सीरिया पर अमरीकी हमलों से राष्ट्रपति बशर अल-असद झुक जाएंगे?

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सीरिया पर साल भर पहले हुए हमलों से ये ज़्यादा बड़ा हमला था. एक के बजाय तीन ठिकाने निशाने पर थे.

पिछली बार अमरीका ने सीरिया पर हमले की कार्रवाई अकेले की थी लेकिन इस बार फ्रांस और ब्रिटेन उसके साथ थे.

सीरियाई ठिकानों पर पिछली बार जितनी मिसाइलें दागी गई थीं, इस बार उसके दोगुने से भी ज़्यादा दागी गईं. कुल मिलाकर इस बार 120 से कुछ ज़्यादा फ़ायर किए गए.

लेकिन इन सब बातों के बावजूद बुनियादी सवाल अब भी अपने जवाब का इंतज़ार कर रहा है. क्या इससे अमरीका ने अपने उसक मक़सद को हासिल कर लिया?

जैसा कि अमरीकी कह रहे थे कि उनके हमले के बाद राष्ट्रपति बशर अल-असद रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल से परहेज करेंगे.

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Image caption हवाई हमलों के बाद सीरियाई लोग ईरान, रूस और अपने देश का झंडा लहराते हुए

असद की जीत

पिछले बरस अप्रैल के महीने से सीरिया की तकलीफ़ों का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वो ख़त्म होता हुआ फिलहाल तो नहीं दिख रहा है.

लेकिन सीरिया के हालात में दो बुनियादी बदलाव देखे जा सकते हैं. पहली चीज़ तो ये कि राष्ट्रपति असद की सरकार ने अपनी लड़ाई असरदार तरीके से जीत ली है.

और दूसरी बात ये कि सीरिया के आम नागरिकों को डर दिखाने की रणनीति के फ़ायदे दिखने शुरू हो गए हैं.

असद की सरकार भले ही पूरे सीरिया पर हुकूमत नहीं करती हो लेकिन रूस और ईरान की समर्थन के बदौलत कोई उन्हें हकीकत में चुनौती देने की स्थिति में नहीं है.

हां, सरकारी मशीनरी, साज़ोसामान और सामर्थ्य की कमी के कारण असद सीरिया पर अपने नियंत्रण का विस्तार और उसे पुख्ता नहीं कर पा रहे हैं.

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अमरीका, फ़्रांस और ब्रिटेन ने शनिवार सुबह सीरिया में अलग-अलग सरकारी ठिकानों पर बमबामी शुरू

रूस और सीरिया

इसका एक पहलू ये भी है कि अमरीका और रूस के रिश्ते ख़राब हुए हैं.

ख़ासकर पश्चिमी देशों के साथ रूस का संबंध इस हद तक बिगड़ गया है कि कुछ लोग इसे नए शीत युद्ध की आहट के तौर पर भी देखने लगे हैं.

शायद यही वजह है कि ट्रंप सीरिया पर हमला करके असद की सरकार को आंख दिखाना चाहते हैं और दूसरी तरफ़ भी अमरीकी कार्रवाई को इसी तरह से देखा जाएगा.

क्या सीरिया झुक जाएगा या अड़ा रहेगा?

मिल रहे जनसमर्थन की आड़ में क्या राष्ट्रपति असद सीरिया के हालात पर पुनर्विचार करने की जिम्मेदारी से बच जाएंगे?

रूस भले ही कुछ भी कहे लेकिन मुमकिन है कि असद से उसकी इस मसले पर कड़े लफ़्जों में बात हुई हो? अगर वे ऐसा करते हैं तो इसका कोई असर भी होगा या नहीं?

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ट्रंप का भटकाव

अमरीका की तरफ़ से इस पूरे घटनाक्रम को देखने के बाद मैंने इसमें पेचीदगियां देखीं और कई लिहाज से ये चिंताजनक भी लगता है.

ऐसा लगता है कि ट्रंप प्रशासन सीरिया के मुद्दे पर कोई स्पष्ट रुख नहीं रखता. एक तरफ़ राष्ट्रपति ट्रंप घरेलू मोर्चे पर खुद ही कई परेशानियों से घिरे हैं.

उनका अतीत उन्हें परेशान करने अक्सर ही लौट कर सामने आ जाता है. कई बार तो ये लगता है कि वे असद की जगह अमरीकी न्याय प्रणाली पर हमला कर देंगे.

पिछले हफ़्ते जब दुनिया इस बात को लेकर फिक्रमंद थी कि ट्रंप सीरिया के साथ क्या करने वाले हैं, अमरीकी मीडिया सबकुछ छोड़ ट्रंप की परेशानियों पर फोकस कर रहा है.

सीरिया पर हमले से पहले ट्रंप जिस तरह की बयानबाज़ी कर रहे थे, उससे ऐसा लग रहा था कि हमले का पैमाना बहुत बड़ा होने वाला है. लेकिन हकीकत में ऐसा हुआ नहीं.

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सीरिया में हमले की तैयारी

रासायनिक हथियार

रूस और सीरिया इस क्या मतलब निकालेंगे? मालूम पड़ता है कि अमरीका ने आम लोगों और दूसरे देशों को नुक़सान पहुंचाने से बचने की पूरी कोशिश की है.

यहां दूसरे देशों से मतलब रूस से हैं. अमरीका ने रूस के जिन तीन ठिकानों को हमले के लिए चुना, उसके मुताबिक़ ये रासायनिक हथियार रखने के अड्डे थे.

लेकिन इसका दूसरा पहलू ये है कि उन ठिकानों को चुनाव इसलिए भी किया गया था ताकि दोतरफ़ा नुक़सान की संभावनाओं को कम से कम रखा जा सके.

हमले के बाद अमरीकी सेना की तरफ़ से प्रेस से ये कहा गया कि उनके पास दूसरे टारगेट्स की भी लिस्ट है, लेकिन उनपर हमला नहीं किया जा रहा है.

संदेश साफ़ था कि असद की हूकुमत अगर रासायनिक हथियारों का फिर इस्तेमाल करेगी तो सीरिया पर आगे भी हमले होते रहेंगे.

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Image caption दमिश्क के आसमान में रात के वक्त एक धमाके का दृश्य

सीरिया का संघर्ष

पिछले साल अप्रैल महीने से सीरिया में कथित तौर पर कई बार रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया जा चुका है. अमूमन इनमें क्लोरीन गैस का होता है.

लेकिन अमरीका ने पिछली अप्रैल के बाद इस अप्रैल में हमले किए. इसका क्या मतलब निकाला जाए?

अब उम्मीद ये की जा रही है कि राष्ट्रपति असद अपने तौर तरीके बदेलेंगे. लेकिन बड़े फलक पर देखें तो सीरिया के संघर्ष की कैसी तस्वीर बनती हुई दिख रही है.

सीरिया में जारी बर्बर लड़ाई ख़त्म होती हुई नहीं दिख रही है. बैरल बम, टैंक और गोलियां... ये वो हथियार हैं जिनसे सीरिया में जानोमाल का नुक़सान जारी है.

न कि रासायनिक हथियार. लेकिन इसके बावजूद पश्चिमी देशों रासायनिक हथियारों के मुद्दे पर सीरिया पर सैनिक कार्रवाई शुरू की.

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Image caption अमरीकी रक्षा मंत्री ने सीरिया पर हमले के कुछ ही देर बाद मीडिया को संबोधित किया था

पश्चिम देश का डर

रासायनिक हथियारों को लेकर पश्चिम के डर के पीछे कुछ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कारण हैं.

पहले विश्व युद्ध में इनका इस्तेमाल किया गया था और यहीं कारण है कि पश्चिमी देशों को इससे डर लगता है.

रासायनिक हथियारों पर प्रतिबंध लगाने वाले संधि एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय निरशस्त्रीकरण समझौता है.

एक बड़ा सवाल ये भी है कि सीरिया पर ताज़ा हमले से हकीकत में क्या बदल जाएगा? क्या सीरिया का संघर्ष खत्म हो जाएगा? दुर्भाग्य है कि इसका जवाब है, नहीं.

कुछ समय पहले ही ट्रंप ने सीरिया से अमरीकी सैनिकों को हटाने की बात कही थी. इसके कुछ दिनों बाद उन्होंने सीरिया पर बड़ी सैनिक कार्रवाई की चेतावनी दी.

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सीरिया में केमिकल हमले का संदेह

सोची समझी रणनीति

सीरिया पर ट्रंप प्रशसान का रवैया ज़्यादातर ढुलमुल ही रहा है, और इसमें कोई एकरूपता कम ही देखने को मिली है.

इस बात में भी कोई संदेह नहीं है कि सीरिया में चल रही लड़ाई को ख़त्म करने के लिए एक सोची समझी रणनीति का अभाव है.

सीरिया में अमरीकी सैनिकों को तैनात रखे जाने के पक्ष में ये दलील दी जाती है कि इससे उनके स्थानीय सहयोगियों जैसे कुर्द लड़ाकों को ताकत मिलेगी.

दरअसल, उन्हें वहां इसलिए रखा गया है ताकि असद की हुकूमत और उसके मददगार देश ईरान से निपटा जा सके.

ये बात भी दिलचस्प है कि ट्रंप प्रशासन अभी तक केवल ईरान के मसले पर अपने रुख पर कायम रही है.

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आख़िर इज़रायल ने क्यों किया था सीरिया पर हमला?

सीरिया की समस्याएं

लेकिन इससे भी अमरीकी नीति को समझने में कोई मदद नहीं मिलती है.

सीरिया पर हमले के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने बयान में इस बात पर जोर दिया कि उसका इरादा सीरिया में अनंतकाल तक बने रहने का नहीं है.

ट्रंप की उम्मीद समझ में आती है. वे चाहते हैं कि दूसरे देश इस जिम्मेदारी को मिलकर उठाएंगे और अमरीका इससे पीछा छुड़ा लेगा. लेकिन वे कौन देश होंगे, ये तय नहीं है.

अमरीकी बयान से सीरिया की भौगोलिक परिस्थितियों और समस्याओं के संकेत मिलते हैं और इसका ये मतलब भी है अमरीका शायद ही वहां लंबे समय तक रहना चाहे.

अगर अमरीका ऐसे ही संकेत दे रहा है तो रूस को क्यों चिंतित होना चाहिए?

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रूस का रोल

सीरिया में बशर अल-असद की सरकार को राजनीतिक और सैन्य समर्थन देकर रूस ने मध्यपूर्व में अपने आप को एक बड़े खिलाड़ी के तौर पर स्थापित कर लिया है.

रूस ने अमरीका को सीरिया पर हमला न करने के लिए चेताया भी था. लेकिन इस हमले के बाद रूस क्या करेगा?

सीरिया में वो अमरीकी दखलांदाज़ी को फिलहाल तो रूस नज़रअंदाज़ करेगा. वो इस मसले पर अमरीका से कोई लड़ाई भी लड़ने नहीं जा रहा है.

ऐसी आशंकाएं कुछ असाधारण मामलों को छोड़कर ज़्यादातर दूर की कौड़ी साबित होती रही हैं.

अमरीकी रक्षा मंत्री ने रूस की जवाबी कार्रवाई का जिक्र करते हुए कहा, "असद की सरकार से जुड़ी ताक़तें आने वाले दिनों में ग़लत सूचनाएं फैलाना का अभियान चलाएंगी."

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सूचनाओं की लड़ाई

लेकिन ऐसा लगता है कि रूस के साथ ये खेल शुरू हो चुका है. सीरिया में जिन जगहों पर रासायनिक हमलों की बात कही गई हैं, वहां रूस की मौजूदगी है.

ये वही रूस है जिसे पश्चिमी देशों ने पूर्वी रूसी जासूस सर्गेई स्क्रिपल को ज़हर देकर मारने की कोशिश के लिए एक सुर में जिम्मेदार ठहराया है.

ये वही रूस है जिस पर ये आरोप लगे कि उसने अमरीकी चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश की है. राष्ट्रपति पुतिन के रूस ने ही यूक्रेन के कुछ हिस्सों पर कब्ज़ा किया.

ऐसी ख़बरों की लिस्ट बहुत लंबी है. ग़लत सूचनाएं फैलानी की लड़ाई शुरू हो चुकी है. इस पूरे प्रकरण को एक नए शीत युद्ध की वापसी के तौर पर भी पेश किया जा रहा है.

भले ही इससे परमाणु हथियारों की जंग का ख़तरा न हो लेकिन रूस वैसे बड़े ख़तरे भी उठा सकता है जो उसने अतीत में कभी नहीं किया होगा.

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