ब्रिटेन में राष्ट्रमंडल बैठक: लंदन से क्या लाएंगे मोदी?

  • 18 अप्रैल 2018
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Image caption ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ से हाथ मिलाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

पिछली साल जब प्रिंस चार्ल्स नवम्बर के महीने में भारत आए थे तो उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस हफ़्ते लंदन में होने वाली कॉमनवेल्थ बैठक में शामिल होने के लिए महारानी एलिज़ाबेथ का व्यक्तिगत निमंत्रण दिया था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस निमंत्रण को स्वीकार करते हुए 19 से 20 अप्रैल को लंदन में होने वाली कॉमनवेल्थ देशों के राष्ट्राध्यक्षों की बैठक में शामिल होंगे.

बीते एक दशक में ऐसा करने वाले वह पहले प्रधानमंत्री होंगे.

मोदी को विशेष निमंत्रण का मतलब?

दिल्ली स्थित ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन से जुड़ीं जयश्री सेनगुप्ता बताती हैं, "ब्रिटेन का नरेंद्र मोदी को इस तरह महत्व देना बताता है कि ब्रेक्सिट के बाद के दौर में ब्रिटेन को विदेशी निवेश की बेहद ज़रूरत है."

ब्रिटेन और भारत के लिए ये स्थिति ऐसी है जिसमें दोनों देशों का फायदा है.

भारत के लिए राष्ट्रमंडल देशों का समूह एक ऐसा मंच है जिसमें वह इस समूह के 53 देशों के साथ रणनीतिक रूप से अपने संबंधों को मजबूत कर सकता है.

राष्ट्रमंडल देशों का समूह एक ऐसा मंच भी है जहां चीन की मौजूदगी नहीं है जिससे भारत के पास विश्व मंच पर अपने बड़े प्रतिद्वंद्वी के साये में छुपने का जोख़िम भी नहीं है.

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Image caption साल 2011 में हुई इस बैठक में भारत की ओर से उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी शामिल हुए

भारत में राष्ट्रमंडल देशों की 2.4 अरब लोगों की आबादी का 55 फ़ीसदी हिस्सा रहता है.

ये एक अहम मौका होगा क्योंकि साल 2010 के बाद से पहली बार कोई भारतीय प्रधानमंत्री इस बैठक में भाग लेने वाला है. साल 2011 और 2013 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस बैठक में हिस्सा नहीं लिया था. इसके बाद 2015 में मोदी भी इसमें शामिल होने नहीं पहुंचे थे.

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भारत को राष्ट्रमंडल देशों में शामिल कराया था.

लेकिन उनके बाद के प्रधानमंत्रियों ने राष्ट्रमंडल में रुचि नहीं दिखाई. इसे अक्सर एक औपनिवेशिक पहचान के रूप में देखा गया.

भारत के लिए राष्ट्रमंडल के पुनर्जन्म के मायने

भारत इस मंच की मदद से मुक्त व्यापार, सुरक्षा, शिक्षा और कौशल विकास के क्षेत्रों पर अपना रुख स्पष्ट कर सकता है.

किंग्स कॉलेज लंदन के प्रोफेसर हर्ष पंत ने बीबीसी को बताया, "भारत मुक्त व्यापार के मुद्दे पर देशों का समूह बनाकर विश्व व्यापार संगठन में अपनी बात पुरजोर अंदाज में रख सकता है. वहां पर आर्थिक खुलेपन को लेकर समर्थन और संरक्षणवाद के ख़िलाफ़ माहौल बनेगा जिससे भारत की व्यापारिक क्षमता पर असर पड़ेगा."

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Image caption ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के साथ पीएम नरेंद्र मोदी

वह बताते हैं कि राष्ट्रमंडल समूह के देशों के बीच व्यापारिक खर्चा उन देशों के मुक़ाबले 19 फ़ीसदी कम है जो इसके सदस्य नहीं हैं. राष्ट्रमंडल के बारे में ज़्यादा नहीं जानने वाले भारतीय युवाओं को इसका सीधा फायदा मिलेगा क्योंकि इससे नई नौकरियां पैदा होंगी.

प्रोफेसर हर्ष पंत कहते हैं, "अगर राष्ट्रमंडल को एक मंच के रूप में देखें जहां एक तरह के बाज़ार उभर सकते हैं, एक जैसे व्यापारिक मोर्चे सामने आ सकते हैं तो मैं सोचता हूं कि इससे भारत को दूसरे मंचों पर ज़्यादा अधिकार से अपनी बात रखने का मौका मिलेगा. इसमें आदर्श स्थिति ये होगी कि भारत आयात शुल्कों को हटाने की बात करे. भारत इस बारे में बात कर सकता है क्योंकि हम इसके बड़े वैश्विक अर्थों की ओर देख रहे हैं."

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क्या भारत करेगा राष्ट्रमंडल का नेतृत्व?

राष्ट्रमंडल समूह के बारे चर्चाएं चल रही हैं कि भारत से इस समूह का नेतृत्व करने को कहा जाएगा.

मुंबई यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर उत्तरा सहस्रबुद्धे, "लेकिन, ब्रिटेन के लिए भारत से इसका नेतृत्व करने की बात कहना अपने आप में बहुत जल्दबाजी होगी."

वह बताती हैं कि अगर आप भारत की विदेश नीति की प्रकृति और इसकी कूटनीति को देखें तो भारत एक अनिच्छुक उभरती हुई शक्ति है. ये एक अजीब सी स्थिति है जब दुनिया बीते दो दशकों से भारत की ओर एक उभरती हुई क्षेत्रीय शक्ति की ज़िम्मेदारी संभालने के लिए देख रही है. लेकिन भारत इसमें अब तक अनिच्छुक रहा है."

प्रोफ़ेसर उत्तरा सहस्रबुद्धे के मुताबिक़, "बीते तीन सालों में मोदी सरकार की कुछ पहलों पर नज़र डालें तो भारत सरकार की स्थिति में एक बदलाव दिखाई देता है. इनमें पाकिस्तान के ख़िलाफ़ मोर्चाबंदी करते हुए उसे छोड़कर बाकी सभी छोटे पड़ोसी देशों को साथ लेकर अंतरराष्ट्रीय सौर संधि करना शामिल है."

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प्रोफ़ेसर उत्तरा सहस्रबुद्धे का कहना है, "हालांकि, हाल की कुछ घटनाएं बताती हैं कि भारत अपने पड़ोसी देशों के मसलों पर खुद को सुरक्षित रखते हुए कोई कदम उठा रहा है. इन कदमों में मालदीव संकट में हस्तक्षेप न करने का फ़ैसला शामिल है."

"इसी तरह दलाई लामा के एक कार्यक्रम में सरकारी अधिकारियों को शामिल न होने का आदेश देकर चीन के प्रति भारत के रुख में अप्रत्याशित बदलाव देखा गया है."

"भारत एक लगातार बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है लेकिन ये अभी भी दूसरे देशों में निवेश करने में सक्षम नहीं है. ये सभी बातें भारत के एक उभरती हुई ताकत बनने के मौकों और ऐसी ताकत के रूप में इसकी छवि को प्रभावित करती हैं."

राष्ट्रमंडल समूह आख़िर क्या है?

साल 1931 में बना राष्ट्रमंडल पूर्व ब्रितानी उपनिवेशों समेत कई अन्य देशों का एक समूह है. ये मंच विकास से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देता है.

इस समूह के देशों के राष्ट्रध्यक्षों के बीच हर दो साल में एक बैठक होती है.

हर मीटिंग में एक रिट्रीट में शामिल होता है ताकि इन देशों के नेताओं की एक दूसरे को लेकर एक समझ विकसित हो सके.

कॉमनवेल्थ से जुड़े आंकड़े

  • राष्ट्रमंडल देशों में सात महाद्वीपों के 53 देश शामिल हैं
  • इनमें अफ़्रीका के 19, एशिया के 7, कैरिबियन और अमरीका के 13, यूरोप के 3 और प्रशांत क्षेत्र के 11 देश शामिल हैं
  • इन देशों की कुल आबादी 2.4 अरब है जो वैश्विक आबादी की 30 प्रतिशत है
  • भारत इस समूह की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है जिसमें 1.2 अरब लोग रहते हैं, 1635 भाषाएं बोली जाती हैं और ये राष्ट्रमंडल की कुल आबादी का 55 फीसदी है
  • कॉमनवेल्थ की 60 फीसदी आबादी 30 साल से कम है और 1 अरब लोगों की उम्र 25 साल से कम है
  • इसकी सयुंक्त सकल राष्ट्रीय आय $10.7 ट्रिलियन है
  • कॉमनवेल्थ जी20, यूरोपीय संघ, आसियान और अफ्रीकी संघ में प्रतिनिधित्व करता है
  • इसके सदस्य देश सयुंक्त राष्ट्र के 25 फीसदी सदस्यों में शामिल हैं.
  • राष्ट्रमंडल देशों का सबसे छोटा सदस्य देश नाउरू प्रशांत क्षेत्र का द्वीप है जिसकी आबादी 10 हज़ार और क्षेत्रफल 21 वर्ग किलोमीटर है.
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Image caption ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

ब्रिटेन को क्या हासिल होगा?

विशेषज्ञों के मुताबिक़, वैश्विक राजनीति में ब्रिटेन को एक नई पहचान की जरूरत है.

ब्रेक्सिट के बाद ब्रिटेन अपने नज़रिए से खुद को एक बिलकुल नए वर्ल्ड ऑर्डर में खड़ा हुआ पा रहा है.

प्रोफ़ेसर पंत मानते हैं कि ब्रिटेन नए देशों और नए मंचों को अपने करीब लाना चाहता होगा और इसके लिए राष्ट्रमंडल एक पहले से तैयार मंच है.

वह कहते हैं, "भारत समेत कैरिबियाई देशों में एक बड़ी चिंता ये है ब्रिटेन संरक्षणवादी होता जा रहा है. उदाहरण के लिए ब्रिटेन के वीज़ा नियमों के बारे में भारत को अपना पक्ष रखना होगा क्योंकि ब्रिटेन ने वीज़ा नियमों को सख़्त किया है. भारत समेत दूसरे राष्ट्रमंडल देशों के लिए ये एक चिंता का विषय है."

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राष्ट्रमंडल का इतिहास

मुंबई यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर उत्तरा सहस्रबुद्धे मानती हैं कि ब्रेक्सिट के बाद ब्रिटेन के दो उद्देश्य हैं - एक राजनीतिक और दूसरा आर्थिक.

वह कहती हैं, "राष्ट्रमंडल के इतिहास को देखें तो ब्रिटेन परोक्ष रूप से इस समूह का नेतृत्व करने में सक्षम है. 53 देशों के इस समूह के ब्रितानी नेतृत्व पर सवाल नहीं उठता. ये सुनिश्चित करता है कि यूरोपीय संघ से इसके बाहर निकलने के बाद भी ब्रिटेन इस दुनिया के लगभग 20 फीसदी क्षेत्रफल में फैले हैं और दुनिया की एक तिहाई जनसंख्या वाले देशों के समूह के शिखर पर होगा."

वह बताती हैं कि इससे राष्ट्रमंडल ब्रिटेन के आर्थिक उद्देश्य सिद्ध करता हैं. राष्ट्रमंडल देश साल 2014 में दुनिया की जीडीपी का 15 फीसदी कमाते हैं और यहां दुनिया के 1 अरब लोग रहते हैं. इससे इंट्रा-ग्रुप ट्रेड और कॉमर्स के लिए संभावनाएं पैदा करते हैं.

ऐसे में अब चुनौती ये है कि इन संभावनाओं से हासिल क्या होता है. ये देखना अहम होगा कि इन देशों के नेता एक जैसी प्रगति और उद्देश्य के साथ एक मंच पर आने के लिए क्या करते हैं.

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