ब्लॉग: 'एक तेंदुलकर था और एक तुम हो'

  • 2 अप्रैल 2018
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राज्यसभा के विकेट पर छह वर्ष बल्ला घुमाने के बाद सचिन तेंदुलकर ने पैड खोल दिए और पूरी मैच फ़ीस यानी नब्बे लाख रुपये भी पाई पाई समेत वापस करके बल्ला घुमाते निकल लिए.

कोई पूछे कि जब राज्यसभा में इतने लंबे समय सिर्फ़ विकेट पर खड़े रहके रन ही रोकने थे तो फिर आप गए क्यों थे और जब चले ही गए थे तो मैच की फ़ीस क्यों वापस कर दी?

नब्बे लाख कम तो नहीं होते. पाकिस्तान के एक करोड़ 60 लाख रुपयों के बराबर हैं.

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पीएम वेलफ़ेयर फ़ंड में वेतन

राज्यसभा या पाकिस्तान की सीनेट में तो बहुत से लोग वास्ते डालके जाते हैं. आप तो इतने सीधे निकले कि जो तनख़्वाह मिली वो भी प्रधानपत्नी के हाथ में धरने के बजाए प्रधानमंत्री के वेलफेयर फ़ंड में जमा करवा के घर लौट आए.

इससे तो अच्छा था राज्यसभा की सीट शुरू में ही त्याग के किसी ऐसे ज़रूरतमंद के लिए छोड़ देते जो चार पैसे कमाना चाहता हो.

सचिन जी दुनिया भर में हम जैसे फ़ैन तो आपको वैसे ही महान मानते हैं, नब्बे लाख रुपये वापस करके और कितनी महानता मिल गई?

चैनलों और पत्रिकाओं में एक दिन की टीआरपी. बस.

तो राज्यसभा में ये बोलना चाहते थे सांसद सचिन तेंदुलकर?

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हर गेम जेंटलमैन्स गेम नहीं!

अगर आपका मक़सद ये है कि दूसरे सदस्य भी आपकी तरह बड़प्पन का मुज़ाहिरा करें तो ऐसा तो कभी नहीं होने का.

वो भी इस रास्ते पर चल पड़े फिर तो चल गया राजनीति का उद्योग. फिर तो कट गई फ़सल और चुग लिया चिड़ियों ने खेत.

काश ये नब्बे लाख वापस करने से पहले मेरी आपसे बात हो जाती तो मैं आपको समझाता कि भैया हर गेम जेंटलमैन्स गेम नहीं हुआ करता. आउट सिर्फ़ क्रिकेट के मैदान में हुआ जाता है. राजनीति के विकेट पर बहुत ही दबाव डाला जाए तो खिलाड़ी विकेट बगल में दाब के भाग निकलता है.

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सोच का अंतर?

आपको तो सिंगल्स लेने की भी आदत पड़ी हुई है. पार्लियामेंट की क्रीज़ पर सिंगल लेने की कोई रीत नहीं. यहां सिर्फ़ चौका या छक्का लगता है. या फिर मुंहतोड़ बाउंसर चलता है.

बॉल टैंपरिंग क्रिकेट में कोई अपराध हो तो हो राजनीति में तो ये आर्ट है. जो जितनी बॉल टैंपरिंग कर सके, उसकी उतनी ही वाह-वाह.

पर सचिन जी आप जैसों को समझाने-सिखाने का कोई फ़ायदा नहीं जिन्हें पूरा संसार ही वानखेड़े स्टेडियम नज़र आता है.

आप इस पर यक़ीन रखते हैं तो भले रखें कि खेल में हार जीत नहीं होती बल्कि जीत सिर्फ़ खेल की होती है.

मगर इस तरह की सोच के साथ अगर आप संसद के कॉरिडोर में नज़र आएंगे फिर तो नब्बे लाख रुपये वापस करके ही जाएंगे ना.

तेंदुलकर 23 दिन आए राज्य सभा, रेखा 18

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आप जैसे लोग ही तो हैं जो आदर्शवादी होने के चक्कर में सियासत के व्यापार को बट्टा लगाकर चले जाते हैं.

फिर कई दिनों तक आपके संसदीय सहयोगियों को जनता के ताने सहने पड़ते हैं. एक तेंदुलकर था और एक तुम हो. भई वाह.

मैं तो इस घटना के बाद हर राजनीतिक गुट से विनती करूंगा कि ताऊ आइंदा सोच-समझ के टिकट बांटना.

सचिन जैसों को आदर ज़रूर देना पर टिकट बिल्कुल नहीं. अपने चक्कर में हमारा धंधा भी ख़राब कर दिया.

पूरे नब्बे लाख मिट्टी में मिलाई दिए.

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