बशर-अल असद: पुतिन के इस 'परम मित्र' से चिढ़ता है अमरीका

  • 14 अप्रैल 2018
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Image caption रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के गले मिलते सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद

सीरिया के गृह युद्ध ने दुनिया के दो ध्रुवों को फिर उभार दिया है. ब्रिटेन, फ्रांस और अमरीका की सेनाएं सीरिया में हमले कर रही हैं और दूसरी तरफ रूस सीरिया सरकार के साथ खड़ा है.

अमरीका और उसके सहयोगी देशों का मानना है कि राष्ट्रपति बशर अल-असद ने डूमा में विद्रोहियों के ख़िलाफ़ रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया, जबकि सीरिया और रूस इससे इनकार कर रहे हैं.

इस पूरे विवाद में एक चेहरा जो बेहद अहम हो चला है, वह राष्ट्रपति बशर अल-असद का है.

कौन हैं 52 वर्षीय बशर अल-असद, जिन्होंने इतने लंबे गृह युद्ध के बाद भी सीरिया में अपनी सत्ता को बचाए रखा है और जिनकी सरकार पर दुनिया में एक बड़ी जंग की आशंकाएं पैदा करने का आरोप लगाया जा रहा है.

सियासत, एक अनचाही विरासत

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Image caption सीरियाई राष्ट्रपति हफीज़ अल-असद अपनी पत्नी अनीसा मख़लूफ़ के साथ (कुर्सी पर बैठे हुए). बाएं से दाएं, माहर, बशर, बासिल, मज्द औक बुशरा. असद परिवार की यह तस्वीर 1990 के आस-पास ली गई थी

कम लोग जानते हैं कि बशर शायद एक नेत्रविज्ञानी (ऑप्टीशियन) होते अगर उनके भाई की सड़क हादसे में मौत न हुई होती.

दरअसल, असद उस परिवार से आते हैं जिसका सीरिया पर चार दशकों से भी ज़्यादा वक़्त से शासन है.

असद के पिता हफ़ीज़ अल-असद आधुनिक सीरिया के शिल्पी कहे जाते हैं. यह देश दशकों तक बग़ावत और बग़ावत-रोधी संघर्षों से जूझता रहा. साल 1970 में हफ़ीज़ अल-असद ने अपने उस नेटवर्क की मदद से सत्ता हासिल कर ली, जो उन्होंने सीरियाई वायुसेना के कमांडरों और रक्षा मंत्री के बीच बनाया था.

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हफ़ीज़ ने ऐसी व्यवस्था को बढ़ावा दिया जिससे राज्य का ज़्यादातर नियंत्रण उन्हीं के पास रहा. हफ़ीज़ के बड़े बेटे बासिल को उनका राजनीतिक उत्तराधिकारी माना जाता था. वह राष्ट्रपति की सुरक्षा के प्रमुख थे और आधिकारिक मौक़ों पर सैन्य वर्दी में दिखाई पड़ते थे.

लेकिन साल 1994 में एक कार हादसे में बासिल की मौत हो गई और सारा सियासी ज़िम्मा हफ़ीज़ के छोटे बेटे बशर अल-असद के कंधों पर आ गया.

साल 2000 में बने राष्ट्रपति

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Image caption असद और उनके पिता हफ़ीज़

असद ने दमिश्क यूनिवर्सिटी से 1988 में नेत्र विज्ञान की पढ़ाई की थी और आगे की पढ़ाई के लिए 1992 में वह लंदन चले गए थे. जब भाई की मौत हुई तो वह लंदन में ही थे. सियासत में उनकी रुचि कम थी, लेकिन सत्ता संभालने की तैयारी के लिए पिता ने उन्हें वापस दमिश्क बुला लिया.

1994 में बशर एक टैंक बटालियन कमांडर बने, फिर 1997 में लेफ्टिनेंट कर्नल बने और 1999 में कर्नल बना दिए गए.

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Image caption राष्ट्रपति बनने के बाद 34 वर्षीय बशर अल-असद (दाएं) दमिश्क में एक रात्रिभोज के दौरान, साल 2000 की तस्वीर

पिता के निधन के बाद साल 2000 में बशर अल-असद राष्ट्रपति बने. उन्हें एक नियंत्रित और दमनकारी राजनीतिक व्यवस्था विरासत में मिली थी, जहां शासक के क़रीबी लोगों में अलावी शिया समुदाय के सदस्यों का वर्चस्व था. असद परिवार भी इसी समुदाय से है. 74 फीसदी सुन्नी आबादी वाले सीरिया में अलावी शिया समुदाय की आबादी सिर्फ़ 5 से 10 फीसदी है.

खुलकर नहीं चला पाए आधुनिकतावादी एजेंडा

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उस वक़्त आधुनिकतावादी और इंटरनेट समर्थक कहे जाने वाले बशर ने वादा किया कि वे नए सिरे से स्वतंत्रता लाएंगे और सीरियाई बाज़ार को खोलेंगे.

उन्होंने बड़ी संख्या में राजनीतिक क़ैदियों को रिहा कर दिया और मीडिया पर लगी पाबंदियों में भी ढील दी. इस दौरान राजनीतिक बहस और अभिव्यक्ति की आज़ादी के पक्ष में निडर होकर बातें कही गईं.

लेकिन उनके ये खुलेपन वाले सुधारवादी प्रयास ज़्यादा समय तक नहीं चल सके. बदलाव की गति ने सेना, उनकी अपनी बाथ पार्टी और अलावी शिया समुदाय के कान खड़े कर दिए.

असुरक्षा के डर और अपना असर घटने की आशंका को देखते हुए उन्होंने असद पर दबाव बनाकर न सिर्फ इस बदलाव की गति को धीमा किया, बल्कि कई मोर्चों पर पुरानी परंपरावादी स्थितियों की हिमायत की.

विदेश नीति

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विदेश नीति के मोर्चे पर बशर अल-असद ने इसराइल पर अपने पिता की तरह कठोर विदेश नीति अपनाई. उन्होंने बार बार कहा कि जब तक क़ब्ज़ाई गई ज़मीन पूरी तरह लौटाई नहीं जाती, शांति नहीं स्थापित होगी. उन्होंने इसराइल के विरोधी चरमपंथी गुटों को समर्थन देना भी जारी रखा.

2003 में इराक़ में अमरीका की अगुवाई वाले दख़ल की उन्होंने कड़ी आलोचना की. सीरिया की ओर से इराक़ के विद्रोही गुटों को समर्थन भी दिया गया, जिससे अमरीका ख़ासा नाराज़ हुआ.

साल 2005 में लेबनान के पूर्व प्रधानमंत्री रफीक हरीरी की हत्या के बाद अमरीका और सीरिया के संबंध और ख़राब हो गए.

इस हत्या का शक़ राष्ट्रपति असद, उनके करीबी शिया बहुल 'इनर सर्कल' और सीरियाई सुरक्षा सेवाओं पर ज़ाहिर किया गया.

असद सरकार को रूस, अपने पारंपरिक सहयोगी ईरान और ईरान के समर्थन वाले लेबनानी चरमपंथी गुट हिज़बुल्ला से मज़बूत कूटनीतिक और सैन्य सहयोग मिलता रहा.

अरब स्प्रिंग ने क्या बदला

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Image caption असद ने विरोध प्रदर्शनों के लिए चंद साज़िशकर्ताओं को ज़िम्मेदार बताया था

फिर 2011 में जब मशहूर 'अरब स्प्रिंग' विरोध प्रदर्शनों ने ट्यूनीशिया और मिस्र में सत्तापलट कर दिया तो असद ने कहा कि सीरिया इस क़िस्म की बग़ावतों से पूरी तरह सुरक्षित है.

बड़ी संख्या में लोग असद सरकार के ख़िलाफ सड़कों पर उतरे, जिनमें निगरानी समूहों के मुताबिक, दो हज़ार से ज्यादा मौतें हुईं. असद ने प्रदर्शनकारियों की मांगें पूरी करने से इनकार कर दिया और प्रदर्शनों का हिंसक दमन किया. लेकिन सुरक्षा बलों की निर्मम कार्रवाइयां भी अरब स्प्रिंग की आवाज़ को दबा नहीं सकीं, बल्कि इसके बाद ये प्रदर्शन सशस्त्र संघर्ष में बदल गए.

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इन विद्रोहियों से असद की सरकारी सेनाएं लड़ रही हैं और एक समांतर लड़ाई इस्लामिक स्टेट के चरमपंथियों से भी जारी है. इस गृह युद्ध में अब तक एक करोड़ से ज़्यादा लोग बेघर हो चुके हैं.

तब से असद सीरिया की सत्ता पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

क्षेत्रीय और विश्व शक्तियों को इस विवाद में दख़ल देना पड़ा है. ईरान और रूस सीरिया की सरकार को सैन्य और वित्त सहयोग दे रहे हैं, जबकि सुन्नी बहुल विपक्ष को अरब के खाड़ी देशों, तुर्की और पश्चिमी देशों का समर्थन है.

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Image caption पत्नी आसमां के साथ बशर अल असद, तस्वीर 2010 की

दोनों पक्ष कहते हैं कि राजनीतिक हल ही इस विवाद को सुलझा सकता है. लेकिन युद्धविराम रोकने और संवाद शुरू करने की कई कोशिशें नाकाम रही हैं.

इसीलिए सीरिया के गृह युद्ध के समाधान में यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि असद को सत्ता में रहना चाहिए या नहीं.

कई जानकार यह मानते हैं कि बशर नैसर्गिक तौर पर सुधारवादी ही थे और पूरी नेकनीयती से सीरिया में खुलापन लाना चाहते थे लेकिन उनके पिता के विश्वस्त परंपरावादी गुटों ने उन्हें विवश रखा.

लंदन स्थित रिसर्च इंस्टिट्यूट चैथम हाउस के नील क्विलियम मानते हैं कि इसके बावजूद बशर ने पूरी सतर्कता से कुछ पश्चिमी पत्रकारों, अकादमिकों और नीति-निर्माताओं से संबंध रखे, ताकि वह उनकी पहुंच में दिख सकें.

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