उस महिला की आपबीती, जिसने 300 लोगों को अपने सामने मौत की सजा पाते देखा

मौत की सजा

किसी अन्य अमरीकी राज्य की तुलना में टेक्सस में कहीं अधिक लोगों को मौत की सज़ा दी गई है और उनमें से सैकड़ों मौतों की गवाह रही हैं कर्मचारी मिशेल लायंस.

उनकी आंखों के सामने कई लोगों को मौत की सज़ा दी गई और इसका उन पर ग़हरा असर हुआ. उन्होंने अपनी उन भावनाओं को बीबीसी के बेन डिर्स के साथ साझा किया.

उन्होंने 12 सालों तक मौतों का सिलसिला देखा. पहले वो एक पत्रकार के तौर पर इसे देखती थीं, फिर बाद में वो टेक्सस के आपराधिक न्याय विभाग की प्रवक्ता बन गईं.

यह उनकी नौकरी थी कि वो मौत की हर सज़ा को होता हुआ देखें. साल 2000 से 2012 के बीच मिशेल ने करीब 300 लोगों को मरते हुए और कई हिंसक जिंदगियों को शांत होते देखा.

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Image caption हंट्सविल डेथ सेंटर

22 की उम्र में देखी पहली फांसी

किसी को फांसी पर चढ़ते हुए पहली बार उन्होंने तब देखा था जब वो 22 साल की थीं.

जेवियर क़्रुज़ को मरते हुए देखने के बाद उन्होंने अपने अख़बार में लिखा था- "मुझे इससे कोई दिक़्क़त नहीं थी. क्या मुझे उदास होना चाहिए था?"

वो सोचती थी कि उनकी सहानुभूति उन लोगों के साथ है, जिनके साथ अपराधी ने किसी न किसी तरह का अपराध किया है.

मिशेल कहती हैं, "फांसी की सज़ा को देखना मेरी ड्यूटी थी."

उन सभी यादों पर लिखी गई उनकी किताब 'डेथ रोः द फ़ाइनल मिनट्टस हाल ही में प्रकाशित हुई है.

वो लिखती हैं, "मैं मौत की सज़ा के पक्ष में थी. मैं सोचती थी कि इस तरह की सज़ा कुछ अपराधों के लिए सही है. क्योंकि मैं उस समय जवान थी और किसी से नहीं डरती थी. मैं हर स्थिति को ब्लैक एंड व्हाइट की तरह देखती थी."

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Image caption वह कमरा जहां मौत की सुई दी जाती है

मौत की सजा देने का तरीका बदला

साल 1924 से टेक्सस प्रांत में मौत की हर सज़ा एक छोटे से शहर हंट्सविल में दी जा रही है. यहां सात जेलें हैं, जिसमें से एक वॉल्स यूनिट भी है, एक विशाल विक्टोरियन इमारत, जहां मौत की सज़ा दी जाती है.

साल 1972 में सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सज़ा पर यह कह कर रोक लगा दी थी कि यह एक क्रूर तरीका है. लेकिन कुछ महीनों के भीतर ही कई राज्यों ने इसे दोबारा बहाल करने की मांग की.

टेक्सस में करीब दो साल बाद मौत की सज़ा को बहाल कर दिया गया, लेकिन मौत देने के तरीके बदल दिए गए. टेक्सस में जानलेवा सुई का इस्तेमाल किया जाने लगा.

1982 में चार्ली ब्रूक्स को ज़हरीले इंजेक्शन से मौत दी गई. चार्ली ब्रुक्स से सुई से मरने वाले पहले व्यक्ति थे.

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मौत के कमरे में क्या-क्या होता है?

मिशेल ने एक रिपोर्टर के तौर पर करीब 38 मौतें देखी. वो कहती हैं, "अब जब भी मैं अपने लेखों को देखती हूं, वो मुझे परेशान करते हैं. मेरे पास अगर कोई ग़लतफहमी थी, मैंने उसे एक सूटकेस में बंद करके मन के किसी कोने में फेंक दिया था. इसी कारण मैं यह सब देखते चली आई."

मिशेल आगे कहती हैं, "किसी की ज़िंदगी के अंतिम पलों को देखना और ये देखना कि कैसे उसकी आत्मा उसके शरीर को छोड़कर जाती है, कभी भी सामान्य बात नहीं हो सकती है. लेकिन टेक्सस जितनी तेज़ी से मौत की सज़ा दे रहा था, उससे यह सामान्य होता दिख रहा था."

इसका यह मतलब नहीं है कि मिशेल ने अपने काम को बहुत ही हल्के में लिया. जब वो साल 2001 में टेक्सस के आपराधिक न्याय विभाग से जुड़ीं, उनका काम और भी कष्टदायक हो गया.

इसके बाद से वो सिर्फ़ हंट्सविल के लोगों को ही नहीं बल्कि पूरे अमरीका और दुनिया को यह बताने लगी थीं कि मौत के कमरे में क्या-क्या होता है.

मिशेल उन पलों को याद करते हुए कहती हैं कि ऐसा लगता था कि दोषी हमेशा के लिए सोने जा रहा है और यह उनके परिवार के लिए सबसे दुख की बात होती थी.

मौत की सज़ा पाने वाले को एक इलेक्ट्रिक चेयर पर लिटा दिया जाता था और उन्हें सुई देकर हमेशा के लिए सुला दिया जाता था.

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कैसे-कैसे माफीनामें

खुद को निर्दोष बताने वाले उनके माफ़ीनामे, क्षमा पत्र और देश छोड़कर जाने की अपील को भी वो लोगों तक पहुंचाती थी. वो बताती हैं कि माफीनामे में बाइबिल की पंक्तियां, रॉक गानों की लाइनें भी लिखकर भेजी जाती थी.

जब भी क़ैदियों को सुई दी जाती थी, उनके फेफड़े काम करना बंद कर देते थे और वो क़ैदियों को मरते हुए उनकी अंतिम सांस, खांसी या हल्की आवाज़ सुनती थीं.

मिशेल को दुनियाभर से पत्र और ईमेल मिलते थे, जिसमें सज़ा को 'राज्य सरकार की प्रायोजित हत्या' बताया जाता था और उसमें उन्हें हिस्सेदार भी कहा जाता था.

कभी-कभी वो उन्हें पलटकर जवाब भी देती थी कि वो टेक्सस के मामलों में अपनी नाक न घुसेड़ें.

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बदलने लगी भावना

साल 2004 में जब मिशेल गर्भवती हुईं, उनकी सोच बदलने लगी और उनके अंदर की भावना जागने लगी.

"मौत की सज़ा एक भावनात्मक घटना बनने लगी जो मुझे अंदर से दुखी करने लगी. मैं चिंतित होने लगी कि मेरा बच्चा क़ैदियों के अंतिम शब्द सुन रहा है, उनकी क्षमा याचना, उनकी निर्दोष होने की गिड़गिड़ाहट और उनका रोना और सुबकना भी."

"जब मुझे बेटी हुई, यह सज़ा मुझे खूंखार लगने लगी. मेरी एक बच्ची थी और मैं उसके लिए कुछ भी कर सकती थी लेकिन सज़ा पाने वालों की मांएं अपने सामने अपने बच्चे को मरते देखती थीं."

"मैं उनकी मांओं को रोते सुन सकती थी, उन्हें शीशे की दीवार पर चिपकते देखती थी और दीवार पर हाथ पटकते देखती थी."

मिशेल ने अगले सात सालों तक वहां किया, फिर उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया. उस दिन उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि वो एक लंबे वक्त तक सज़ा काटने के बाद रिहा हुई हैं.

"मुझे लगा कि मैं वहां से निकलकर उन सभी चीज़ों के बारे में सोच पाऊंगी, जिसे मैंने कम जिया, पर ठीक इसके उलट हुआ. मैं हर वक्त उन मौतों के बारे में ही सोचते रहती थी."

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