सीरिया में 'यहूदी' इसराइल के ख़िलाफ़ 'शिया' ईरान का मोर्चा

  • 17 अप्रैल 2018
इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू, ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी और सीरिया के बशर अल-असद इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू, ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी और सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद

सीरिया पर अमरीका और उसके दोस्त देशों के हमले के बाद रूस और पश्चिमी दुनिया के बीच तनाव और ज़्यादा बढ़ गया है.

अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस ने ये हमला सीरिया पर रासायनिक हथियार रखने और इसके इस्तेमाल का इल्ज़ाम लगाकर किया.

रूस हमेशा से विद्रोहियों के खिलाफ़ सीरिया की सरकार का सैन्य और कूटनीतिक सहयोगी रहा है.

लेकिन मध्यपूर्व क्षेत्र के नज़रिए से देखा जाए तो सीरिया में एक और महत्वपूर्ण शक्ति मौजूद है, ईरान.

बीबीसी फ़ारसी के संपादक इब्राहिम ख़लिली बताते हैं, "ईरान ने सीरिया में सैन्य ठिकाने बनाए हैं, अपनी हज़ारों टुकड़ियां वहां सैन्य सलाहकार के तौर पर भेजी हैं जिन्होंने दूसरे मुस्लिम देशों से आए लड़ाकों को भर्ती किया, ट्रेनिंग और हथियार दिए."

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Image caption ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह ख़ामेनेई ने अमरीका, फ्रांस और ब्रिटेन को अपराधी कहा

सीरिया को ईरान की मदद

इब्राहिम ख़लिली कहते हैं, "हालांकि ईरान अधिकारिक तौर पर इसे नहीं मानता लेकिन अनाधिकारिक तौर पर सीरिया में अपनी सफ़लताओं को काफ़ी गिनाता है."

वह बताते हैं कि ईरान ने असद सरकार को क्रेडिट के तौर पर 10 से 15 लाख मिलियन डॉलर की आर्थिक सहायता भी दी है.

साथ ही सीरिया के पावर प्लांट्स के लिए बहुत ही सस्ता या मुफ़्त तेल और तकनीकी सहायता भी देता रहा है.

इसी क्षेत्र में बीबीसी के संवाददाता मेथ्यू प्राइस का कहना है कि ईरान धीरे-धीरे सीरिया के भीतर जड़ें जमा रहा है.

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Image caption रूस और ईरान हैं सीरिया के मुख्य सहयोगी

सीरिया और ईरान की नज़दीकियां

दोनों देशों के बीच संबंधों का इतिहास 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति से शुरू होता है.

बशर-अल-असद के पिता हाफ़िज़ अल-असद पहले अरब नेता थे जिन्होंने नए इस्लामिक गणतंत्र के तौर पर ईरान को स्वीकारा.

हालांकि सीरिया में सुन्नी मुसलमान ज़्यादा हैं लेकिन राष्ट्रपति असद का परिवार अलावी है जो शिया मुसलमान माने जाते हैं. ईरान भी शिया बहुल देश है.

इस रिश्ते से सऊदी अरब भी बैचेन है जो कि एक सुन्नी मुसलमानों का शक्तिशाली देश है. साथ ही सऊदी मध्यपूर्व क्षेत्र में ईरान को अपना मुक़ाबला मानता है.

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Image caption दोनों देशों के बीच संबंध अल-असद के पिता के वक्त से रहा है

इसराइल के खिलाफ़ रणनीति

हालांकि सीरिया के गृहयुद्ध ने शिया और सुन्नियों में तनाव को बढ़ा दिया है लेकिन इब्राहिम ख़लिली मानते हैं कि सीरिया में ईरान की रणनीति सिर्फ़ धर्म आधारित नहीं है बल्कि जियोपॉलिटिकल भी है.

इब्राहिम कहते हैं कि 1979 से ही ईरान का लक्ष्य इसराइल के खिलाफ़ लड़ना रहा है.

यहां तक कि वह इसराइल को मान्यता देने से तो इनकार करता ही रहा है बल्कि दोनों देश कई बार आमने-सामने भी आए.

इसलिए सीरिया ईरान के लिए इसराइल के खिलाफ़ एक मोर्चा भी है.

ईरान के सरकारी चैनलों ने अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस के हमले की निंदा की है और कहा है कि ये सैन्य कार्रवाई रासायनिक हथियारों को लेकर एक हफ़्ते तक प्रोपैगैंडा करने के बाद की गई.

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह ख़ामेनेई ने इन तीनों देशों के नेताओं को अपराधी कहा है.

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अमरीका, फ़्रांस और ब्रिटेन ने शनिवार सुबह सीरिया में अलग-अलग सरकारी ठिकानों पर बमबामी शुरू

'सीरिया में ईरान भले के लिए'

तेहरान विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मोहम्मद मोरांदी कहते हैं, "ईरान को कोई शक़ नहीं है कि सीरिया सरकार ने कोई रासायनिक हमला नहीं करवाया है. ईरान को ये भी शक़ नहीं है कि अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस भी ये बात जानते हैं."

ईरान की सरकार से करीबी रखने वाले मोरांदी का तर्क है कि ईरान तो सीरिया मसले में 2013 के बाद ही शामिल हुआ है जब पहले ही हज़ारों विदेशी लड़ाके और चरमपंथी सीरिया को अस्थिर कर रहे थे.

उनके मुताबिक ईरान तो सीरिया में उसके भले के लिए अपना प्रभाव और मौजूदगी वहां बढ़ा रहा है.

"अगर सीरिया इन विदेशी लड़ाकों और चरमपंथियों की वजह से, जिन्हें पश्चिम और विदेशी ताकतें पैसा देती हैं, बर्बाद हो जाता तो ना तो आज सीरिया होता और शायद इराक़ भी ना होता और शायद लेबनान भी नहीं."

वे आगे कहते हैं, "ईरान तब तक सीरिया में रहेगा जब तक देश चरमपंथियों की चंगुल से छूटकर सीरिया सरकार के पास नहीं आ जाता."

लेकिन यही नज़रिया इसराइल का नहीं है.

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Image caption ईरान का लक्ष्य इसराइल के खिलाफ़ रहा है

ईरान दुश्मनों का इंतज़ार नहीं करता

सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स के डेन डाइकर ने बीबीसी को बताया, "शियाओं का असर ईरान से लेकर लेबनान और यहां तक कि सुन्नी बहुल आबादी वाले गज़ा तक भी है. आज इस स्थिति ने एक रणनीतिक ख़तरा पैदा कर दिया है, ख़ासकर इसराइल के लिए."

"इसराइली रक्षा अधिकारियों और सैन्य रणनीतिकारों को पता है कि ईरान मध्यपूर्व में अपना प्रभुत्व कायम करना चाहता है."

पश्चिम के खुफ़िया मामलों के जानकारों ने नवंबर 2017 में बीबीसी को बताया था कि इसराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू की चेतावनी के बावजूद ईरान सीरिया में स्थायी सैन्य बेस बना रहा है.

उस वक्त प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने कहा था कि इसराइल ऐसा नहीं होने देगा.

हालांकि इसराइल इस बात की पुष्टि नहीं करता लेकिन इसराइल के लड़ाकू विमानों ने पिछले कुछ महीनों में सीरिया के कई ठिकानों को अपना निशाना बनाया है.

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Image caption ईरान के विदेश मामलों की समिति के चेयरमैन अलेप्पो शहर का दौरा करते हुए

जियोपॉलिटिकल इंटरेस्ट

हाल ही में 9 अप्रैल को ऐसी घटना हुई जब सीरिया ने बताया कि उसके सैन्य हवाई अड्डे पर हमला किया गया जिसमें 14 लोगों की मौत हो गई.

इनमें से कुछ ईरान के सैनिक भी थे. बीबीसी फ़ारसी एडिटर इब्राहिम ख़लिली का मानना है कि इन लोगों को ईरान ने शहीद के तौर पर दफ़नाया.

ख़लिली कहते हैं कि ईरान के नेताओं के मुताबिक उनके जियोपॉलिटिकल इंटरेस्ट (भूराजनीतिक हित) उनके देश की सीमाओं से बाहर भी हैं.

"उनके नज़रिए के हिसाब से वे दुश्मन के उन तक आने का इंतज़ार नहीं करते, वे वहां जाकर लड़ते हैं जहां उनके दुश्मन हैं."

ये रणनीति बशर-अल-असद सरकार के लिए भी फायदेमंद साबित हुई. ईरान के दख़ल और मौजूदगी की वजह से सरकार अलेप्पो शहर को बचाने में कामयाब रही.

लेकिन ईरान के लेबनान तक बढ़ते प्रभाव से, जहां उसका सहयोगी हिज़्बुल्लाह मौजूद है, इस स्थिति ने कई लोगों को चिंता में डाल दिया है.

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