चीन के मुक़ाबले नेपाल में बढ़ेगा भारत का असर?

  • 8 अप्रैल 2018
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नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने दोबारा देश की कमान संभालने के बाद पहले विदेश दौरे के लिए भारत को चुना.

वो एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ तीन दिन के भारत दौरे पर आए.

ओली ने शनिवार को भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मुलाक़ात की.

इस मुलाक़ात में दोनों देशों के संबंधों को नई ऊंचाई पर ले जाने के लिए 'बराबरी, परस्पर विश्वास और सम्मान' की भावना पर ख़ासा ज़ोर दिया गया.

नेपाल में परंपरा रही है कि वहां प्रधानमंत्री अपने विदेश दौरों की शुरुआत भारत से करते हैं. लेकिन ओली को चीन के करीबी के तौर पर देखा जाता रहा है.

साल 2016 में ओली ने सार्वजनिक तौर पर भारत की आलोचना करते हुए आरोप लगाया था कि वो नेपाल के 'आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है'.

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Image caption भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की शनिवार को नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में मुलाक़ात हुई.

ओली का मिशन

ओली के इस दौरे में गर्माहट तो खूब दिखी, लेकिन उनकी ओर से जारी बयान में साफ़ तौर पर कहा गया कि उनकी सरकार 'भरोसे की बुनियाद' पर दोनों देशों के बीच रिश्तों की बुलंद इमारत खड़ी करना चाहती है.

ओली की ओर से जारी बयान में कहा गया, "मैं इस बार हमारे रिश्तों को 21वीं सदी की वास्तविकता के आधार पर नई ऊंचाई पर ले जाने के रास्ते तलाशने का मिशन लेकर भारत आया हूं. हम आदर्श रिश्ते बनाना चाहते हैं".

समाचार एजेंसी पीटीआई ने भारतीय विदेश सचिव विजय गोखले के हवाले से बताया कि दोनों देशों के बीच रक्षा और सुरक्षा, कृषि और व्यापार में साझेदारी बढ़ाने के साथ रेलवे और पानी के रास्ते संपर्क बेहतर करने पर ज़ोर रहा.

भारत के रक्सौल से नेपाल की राजधानी काठमांडू को इलेक्ट्रिक रेल लाइन से जोड़ने पर सहमति बनी. इसके लिए भारत वित्तीय सहायता मुहैया कराएगा.

गोखले के मुताबिक मोदी ने ओली से कहा कि भारत नेपाल का 'विश्वसनीय साझेदार बना रहेगा और वो नेपाल के साथ रिश्ते मजबूत करने को लेकर प्रतिबद्ध है'.

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लेकिन, क्या ये भरोसा चीन से लगातार नजदीकी बढ़ा रहे नेपाल को ये यकीन दिला सकता है कि भारत उसका सबसे 'विश्वसनीय सहयोगी' है?

बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी ने दोनों देशों के बदलते रिश्तों के बीच उठते सवालों को लेकर नेपाल की राजधानी में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार युबराज घिमरे से बात की. पढ़िए उनका नज़रिया

चीन का प्रभाव

मोदी और ओली की शिखर वार्ता में जो बात आई उसमें एक नीतिगत मुद्दा तो है ही. ये साफ़ है कि नेपाल में चीन का प्रभाव बढ़ रहा है.

ख़ास तौर पर बीते तीन साल में चीन का असर काफी बढ़ा है और इस दौरान भारत और नेपाल के संबंध में उसी अनुपात में काफी गिरावट आई है.

केपी शर्मा ओली इस बार प्रधानमंत्री बनने के बाद भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के न्योते पर जितनी जल्दी दिल्ली गए हैं, उससे मुझे लगता है कि नेपाल के साथ संबंध सुधारना भारत की भी प्राथमिकता है.

लेकिन क्या प्रधानमंत्री ओली की प्राथमिकता सूची में चीन की जगह भारत आ गया है, ये बताना अभी मुश्किल है. ये जरूर है कि जब वो पहली बार प्रधानमंत्री बने थे उस समय नेपाल का संविधान जारी हुआ था और उसे लेकर भारत को कुछ एतराज़ था.

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भारत का सिरदर्द

नेपाल का संविधान लागू होने के बाद भारत ने एक आर्थिक नाकेबंदी लगाई. इस वजह से नेपाल में भारत विरोधी माहौल बना. ओली ने उन भावनाओं के साथ अपना जुड़ाव दिखाया और उन्होंने एक वैकल्पिक स्रोत के तौर पर चीन के साथ व्यापारिक समझौते पर दस्तख़्त किए.

ये जरूर है कि चीन की उपस्थिति नेपाल में बढ़ गई है और बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश भी आया है. नेपाल में चीन बड़ा प्लेयर बनकर आया है और ये भारत के लिए सिरदर्द है.

जो मौजूदा स्थिति है उससे नेपाल तत्काल पीछे हट सकता है, ऐसा मुझे नहीं लगता.

नेपाल और भारत का रिश्ता बहुत पुराना है. लेकिन राजनीतिक और कूटनीतिक संबंधों में काफी उतार-चढ़ाव आए हैं. बीते 10-12 साल में नेपाल में भारत काफी अलोकप्रिय हुआ है. भारत पर आरोप लगते हैं कि वो नेपाल की राजनीति को माइक्रो मैनेज कर रहा है. भारत के हस्तक्षेप को नेपाल के लोग अच्छा नहीं मानते हैं.

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रेल की कूटनीति

नेपाल ने नाकेबंदी के वक़्त चीन का रुख किया और उस कठिन परिस्थिति में उसे समर्थन का भरोसा मिल गया.

चीन नेपाल के साथ रेल संपर्क बढ़ाने के लिए आगे आ गया है. चीन तिब्बत से लेकर लुंबिनी तक रेल संपर्क ले जाना चाहता है.

हाल में नेपाल ने चीन की 'वन बेल्ट वन रोड' परियोजना पर दस्तख़्त किए हैं. इस कारण भी चीन काफी नजदीक आ रहा है

लेकिन नेपाल के भारत के साथ संबंध का आयाम चीन के साथ संबंध से अलग है.

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Image caption नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली

आशंका दूर होगी?

मौजूदा दौर में बनी सहमति को लेकर भी नेपाल में थोड़ी आशंका है.

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब साल 2014 में पहली बार नेपाल आए थे, उस समय उन्होंने कहा था कि भारत ने नेपाल में जो परियोजनाएं ली हैं उनके अनुपालन को हम विश्वसनीय बनाएंगे.

ओली के इस दौरे के बाद दो चीज देखनी हैं कि पहली ये कि जिन परियोजनाओं की बात हुई है, उन्हें समय सीमा के अंदर पूरा किया जाएगा या नहीं.

दूसरा ये कि नेपाल की आंतरिक राजनीति में भारत हस्तक्षेप करना बंद करेगा या नहीं. दोनों देशों के संबंधों के ये दो बेंच मार्क होंगे.

हाइड्रो प्रोजेक्ट या विकास के दूसरे ऐसे प्रोजेक्ट जिन्हें पांच साल में पूरा होना है अगर वो बीस साल तक पूरे नहीं होते तो विकास का लाभ लोगों को नहीं मिल पाता है और भारत विरोधी भावनाएं बन जाती हैं.

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