्ट्रपति पुतिन लंबे समय तक तल्ख रिश्ते और रूस पर ज़्यादा प्रतिबंध चाहेंगे."

लेकिन इसके साथ ही कॉक्स ये भी चेतावनी देते हैं कि मौजूदा तनाव के बारे में किसी ने अंदाजा नहीं लगाया था.

वे कहते हैं, "साल 1989 तक शीत युद्ध के समय कम से कम एक बात तो काबू में रही थी कि दोनों ही पक्ष एक दूसरे के प्रति खामोश रहे."

"एक हद तक वे दोनों एक दूसरे के दबदबे को स्वीकार कते थे. लेकिन अब ये हद पूरी तरह से टूट सी गई लगती है."

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