रूस बनाम पश्चिम का झगड़ा, क्या यही नया शीत युद्ध है?

  • 4 अप्रैल 2018
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रूस और पश्चिमी देशों के संबंध इस समय अपने सबसे निचले स्तर पर है.

लेकिन इन हालात को क्या कहा जाना चाहिए? आम बोलचाल में इसे एक नया 'शीतयुद्ध' कहा जा रहा है.

एक तरह से ये साल 1950 से 1980 तक सोवियत संघ और पश्चिमी देशों के बीच चले वैचारिक और सैन्य झगड़े की वर्तमान समय के तनाव से एक तुलना है.

लेकिन ऐसी उपमाएं गलतफहमी पैदा कर सकती हैं.

विल्सन सेंटर के केनन इंस्टीट्यूट और सीएनए कॉरपोरेशन के एक सीनियर रिसर्चर माइकल कॉफ़मैन कहते हैं, "शीत युद्ध एक दो ध्रुवीय दुनिया की देन थी जिसमें दो महाशक्तियां अपने आर्थिक और सैन्य दमख़म के साथ वैश्विक राजनीति को शक्ल देने के लिए एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रही थीं."

"दोनों महाशक्तियों के अपनी विचारधाराओं में दृढ़ विश्वास ने इस प्रतिस्पर्धा को अटल बना दिया था, इसके साथ ही उस दौर में शक्तियों के बंटवारे ने भी एक रोल निभाया."

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सॉफ़्ट पावर

कॉफ़मैन कहते हैं कि इसके विपरीत आज जो प्रतिस्पर्धा है वो शक्तियों के संतुलन या किसी वैश्विक विचारधारा के कारण नहीं है बल्कि नेताओं के सोच-समझकर लिए गए फैसलों, रणनीतियों और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्पष्ट रूप से नज़र आने वाले मतभेदों की वजह से है. और इन हालात को टाला जा सकता था.

कॉफ़मैन मानते हैं कि इस मुकाबले में अमरीका को ज़्यादा नुकसान उठाना पड़ सकता है. क्योंकि इस गतिरोध का स्तर और इसके बने रहने की प्रवृति शीत युद्ध जैसा नहीं है. इसके साथ ही रूस शक्ति संतुलन बदलने और अंतरराष्ट्रीय सिस्टम की संरचनाओं को बदलने में सक्षम नहीं है.

वो कहते हैं, "कम शब्दों में कहा जाए तो इस संघर्ष का कारण और शक्ल अलग है."

असली शीत युद्ध के दिनों में यूरोप में एक सैन्य शांति (हथियारों के बल पर कायम शांति) थी जबकि असली युद्ध अंगोला, क्यूबा से लेकर मध्य पूर्व में लड़ा जा रहा था. लेकिन आज के दिन में युद्ध की ज़मीन जॉर्जिया और यूक्रेन में तैयार है और ये रूस के बेहद करीब है.

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रूस और पश्चिमी देशों के बीच मुक़ाबला

रूस और पश्चिमी देशों के बीच शक्तियों का एक बेहद अलग संतुलन है. रूस के पास बेहद सॉफ़्ट पावर कम है जो कि एक आकर्षक अंतरराष्ट्रीय विचारधारा है जिसे वह दुनिया में नहीं बेच सकता है. अगर शीत युद्ध पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच वैश्विक जंग थी तो रूस और पश्चिमी देशों के बीच आज ये मुक़ाबला क्या है?

कॉफ़मैन कहते हैं, "रूस के लिए ये अपने आपको अंतरराष्ट्रीय शक्तियों के समूह में एक शक्ति के रूप में बचाए रखने की जंग है. और वह सोवियत संघ के अवशेषों को अपने साथ रखना चाहता है. रूसी नेता रूस के दबदबे और उसके क्षेत्रफल में किसी तरह की कमी को रोकने के लिए मजबूर हैं."

कॉफ़मैन बताते हैं कि अमरीका के लिए ये संघर्ष बेहद कन्फ्यूज़िंग है और इसका एक पहलू अमरीका की ओर से अत्यधिक उदारवादी विचारधारा और अंतरराष्ट्रीय राजनीति को लेकर कम विचार किया जाना है.

"दो दशकों तक बिना किसी प्रतियोगी के रहने वाले अमरीका ने इसका फायदा उठाया और अपना प्रभाव जमाया लेकिन सभी प्रभुत्व का खर्चा और ताकत एक समय के बाद खर्चा वापस आता है और वह आ रहा है, वो भी भारी मात्रा में."

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'दुश्मन की कमी से जुड़ी बीमारी'

ये साफ है कि रूस और चीन शीत युद्ध के बाद की दुनिया में उदारवादी सोच से सहमत नहीं हैं. और पश्चिमी देश इन देशों पर अपनी मर्जी नहीं थोप सकते. ऐसे में एक तरह से पुराना शक्ति संघर्ष लौट आया है.

लेकिन कई विश्लेषकों के अनुसार पश्चिमी देशों पर भी इस स्थिति की ज़िम्मेदारी है और नए शीत युद्ध की बात सिर्फ स्थिति को बद से बदतर बनाएगा.

अमरीकी नेवल वॉर कॉलेज में रिसर्च प्रोफेसर लाइल गोल्डस्टीन कहते हैं, "पश्चिमी देशों में कई लोग शीत युद्ध के बाद दुश्मनों की कमी की बीमारी से जूझ रहे रहे हैं. ऐसा लगता है कि कई राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञ एक ऐसा ख़तरा चाहते हैं जिसे आसानी से चित्रित किया जा सके."

वह कहते हैं, "जॉर्जिया और यूक्रेन की स्थिति एक नए शीत युद्ध की पटकथा के लिए जरूरी स्थिति देती है. हालांकि, ये बेहद जटिल स्थिति है. इस क्षेत्र से परिचित लोग बताते हैं कि ये दोनों स्थितियां सोवियत संघ के तेजी से हुए विघटन से जुड़ी पहचान और सीमा विवादों के कारण हैं."

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'बराबरी की हैसियत वाले प्रतिस्पर्धी'

ऐसे में रूस इस समय किस तरह की शक्ति है?

कॉफ़मैन कहते हैं, "ये एक कमजोर महान शक्ति है जिसे लगातार कम आंका जा रहा है क्योंकि ये ऐतिहासिक रूप से पश्चिम की तुलना में तकनीक, राजनीति और आर्थिक विशेषज्ञता में पिछड़ती रही है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय तंत्र में मॉस्को लगातार अपने आर्थिक प्रभाव से ज़्यादा असरदार रहा है."

वह कहते हैं कि रूस एक कमजोर होती क्षेत्रीय शक्ति नहीं है बल्कि इसकी स्थिति इसके ठीक उलट है.

"दरअसल, आतंरिक संतुलन, सैन्य सुधार और आधुनिकीकरण के एक दौर के बाद रूस अपने ऐतिहासिक पिछवाड़े में ज़्यादा सुदृढ़ है. और यह अपने नज़दीकी क्षेत्रों में शक्ति के प्रदर्शन और सुदूर स्थित दुश्मनों को गैर-सैन्य उपकरणों से सजा दी है."

नैटो देशों में रक्षा बजट पर ज़्यादा खर्च करने को लेकर तर्क दिए जा रहे हैं और एक बार फिर 'बराबरी की हैसियत वाले प्रतिस्पर्धी' के साथ संघर्ष के लिए तैयार होने की बात कही जा रही है. ये 'बराबरी की हैसियत वाले प्रतिस्पर्धी' को रूस माना जाना चाहिए.

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रूस की हैसियत

शीत युद्ध के दौरान पश्चिमी मित्र राष्ट्रों ने जल्द ही शांति का फल ले लिया था. ऐसे में उन्हें अपनी रक्षा पर खर्च करने की जरूरत होनी चाहिए. लेकिन रूस नैटो के सामने किस तरह का सैन्य ख़तरा पेश करता है.

प्रोफ़ेसर गोल्डस्टीन कहते हैं रूस की सेना अमरीका और नैटो की एकजुट सेनाओं की टक्कर में बेहद कमजोर होगी. हालांकि, वह कहते हैं कि रूस ने बीते 15 सालों में बेहद बुद्धिमानी से इस क्षेत्र में निवेश किया है. ऐसे में ये इसके पास कुछ खास क्षमताएं विकसित की हैं जो इसे एक बढ़त देती है.

उदाहरण के लिए, नैटो के पास रूस के इसकंदर टेक्टिकल न्यूक्लियर मिसाइल का असली तोड़ नहीं है. ऐसे में नैटो सेनाओं के कमांडरों के सामने एक उलझन पैदा कर सकती है कि रूस के साथ संधि की जाए या संघर्ष को आगे बढ़ाया जाए. रूस के पास आर्टिलरी और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर में भी क्षमता हासिल है.

लेकिन रूस की सायबर और सूचना युद्ध में जबर्दस्त क्षमता है. और कुछ अहम चुनौतियां पैदा करती है. एक बार फिर मीडिया और थिंक टैंक एक नए चलन हायब्रिड वॉरफेयर पर चर्चा कर रहे हैं, जिसमें शांति और युद्ध के बीच एक धुंधली स्थिति है. और इस क्षेत्र में रूस को एक प्रतिष्ठित खिलाड़ी माना जा रहा है.

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बेवकूफी से भरी प्रतिक्रिया

कॉफ़मैन कहते हैं, "किसी भी बड़ी ताकत का बस एक रंग नहीं होता है, सच में रूस अपने क़रीबी मुल्कों में एक क्षमतावान सैन्य शक्ति है और इसने हाल ही में राजनीतिक युद्ध, इंटरनेट युद्ध और सूचना के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा की है."

लेकिन कॉफ़मैन हायब्रिड वॉरफेयर की बात को नकारते हुए कहते हैं कि दशकों तक अपने से कमजोर दुश्मनों के साथ इच्छा के साथ युद्ध करने के बाद एक ऐसी शक्ति जो हर तरह से संघर्ष करने में सक्षम में, के साथ संघर्ष को लेकर ये पश्चिमी दुनिया की एक बेवकूफी से भरी प्रतिक्रिया है.

प्रोफ़ेसर गोल्डस्टीन भी मानते हैं कि हायब्रिड वॉरफेयर की रट लगाया जाना समस्याजनक है. वह कहते हैं, "असली ख़तरा ये ग़लत आकलन है जिससे सीरिया और ज़्यादा ख़तरनाक ढंग से यूक्रेन में संघर्ष हाथ से बाहर निकल सकता है और एक बड़ा युद्ध छिड़ सकता है."

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नैटो को चुनौती

प्रोफ़ेसर गोल्डस्टीन कहते हैं कि यूक्रेन में जिसे हायब्रिड वॉर कहा गया वो दरअसल पारंपरिक शक्तियों के साथ लड़ा गया एक असली युद्ध था.

वह तर्क देते हैं कि क्रीमिया के कब्ज़े में अमरीका और नैटो के हस्तक्षेप की वजह हायब्रिड वॉर नहीं था बल्कि इसकी वजह सैन्य संतुलन था और ये कारण था कि क्रीमिया और पूर्वी यूक्रेन को रूसी के मुख्य हितों में गिना जाता है.

गोल्डस्टीन कहते हैं कि रूस ने सीधे-सीधे नैटो को चुनौती दी है. एक और समस्या ये है कि पश्चिमी देश रूस के व्यवहार को प्रभावित करने के लिए सही उपकरणों का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं. और ये संभावना भी है कि पश्चिमी दुनिया को ये नहीं पता है कि उसे रूस से क्या चाहिए है.

कॉफ़मैन कहते हैं, "अब तक इस्तेमाल किए ज़्यादातर उपकरण मित्र देशों की राजनीति सुलझाने और उनके आश्वासन के लिए उठाए गए हैं और रूस के व्यवहार को प्रभावित करने के लिए कोई थ्योरी नहीं है."

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कूटनीतिक प्रतिबंध

कूटनीतिक उपाय राजनीतिक एकता को बनाने के लिए ठीक हैं लेकिन नेतृत्व में कोई ये नहीं जानता कि वे मॉस्को से क्या चाहते हैं. रूस को रोकने की कोशिश, अंतरराष्ट्रीय राजनीति से उसे बाहर करना और यूक्रेन में संधि गंभीर विचार नहीं है.

कूटनीतिक प्रतिबंध एकता और संकल्प साबित करते हैं लेकिन ये रूस का व्यवहार बदलने में कितने सक्षम होंगे ये जानना अहम होगा. मैंने अब तक जितने विशेषज्ञों से बात की है उनका कहना है कि आर्थिक पाबंदियों के रास्ते से ही रूस को ये एहसास दिलाया जा सकता है कि उसकी हरकतों के लिए उसे क्या कीमत चुकानी होगी.

लेकिन इसके आगे मॉस्को को लेकर कोई नीति बनाए जाने में ये ध्यान रखा जाना जरूरी है कि सोवियत संघ के बुरी तरह विघटन होने का असर तीन दशक बाद भी है.

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