हज़ारों भारतीयों पर होगा ट्रंप के नए वीज़ा नियमों का असर

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"मुझे लगता है कि मुझे वापिस अपने देश जाने के लिए कह दिया जाएगा और मैं उन बुरे दिनों को फिर से नहीं जीना चाहती जहां मेरे पति दिनभर काम के लिए घर से बाहर रहते हैं और मैं बस ऐसे ही इंतज़ार करते हुए अपने दिन गुज़ार देती हूं."

प्रिया चंद्रशेकन बीबीसी को बताती हैं कि वो अपने आने वाले कल को लेकर चिंता में पड़ गई हैं.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के प्रशासन ने अमरीका में एच1बी वीज़ा धारकों के परिजनों को मिलने वाले वर्क परमिट को ख़त्म करने की घोषणा की है जिसके बाद उनका करियर संकट में पड़ गया है.

दिल्ली की रहने वाली प्रिया चंद्रशेकन अपने पिता के गुज़रने के बाद से ही काम करती रही हैं. उनके पिता की मौत के वक्त उनकी उम्र 19 साल थी. वो बीते दो सालों से वॉशिंगटन के सिएटल में सर्टिफ़ाइड पब्लिक अकाउंटेंट के तौर पर काम कर रही हैं.

दिल्ली में पिता की मौत के बाद उन्नीस की उम्र में ही वो आर्थिक रूप से आज़ाद हो गई थीं.

साल 2010 में वो अपने पति के पास अमरीका चली गईं, लेकिन इसके लिए उन्हें अपना करियर यानी कमाई का ज़रिया छोड़ना पड़ा. प्रिया के लिए ये दुखी करने वाला था.

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ओबामा के समय

पांच साल तक प्रिया ने घर में गृहिणी की भूमिका निभाई और अपने बच्चे पर ध्यान दिया. इसके बाद उन्हें अमरीका में काम करने की इजाज़त मिल गई. 2015 में राष्ट्रपति रहे बराक ओबामा के कार्यकाल के दौरान एच1बी वीज़ा के नियमों में बदलाव किए गए और एच4 वीज़ा धारकों (एच1बी वीज़ा धारकों के परिवारजनों को मिलने वाला वीज़ा) को भी अमरीका में काम करने की इजाज़त देने की बात की गई.

उन्होंने सीपीए(चार्टर्ड प्रोफ़ेशनल काउंटेंट्स) की पढ़ाई की थी. उन्हें 2016 में नौकरी मिल गई और इसके बाद उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर एक घर ख़रीदा.

आय अच्छी होने से उन्होंने साल 2017 में एक और बच्चे के बारे में सोचना शुरू कर दिया. लेकिन इस बार योजना और खर्चे में उनकी हिस्सेदारी पर काफ़ी कुछ निर्भर था.

"हमें लगा कि हम ऐसी नाव में सवार हैं जो डूबेगी नहीं, लेकिन फिर हमें पता चला कि ये इतना आसान भी नहीं था."

प्रिया कहती हैं कि अगर उन्हें काम करने की जो इजाज़त मिली है वो छीन ली जाए तो उन्हें नहीं लगता कि परिवार की खुशियां बरकरार रहेंगी.

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ओबामा के दौरान हुए बदलावों को पलटा जाएगा

2015 में ओबामा प्रशासन के दौरान एच-4 ईएडी नियम लागू किए गए थे. इसके तहत अधिक कुशल विदेशी नागरिकों और उनके परिवारों को अमरीका में बनाए रखने का उद्देश्य था. इससे पहले अमरीका में काम करने के लिए उन्हें 'ग्रीन कार्ड' के लिए दशकों तक इंतज़ार करना होता था.

एम्प्लॉयमेंट ऑथोराइज़ेशन डॉक्यूमेंट या ईएडी कार्ड को वर्क परमिट के नाम से जाना जाता है. ये दस्तावेज़ अमरीकी नागरिकता और आप्रवासन सेवा (यूएससीआईएस) द्वारा जारी किया जाता है. इसके आधार पर अमरीका में गैर-नागरिकों को अस्थायी तौर पर काम करने की अनुमति मिलती है.

'ग्रीन कार्ड' को आधाकिरिक तौर पर अमरीका का परमानेंट रेज़िडेंस कार्ड माना जाता है और इसके मिलने के बाद वहां स्थायी तौर पर रहना और काम करना आसान हो जाता है.

अमरीकी नागरिकता और आप्रवासन सेवा की निदेशक फ़्रांसिस सिस्ना ने सीनेटर चक ग्रास्ले को लिखे एक पत्र में कहा, "हमारी योजना में एच-4 वीज़ा धारकों पर आश्रित लोगों के अमरीका में काम करने का परमिट देने के नियमों में बदलाव का प्रस्ताव शामिल है. इसके बाद अब 2015 में लागू किए गए नियमों में बदलाव कर उनके काम करने की इजाज़त को पलटा जा सकेगा."

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ओबामा के कार्यकाल के दौरान लागू इस नियम को बदलने का असर क़रीब 70,000 एच-4 वीज़ा धारकों पर पड़ेगा जिनके पास वर्क परमिट है.

एच1बी वीज़ा धारकों के पति या पत्नी को एच-4 ईएडी वीज़ा दिया जाता है. ये वीज़ा पाने वालों में अधिकतर (कम से कम 93 फ़ीसदी) महिलाएं हैं जिनमें से ज़्यादातर अतिकुशल भारतीय महिलाएं हैं.

बीते साल ट्रंप प्रशासन ने अतिकुशल एच1बी वीज़ा धारकों के अमरीका आने पर लगाम कसने संबंधी कार्रवाई की घोषणा की थी और कहा था कि वो ओबामा काल में लाए गए उस कार्यक्रम पर रोक लगाने की योजना बना रहे हैं जिसके तहत एच1बी वीज़ा धारकों के पति या पत्नी को देश में काम करने की इजाज़त होती है.

उम्मीद जताई जा रही है कि ये प्रस्तावित बदलाव जून में लागू किए जाएंगे. इसका मतलब होगा कि अपने पतियों के साथ अमरीका गई कई अतिकुशल महिलाओं को काम छोड़ना पड़ेगा. हालांकि इस बात से भी इनकार नहीं है कि इनमें से कई अतिशिक्षित और अतिकुशल की श्रेणी में आती हैं.

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जो बस गए हैं उनके लिए बढ़ेंगी मुश्किलें

अपने चुनावी अभियान के दौरान डोनल्ड ट्रंप ने अपने वोटरों से वादा किया था कि वह अमरीकियों के लिए रोज़गार के अवसर बचाएंगे और आप्रवासन पर लगाम लगाएंगे.

मुंबई की रेणुका शिवराजन एक और भारतीय महिला हैं जिन पर अमरीकी प्रशासन के इस कदम का असर पड़ सकता है.

वह तकनीक के क्षेत्र में काम करने के लिए एल1 वीज़ा पर साल 2003 में अमरीका गई थीं और तब से वो शायद यहीं रह जातीं, लेकिन 2006 में उनकी शादी हुई और 2007 में उन्हें पता चला कि वो मां बनने वाली हैं.

उस वक्त वो और उनके पति अलग-अलग शहरों में काम करते थे. वो नहीं चाहती थीं कि प्रेग्नेंसी के वक्त को अकेली रहें, इसीलिए उन्होंने अपने पति के साथ रहने का फ़ैसला किया. इसका मतलब था कि उन्हें वो नौकरी छोड़नी पड़ी जिससे उऩ्हें बेहद लगाव था.

इसका ये भी मतलब था कि वो अपना एल1 वीज़ा खो देंगी क्योंकि एल1 वीज़ा केवल तब तक ही वैध होता है जब तक आप वहीं काम करते हैं जहां काम करने के लिए आप नियुक्त किए गए हैं. इस वीज़ा के तहत आप नौकरी नहीं बदल सकते.

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रेणुका को अपने पति के पास एच-4 वीज़ा धारक के रूप में आना पड़ा. वो कहती हैं, "मुझे एच-4 वीज़ा धारक के रूप में कम करने की इजाज़त नहीं थी. उस वक्त मुझे इस बात का एहसास नहीं हुआ कि मैं अपना परिचय और अपनी आर्थिक स्वतंत्रता भी खो रही हूं. मैंने ख़ुद को निराश और खोया हुआ महसूस किया. मैं किसी ऐसी चीज़ की तलाश कर रही थी जो मेरी रचनात्मकता को ज़िंदा रखे."

"मैंने ब्लॉग लिखना शुरू कर दिया. चूंकि मुझे बच्चों के साथ काम करना अच्छा लगा, इसलिए मैंने अपने स्थानीय सामुदायिक कॉलेज में अर्ली चाइल्डहुड एजुकेशन पाठ्यक्रम में दाखिला लिया. इससे मुझे जीवन में एक नए उद्देश्य और नई पहचान खोजने में मदद मिली."

साल 2015 में उन्हें कैलिफ़ोर्निया के फ़्रेमोंट में एक व्यवसायी के तौर पर काम करने का मौका मिला. वो यहीं अपने छह और 10 साल के दो बेटों और पति के साथ रहती हैं. उनके दोनों बच्चे फ़ुटबॉल खेलना पसंद करते हैं और स्थानीय फ़ुटबॉल क्लब से जुड़े हैं.

वो बे एरिया में अपना फ़ैमिली चाइल्ड केयर का काम चलाती हैं. धीरे-धीरे उनका व्यवसाय बढ़ा तो उन्हें अधिक जगह की ज़रूरत हुई. 2016 में उन्होंने एक बड़ा घर ख़रीदा. फ़िलहाल वो लगभग 16 बच्चों की सेवा कर रही हैं और उनके पास तीन शिक्षक कर्मचारी के तौर पर नियुक्त हैं.

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रेणुका कहती हैं, "मेरा व्यवसाय हमारे परिवार को चलाने में मदद करता है. इससे हमें कर्ज़ चुकाने में मदद होती है. बे एरिया में आवासीय घरों की कीमतें काफ़ी ऊंची हैं. इससे हमें हमारे बच्चों को बेहतर ज़िंदगी देने में मदद मिलती है जो अब अमरीकी नागरिक हैं. इससे मैं भारत में रह रहे मेरे सेवानिवृत्त माता-पिता और ससुराल वालों की मदद कर पाती हूं. अगर मेरी आय बंद हो गई तो हमारे लिए बैंक का कर्ज़ चुकाना मुश्किल हो जाएगा. और शायद हमें कर्ज़ चुकाने और अपने बच्चों के फ़ुटबॉल के बीच किसी एक का चुनाव करना पड़े."

वो कहती हैं, "इसका असर केवल मुझ पर नहीं बल्कि उन 16 बच्चों और उनके परिवारों पर भी होगा जो मेरे कार्यक्रम पर निर्भर करते हैं. इन सभी परिवारों को अपने बच्चों की देखभाल के लिए दूसरा विकल्प खोजना होगा. मेरे कार्यक्रम में काम करने वाले तीन शिक्षक भी अपनी नौकरियां खो देंगे."

हालांकि सरकार का ये कदम एच1बी वीज़ा धारकों के लिए आश्चर्य करने वाला नहीं है. बीते साल अप्रैल में सरकार ने ट्रंप के "बाय अमरीकन, हायर अमरीकन (Buy American, Hire American) नीति का एक आदेश जारी किया था. इसके बाद के वक्त में एच1बी वीज़े की दुनिया में काफ़ी कुछ बदला है.

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ट्रंप कर रहे हैं अपना वादा पूरा

ये अब ताबूत में एक और कील लगाने की तरह है- यानी इस वीज़ा कार्यक्रम पर लगाम कसने की एक और कोशिश.

मानव अधिकार कार्यकर्ता सरकार के इस क़दम के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं. वो ट्रंप प्रशासन की ऐसी नीति को उलटने की कोशिश में भागीदारों और नीति निर्माताओं को भी शामिल कर रहे हैं.

वॉशिंगटन डीसी में हिंदू अमेरिकन फ़ाउंडेशन में गवर्नमेंट रिलेशन्स के निदेशक जय कंसारा कहते हैं, "ये एक लाख से अधिक परिवारों के लिए एक झटका है जिनके पास एच-4 वीज़ा है और जो घर चलाने में मदद करते हैं. इसका सबसे बुरा असर महिलाओं पर होगा. एच1बी वीज़ा धारकों का एक बड़ा हिस्सा भारतीय समुदाय से जुड़ा है और इसलिए भारतीय परिवारों पर इसका असर विनाशकारी होगा."

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जय कंसारा कहते हैं, "यह देखते हुए कि अमरीका में इस तरह के अतिकुशल श्रेणी के कामगारों की कमी है, तकनीकी क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियों को ये कमी महसूस होगी और उनके लिए अतिकुशल आप्रवासियों और उनके परिवारों को आकर्षित करना और मुश्किल हो जाएगा. नतीजतन, इससे वैश्विक स्तर पर अमरीका की प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता पर असर पड़ेगा और ये निवेश और अतिकुशल आप्रवासियों के लिए अन्य देशों को आकर्षक ठिकाने बना देगी."

तो क्या अमरीका छोड़ना होगा?

एच-4 ईएडी ख़त्म कर दिए जाने से एच-4 वीज़ा धारक पति या पत्नी के 'क़ानूनी आप्रवासन स्थिति' में कोई बदलाव नहीं आएगा.

इसका मतलब है कि उन्हें अमरीका में काम करने के लिए ज़रूरी इजाज़त नहीं होगी.

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लेकिन इससे कई और चीज़ें बदल जाएंगी - जैसेकि उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति, घरेलू आय और महिलाओं पर मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक असर होगा और इसका सीधा प्रभाव उनके परिवारों पर पड़ेगा. भविष्य में क्या होगा- ये सवाल रात-रात भर रेणुका को सोने नहीं दे रहा.

वो कहती हैं, "अगर मेरा एच-4 ईएडी रद्द कर दिया गया तो मुझे चिंता है कि मैं आर्थिक रूप से स्वतंत्र उद्यमी की बजाय फिर से किसी पर आश्रित हो जाऊंगी. मैं शायद फिर से अवसादग्रस्त हो जाऊं. बीते कुछ सालों में मैंने अपने व्यवसाय में जो निवेश किया है और इसके लिए जो कड़ी मेहनत की है, समय दिया है - वो सब बर्बाद हो जाएगा."

"ग्रीन कार्ड आसानी से मिलना मुश्किल है इसीलिए मुझे नहीं पता कि कब फिर से काम कर पाऊंगी. फ़िलहाल जो स्थिति है उसके अनुसार हमें कम से कम 2023 तक स्थितियां नहीं बदलेंगी और हमें तब तक के लिए रुकना पड़ेगा. शायद उस वक्त तक फिर शून्य से काम शुरू करने की ऊर्जा और उत्साह मुझमें ना बचे. मैं खुद से यही पूछती हूं कि तब तक मैं क्या करूंगी?"

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