कितना जायज़ है सीरिया पर अमरीकी मिसाइल हमला?

  • 15 अप्रैल 2018
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अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस ने सीरिया मिसाइल हमले पर स्पष्टीकरण देते हुए इसे सही ठहराया है.

इसके संदर्भ उन्होंने तर्क देते हुए कहा कि रसायनिक हथियारों के इस्तेमाल पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध को बनाए रखने के लिए यह ज़रूरी था.

उन्होंने कहा कि सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल असद के रासायनिक शस्त्रागारों को नीचा दिखाने और सीरिया में आम लोगों के ख़िलाफ़ भविष्य में कोई रासायनिक हमला न हो, इसे सुनिश्चित करने के लिए ऐसा किया गया.

ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरिज़ा मे ने कहा कि ब्रिटेन हमेशा से वैश्विक नियमों और राष्ट्रीय हितों के मानकों की सुरक्षा के लिए खड़ा रहा है. साथ ही ब्रिटेन अंतरराष्ट्रीय समुदाय के हितों के लिए भी प्रतिबद्ध है.

हालांकि ऑपरेशन से जुड़ी औपचारिक जानकारियां बाद में साझा की गईं लेकिन ब्रिटेन की ओर से शुरू से यही कहा जाता रहा कि उसका ये क़दम सीरियाई नागरिकों को भविष्य में इस तरह के किसी भी हमले से सुरक्षित करना है.

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कानूनी तौर पर, अगर रासायनिक हथियारों के ख़िलाफ अंतरराष्ट्रीय क़ानून को लागू करने के लिए हिंसा का सहारा लेना पड़ता है तो फिर ये उस दौर में लौट जाने जैसी बात होगी जब संयुक्त राष्ट्र संघ का अस्तितव भी नहीं था.

क्या कहता है इंटरनेशनल क़ानून

संयुक्त राष्ट्र संघ देशों को स्वरक्षा के लिए सेना का इस्तेमाल करने की छूट देता है. साथ ही अगर सरकार ही अपने लोगों के ख़िलाफ़ हो जाए तो उनकी सुरक्षा के लिए भी. इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा को बनाए रखने के लिए भी बल का इस्तेमाल किया जा सकता है. हालांकि इस तरह की किसी भी कार्रवाई की कितनी ज़रूरत है, यह एक अहम मुद्दा है.

हालांकि यह व्यवस्था सिर्फ़ इसलिए है कि हमले के दौरान देश अपनी सुरक्षा को सुनिश्चित कर सकें लेकिन सिर्फ़ राजनैतिक इस्तेमाल के लिए इसका प्रयोग नहीं किया जा सकता है. 1945 से लागू अंतरराष्ट्रीय क़ानून प्रतिशोध के लिए किसी भी तरह के सैन्य हमले का विरोध करता है.

1981 में इसराइल ने इराक के ओसिराक न्यूक्लियर रिएक्टर पर हमला कर दिया था, जिसकी संयुक्त राष्ट्र संघ ने काफ़ी आलोचना की थी. इस पर इसराइल ने यह दलील दी थी यहां ऐसे हथियार बन सकते थे जो भविष्य में एक बड़े जनमानस के लिए ख़तरनाक साबित हो सकते थे. इसके अलावा एक कथित रासायनिक हमले के बदले 1988 में अमरीका द्वारा सूडान पर हमले की भी कड़ी निंदा की गई थी.

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इस मामले में ब्रिटेन, अमरीका और फ्रांस ने यह दलील दी है कि वो सीरिया को यह याद दिलाना चाहते थे कि वो रासायनिक हथियार सम्मेलन के तहत तय किए गए दायित्वों को भूले नहीं. सीरिया साल 2013 में इसका हिस्सा बना था.

यह रासायनिक हथियारों के निर्माण, उसे रखने और इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाता है. 192 देशों ने इस पर हस्ताक्षर किए थे.

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2118 में सीरिया के रासायनिक हथियारों के ज़खीरे को नष्ट करने की बात कही गई है. जिसका पालन करना सीरिया के लिए अनिवार्य है.

रूस का वीटो

हालांकि तब से लेकर अभी तक सीरिया में कथित रासायनिक हमलों का 40 से अधिक बार इस्तेमाल हो चुका है. रासायनिक हथियारों पर नज़र रखने वाले संगठन (ऑर्गनाइज़ेशन फ़ॉर द प्रोहिबिशन ऑफ़ केमिकल वीपन्स यानी ओपीसीडब्ल्यू) इस बात की पड़ताल कर सकने में समर्थ्य है कि रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल हुआ है या नहीं.

ओपीसीडब्ल्यू और सुरक्षा परिषद द्वारा रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल के तहत ज़िम्मेदारियां तय हों, इसके लिए एक विशेष संयुक्त तंत्र की स्थापना भी की गई थी. हालांकि जब पिछले साल इस तंत्र ने असद सरकार को इसके तहत चेतावनी दी तो रूस ने अपने वीटो का इस्तेमाल किया.

इस बार भी जब डूमा में रासायनिक हमले हुए तो इस तंत्र को नए तरीक़े से स्थापित करने की कोशिश की गई लेकिन ये एक बार फिर रूस ने सुरक्षा परिषद में अपने वीटो पावर का इस्तेमाल किया जिससे यह फ़ेल हो गया.

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वहीं रूस ने अपना एक अन्वेषक तंत्र प्रस्तावित किया था लेकिन पश्चिमी देशों ने उसे यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि यह पर्याप्त रूप से मज़बूत नहीं है.

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से आदेश प्राप्त किए बिना ही सीरियाई में अपने हस्तक्षेप को सही ठहराते हुए तीनों देशों ने यह तर्क दिया है कि सीरिया पर हमला करके उन्होंने न ही सिर्फ़ रसायनिक हथियारों के इस्तेमाल पर पाबंदी के नियमों के एक सार्वजनिक आदेश को पूरा किया है बल्कि सीरिया को उसके दायित्वों को भी याद दिलाने की कोशिश की है.

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तीनों देशों का यह तर्क साल 2003 में इराक पर हमले की याद दिलाता है. इसके अलावा पिछले साल अप्रैल में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने शायरत में सीरियाई एयर बेस पर 59 क्रूज़ मिसाइल दागे थे. ऐसा दावा किया गया था कि सीरिया के ख़ान शेखुन शहर में रासायनिक हमले के तहत ये मिसाइल दागे गए थे. उस वक़्त भी यही कहा गया था कि रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल को प्रतिबंधित करने के लिए ऐसा किया गया.

एक ओर जहां तीनों मुल्क़ रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल को प्रतिबंधित करने का तर्क़ दे रहे हैं वहीं रूस का कहना है कि किसी देश पर इस तरह हमला करना बल उपयोग निषेध क़ानून का उल्लंघन है.

वहीं संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने भी सुरक्षा परिषद की प्रधानता का सम्मान करने की आवश्यकता पर बल दिया है.

मानवीय पीड़ा

सुरक्षा परिषद की आम सहमति वाली कार्यप्रणाली को दरकिनार करके ये तीन देश जनहित में कार्य करने का दावा कर रहे हैं वहीं ये स्थिति एक बार फिर से रूस और पश्चिमी देशों के बीच शीतयुद्ध की आशंका को भी दिखाती है.

इसी दिशा में में न केवल रसायनिक हथियारों का प्रयोग न करने के दायित्व की बात कही, बल्कि भविष्य में इस तरह के और हमलों से आम जनता की सुरक्षा को सुनिश्चित करने की ओर क़दम उठाने पर बल दिया. उनका यह मानवतावादी दृष्टिकोण हमलों के पक्ष में अधिक मज़बूत और प्रेरक तर्क है.

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जब 2013 में गूटा में हमला हुआ तो लगा कि सैन्य कार्रवाई की जाएगी. ब्रिटेन पहले ही मानवीय आधार पर दख़ल का प्रस्ताव रख चुका था. ऐसे तर्क दिए जाते रहे हैं कि अगर बेहद मानवीय संकट का दौर है और कोई विकल्प नहीं बचा है को दूसरे देश सैन्य कार्रवाई कर सकते हैं.

मानवीय आधार पर कार्रवाई के सिद्धांत ने साल 1990 में विश्वास प्राप्त किया. जब सद्दाम हुसैन के विनाश से इराक को बचाने के लिए इसे अपनाया गया था. बाद में इसे लाइबेरिया और सिएरा लियोन सहित दूसरे देशों में भी लागू किया गया.

हालांकि 1999 में जब कोसोव युद्ध हुआ तो इस मत में फूट पड़ गई और इसके बाद संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि सैन्य कार्रवाई तभी की जा सकती है जब कोई त्वरित ख़तरा हो. इसके बाद रक्षा की ज़िम्मेदारी का सिद्धांत का दायरा छोटा करके कहा गया कि ऐसी कोई भी सैन्य कार्रवाई सुरक्षा परिषद की निगरानी में होगी. लेकिन अब कुछ देश ऐसे हैं जो काउंसिल की मंज़ूरी के बिना सैन्य कार्रवाई में यक़ीन रखते हैं.

इस मामले में ब्रिटेन का कहना है कि सीरिया इतिहास को दोहरा रहा है. इसके अलावा कहा गया है कि हमले की ताक़त का पूरा ख़्याल रखा गया था और यह बेहद सीमित हमला था. जिसका मक़सद रासायनिक हथियारों के जख़ीरों को नष्ट करना था ताकि भविष्य को सुरक्षित किया जा सके.

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जाहिर हैं कि हर देश खुद को सही ही ठहराएगा और अपने किए के संदर्भ में तर्क देगा. ये तर्क कुछ ऐसे ही हैं जैसे 2003 में इराक युद्ध के दौरान ब्रिटेन ने दिए थे. साइप्रस में अपने मिलिट्री बेस की सुरक्षा का हवाला लेकर ब्रिटेन ने हमला किया था.

लेकिन इस बात के कोई सुबूत नहीं थे कि बग़दाद इस तरह की कोई रणनीति बना रहा है. ठीक इसी तरह सीरिया मामले में भी इस तरह के कोई उदाहरण सामने नहीं हैं जिससे ये पता चलेकि सीरिया अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस पर हमले की तैयारी कर रहा था.

(मार्क वेलर कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल लॉ के प्रोफेसर हैं, साथ ही ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस की हैंडबुक ऑन द यूज़ ऑफ़ फोर्स इन इंटरनेशनल लॉ के लेखक हैं.)

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