पाकिस्तान सरकार का सिरदर्द बना पश्तून आंदोलन

मंज़ूर पश्तीन
Image caption मंज़ूर पश्तीन

पिछले कुछ हफ्तों से पाकिस्तान में मंज़ूर पश्तीन नाम के एक युवा पश्तून नेता लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं. जितनी तेजी से वे पाकिस्तान की राजनीति में छा गए, इसका अंदाजा बड़े-बड़े राजनीतिक पंडित और विश्लेषक भी नहीं लगा पाए.

मंज़ूर पश्तीन का सुर्खियों में आना इसी साल जनवरी से शुरू हुआ, जब दक्षिणी वज़ीरिस्तान के रहने वाले एक युवक नकीबुल्लाह मेहसुद की कराची में हुए पुलिस एनकाउंटर में मौत हो गई.

24 साल के मंज़ूर पश्तीन पाकिस्तान के युद्ध ग्रस्त इलाके दक्षिणी वज़ीरिस्तान से ताल्लुक रखते हैं. यह इलाका पाकिस्तानी तालिबान की मजबूत पकड़ के लिए जाना जाता रहा है.

आदिवासियों की आवाज़

पश्तीन की पहचान पाकिस्तान में पिछड़े और दबे-कुचले समाज की आवाज़ के रूप में उभरी है. पाकिस्तान के दूसरे सबसे बड़े जातीय समूह पश्तून लगातार अपनी सुरक्षा, नागरिक स्वतंत्रता और समान अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

मंज़ूर पश्तीन ने साल 2014 में पश्तून तहाफुज़ मूवमेंट (पीटीएम) की शुरुआत की, यह नागरिकों के ज़रिए शुरू किया गया एक अभियान था. लेकिन उस समय यह ज्यादा लोगों का ध्यान अपनी तरफ नहीं खींच पाया था.

इस साल जनवरी में जब आदिवासी इलाके के लोगों ने एक उभरते हुए मॉडल नक़ीबुल्लाह की मौत के ख़िलाफ़ प्रदर्शन शुरू किया तो मंज़ूर ने इस प्रदर्शन में शामिल लोगों का साथ दिया और बहुत ही कम वक्त में वे सुर्खियों में छा गए.

सबसे पहले जनवरी में पीटीएम ने एक रैली का आयोजन किया जो धीरे-धीरे बढ़ते हुए पाकिस्तान के अलग-अलग शहरों में फैलने लगा. इसके बाद उत्तर पश्चिम खैबर पख्तुनख्वा प्रांत में भी विरोध स्वरूप रैलियां निकाली गई. फिर इस्लामाबाद प्रेस क्लब के बाहर बैठकर 10 दिन तक विरोध प्रदर्शन किया गया.

सोशल मीडिया पर आंदोलन

इन्हीं विरोध प्रदर्शनों के बीच मंज़ूर पश्तीन ने बहुत ही शानदार तरीके से पश्तून युवाओं को सोशल मीडिया के जरिए अपने साथ जोड़ना शुरू किया. वे पाकिस्तान के अलग-अलग हिस्सों में दिए गए भाषणों को सोशल मीडिया के जरिए फैलाने लगे, इन भाषणों में आदिवासी समुदाय विशेषकर पश्तूनों के हक़ की मांग की जाती, युवा इन भाषणों की तरफ आकर्षित हो विरोध प्रदर्शन में शामिल होने लगे.

जल्दी ही जनवरी में शुरू हुए विरोध प्रदर्शन में युद्धग्रस्त इलाकों से लापता हुए लोगों के परिजन भी शामिल होने लगे. पश्तीन ने इस दौरान पिछले कुछ दशकों में युद्ध से पीड़ित लोगों की मुश्किलें, आदिवासियों की समस्याएं, ड्रोन हमलों के पीड़ित लोगों के मुद्दे उठाने भी शुरू कर दिए.

बीबीसी के साथ अपने एक इंटरव्यू में पश्तीन ने कहा, ''मैंने कुछ भी नहीं किया, इन लोगों (आदिवासी इलाकों के लोग) का लगातार शोषण हुआ है, उनकी ज़िंदगी दूभर हो चुकी है, वे सभी दबे-कुचले लोग हैं उन्हें सिर्फ एक आवाज़ चाहिए थी जो मैं दे रहा हूं.''

वामपंथी दल भी साथ आए

इस प्रदर्शन का अंत होते-होते पूरे पाकिस्तान में पश्तूनों के अभियान को एक नया स्वरूप मिल गया. पीटीएम में अलग-अलग जातियों की बीच संघर्ष, अधिकारों की लड़ाई पर एक नया सामाजिक आंदोलन पैदा हो गया. यह आंदोलन ज़मीन पर तो चल ही रहा है साथ ही सोशल मीडिया पर भी जोर पकड़ रहा है.

पश्तीन लगातार रैलियां कर रहे हैं और लोगों से मिलकर उनकी समस्याएं सुन रहे हैं, उन्हें संबोधित भी कर रहे हैं. पश्तीन ने पेशावर, क्वेटा में रैलियां की हैं वे 22 अप्रैल को लाहौर में रैली करने की योजना बना रहे हैं.

ऐसा देखा जा रहा है कि पाकिस्तान के अन्य वामपंथी दल और समूह भी अब पश्तीन के साथ खड़े हो रहे हैं. पश्तीन मोटे तौर पर तो पश्तूनों के हक़ की बात करते हैं लेकिन अन्य छोटे-छोटे समुदाय भी उनके आंदोलन से जुड़ते जा रहे हैं, यह कोई बहुत बेहतर ढांचागत आंदोलन नहीं है लेकिन धीरे-धीरे यह पूरे पाकिस्तान में अपनी जगह बनाता जा रहा है. पाकिस्तान में कुछ बुद्धिजीवियों ने तो पीटीएम को पश्तुन इंतिफ्दा और पश्तून स्प्रिंग तक कहना शुरू कर दिया है.

पीटीएम ने ना केवल नक़ीब की मौत के लिए न्यायिक जांच की मांग की है बल्कि उन्होंने इससे पहले हुई तमाम ऐसे मामलों की जांच की बात की है जिसमें कानून के रखवालों पर हत्या के आरोप लगे हैं.

वे लापता पश्तून लोगों को छोड़ने की मांग भी कर रहे हैं. पश्तीन का दावा है कि लगभग 8 हज़ार पश्तून लोग लापता हैं हालांकि सुरक्षा एजेंसियों ने इससे इंकार किया है.

पीटीएम से जुड़े कार्यक्रम रद्द हुए

जैसे-जैसे पश्तीन की आवाज़ लगातार मजबूत होती जा रही है वैसे-वैसे देश में सुरक्षा व्यवस्था के बीच भी खतरा और बैचेनी पैदा हो रही है.

हाल ही में पीटीएम से जुड़े कुछ लेखों को कई वेबसाइटों ने हटा लिया. संदेह जताया जा रहा है कि ऐसा सेना के कहने पर किया गया हालांकि इसके कोई सबूत नहीं हैं. पिछले शनिवार यानि 14 अप्रैल को अंग्रेजी के एक बड़े अखबार 'द न्यूज़' में स्तंभकार बाबर सत्तार ने एक लेख लिखा था लेकिन वह प्रकाशित नहीं किया गया.

सत्तार ने अपने एक ट्वीट में बताया कि मीडिया को #PTM और #The AgeofFreelyControlledMedia का प्रयोग करने से रोका जा रहा है. उन्होंने अपने लेख को सोशल मीडिया पर जारी किया जिसे बहुत ज्यादा शेयर किया गया.

एक दिन पहले ही पाकिस्तान की सबसे पुरानी पंजाब यूनिवर्सिटी एक असिस्टेंट प्रोफेसर अम्मार अली जान ने दावा किया कि उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया है. उन्होंने अपनी एक फेसबुक पोस्ट में लिखा, ''मुझ पर दबाव बनाया गया कि मैं मंज़ूर पश्तीन और पीटीएम से दूर रहूं नहीं तो मुझे इसके बुरे परिणाम भुगतने होंगे.''

इसी दिन कराची में एक प्राइवेट हबीब यूनिवर्सिटी में पश्तून तहाफुज़ मूवमेंट पर होने वाला एक कार्यक्रम शुरू होने से कुछ घंटों पहले ही रद्द कर दिया गया.

लाहौर यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट साइंस (एलयूएमएस) में भी 13 अप्रैल को मशाल खान की पहली पुण्यतिथि पर होने वाला कार्यक्रम रद्द कर दिया गया, मशाल खान एक पश्तून छात्र थे जिनपर ईशनिंदा के आरोप लगाए गए थे और फिर उन्हें यूनिवर्सिटी में लोगों ने पीट-पीट कर मार डाला था.

मीडिया में पीटीएम की कवरेज रोकी

इसके अलावा पाकिस्तान की मुख्यधारा वाली मीडिया पीटीएम की कवरेज पूरी तरह बंद हो चुकी है. तमाम यूनिवर्सिटियों में कार्यक्रम रद्द हो रहे हैं और उनके रद्द होने के कारण भी नहीं बताए जा रहे.

इन सभी घटनाओं के बाद इतना तो लगने लगा है कि पश्तीन और उनके आंदोलन ने पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था को हिला दिया है.

जब आदिवासी इलाकों में तालिबान की पकड़ मजबूत थी जब सेना ने वहां अपना नियंत्रण कायम करने के लिए आम लोगों की जान की भी परवाह नहीं की.

पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा ने हाल ही में पीटीएम की तरफ इशारा करते हुए अपने एक भाषण में कहा था कि बाहरी और भीतर (पाकिस्तान विरोधी) जितनी भी ताकतें हैं वे इतना जान लें कि वे चाहे जो कर लें, लेकिन देश को नुकसान नहीं पहुंचा सकते.

लेकिन इतिहास गवाह है कि आदिवासी क्षेत्र के लोगों को जबरन नियंत्रण में रखना कभी संभव नहीं रहा. पाकिस्तान के पश्तून समूहों पर कोई भी पूरी तरह अंकुश नहीं लगा पाया. ना सिर्फ पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान बल्कि ब्रिटिश और अमरीकियों ने भी जब ऐसी कोशिशें की तो उन्हें उल्टा नुकसान उठाना पड़ा.

फिलहाल तो पीटीएम पाकिस्तान के अलग-अलग शहरों में रैलियां कर रहा है, लोगों को अपने समर्थन में जुटा रहा है और अपनी मांगों को पुरज़ोर तरीके से रख रहा है. मंज़ूर पश्तीन कहते हैं कि आदिवासी लोगों को चरमपंथियों जैसा समझा जाता रहा है.

वे कहते हैं, ''हम सिर्फ अपनी इज्जत और सम्मान वापिस पाना चाहते हैं, हम सड़कों की मांग नहीं कर रहे, विकास नहीं चाहते, हम सिर्फ अपने जीने का अधिकार मांग रहे हैं.''

मुख्यधारा की मीडिया में भले ही पीटीएम की कवरेज को पूरी तरह से रोक दिया हो लेकिन फिर भी यह आंदोलन अपनी गति पकड़ता जा रहा है. अब यह देखना बाकी है कि यह आंदोलन पाकिस्तान की राजनीति को किस तरह प्रभावित करता है.

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