सात साल में दुनिया में ऐसे बजेगा चीन का डंका

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Image caption चीन अपने तकनीकी विकास के लिए करोड़ो डॉलर का निवेश कर रहा है.

हाल ही में चीन ने दुनिया के सामने अपना देसी यात्री विमान पेश किया.

400 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली पहली बुलेट ट्रेन बनाकर भी वो ऐसा कर चुका है.

इसके अलावा चलती इलेक्ट्रिक कार को रिचार्ज कर देने वाले स्मार्ट रोड्स से लेकर रोबोट्स और सैटेलाइट तक चीन अपना जलवा दिखा चुका है.

चीन में एप्पल, जीएम, वोक्सवैगन और टोयोटा जैसी कंपनियां अपनी फैक्ट्रियां और रिसर्च सेंटर चला रही हैं.

दरअसर ये सब कुछ 'मेड इन चाइना 2025' योजना का हिस्सा है. इस योजना का मकसद चीन को उद्योग और तकनीक के क्षेत्र में ताक़तवर बनाना है.

चीन खुले तौर पर कह चुका है कि वो सस्ते जूते, कपड़े और खिलौने सप्लाई करने वाली अपनी छवि बदलना चाहता है.

वो चाहता है कि वो कम लागत श्रम वाले देश से इंजीनियरों वाल देश बन जाए.

साल 2025 तक मेड इन चाइना की योजना को लागू कर चीन दुनिया पर अपना दबदबा हासिल कर लेना चाहता है.

चीन की इस योजना को लेकर अमरीका की कुछ आपत्तियां हैं. राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का मानना है कि चीन 'तकनीक की चोरी' कर रहा है.

अमरीका इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और खुली प्रतियोगिता के लिए खतरा बताता है.

अमरीका और चीन के बीच ये विवाद की वजह बनता जा रहा है, जिससे दोनों देश 'ट्रेड वार' की तरफ बढ़ रहे हैं.

हाल ही में अमरीका और चीन ने एक दूसरे के यहां से आयात किए जाने वाले कुछ सामानों पर शुल्क बढ़ा दिए थे.

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Image caption व्हॉइट हाउस ने कहा कि चीन की रणनीति 'खौफनाक' है

राष्ट्रीय सुरक्षा?

अमरीका शी जिनपिंग की रणनीति से खासा चिंतित लग रहा है. अमरीका के 'सेक्रेटी ऑफ़ कॉमर्स' विलबुर रोस ने इस रणनीती को 'खौफ़नाक' करार दिया था.

उन्होंने कहा था, "वो दुनिया की फ़ैक्ट्री थे और अब वो दुनिया की तकनीक का केंद्र बनना चाहते हैं."

चीन अपनी महत्वकांक्षाओं को जायज़ ठहराता है और अमरीका की ओर से लगाए गए आरोपों को खारिज करता है.

चीन के वित्त मंत्री झू गुआंग्यो कहते हैं, "बात यहां राष्ट्रीय सुरक्षा की नहीं, बल्कि भेदभाव की है."

बीबीसी वर्ल्ड से बात करते हुए 'हाउ चीन बिकम अ कैपिटलिस्ट' के सह-लेखक और रोनाल्ड कोज़ इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ रिसर्चर निंग वांग का कहना है, "मेड इन चाइना 2025" योजना चीन और दूसरे देशों के लिए फायदेमंद साबित होगी.

वो आगे कहते हैं, "क्योंकि चीन ने दुनिया को सबसे ज्यादा यूनिवर्सिटी डॉक्टर्स दिए हैं, इसलिए और ज्यादा इनोवेशन करना उसका कर्तव्य है."

हालांकि निंग चेतावनी भी देते हैं कि ये रणनीति सरकारी कंपनियों पर ज्यादा केंद्रित होगी.

रिसर्चर कहते हैं, "इस योजना को कामयाब बनाने के लिए प्राइवेट कंपनियों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए."

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Image caption चीन अमरीका से टैरिफ वॉर को टालने के लिए बातचीत कर रहा है

'जीतने वाला सब कुछ हासिल कर लेता है'

बीजिंग ने इस रणनीति की घोषणा 2015 में की थी, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि ये बहुत पहले से चीन के दिमाग में थी.

चीनी तकनीक नीति के विशेषज्ञ डोग्लस फुलर कहते हैं, "इस कार्यक्रम के लिए काफी पैसा लगाया जा रहा है, साथ ही विदेशी कंपनियों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से तकनीक का हस्तांतरण करने का दबाव बनाया जा रहा है."

तकनीक का हस्तांतरण काफी अलग तरीकों से किया जाता है.

उदाहरण के लिए, चीन के मार्केट में घुसने के लिए किसी विदेशी कंपनी को स्थानीय कंपनी से गठजोड़ करना ही होता है.

इसके अलावा चीन अपनी रणनीति के तहत विदेशी कंपनियों को खरीदता भी है.

जैसे चीनी कंपनी गीलि, मर्सिडिज़-बेंज़ के स्वामित्व वाली कंपनी जर्मन कंपनी डैमलर में सबसे बड़ी शेयर होल्डर बन गई.

इसके अलावा चीन के कई सारे कायदे कानून, जो तकनीक की बड़ी कंपनियों को परमानेंट रहने के लिए बाध्य करते हैं.

उदाहरण के लिए एप्पल चीन में एक स्थानीय कंपनी के साथ अपना पहला डेटा स्टोरेज सेंटर खोलने जा रहा है, जिससे वो चीनी सरकार के नए नियमों का पालन करेगा.

इससे कंपनी से जुड़ी सारी अहम जानकारियां चीन को मिल जाएंगी. हालांकि फुलर इस योजना के कई जोखिमों पर भी बात करते हैं.

वो कहते हैं, "चीन अपनी इस योजना के लिए सरकारी कंपनियों को चुनेगा और ज्यादा से ज्यादा तकनीक खरीदने की कोशिश करेगा. लेकिन ये चीन के लिए इतना आसान नहीं होगा क्योंकि वाशिंगटन, ब्रसेल्स, टोक्यो, सियोल या ताइपेई जैसी जगहें ऐसा आसानी से नहीं करेंगी."

फुलर कहते हैं, "चीन सिर्फ अपना फायदा पहुंचाना चाहता है. वो दूसरे देश की सरकारों और संस्थानों के लिए ज्यादा फायदेमंद साबित नहीं होगा. इनोवेशन सेंटर्स हमेशा चीन के इरादों को लेकर चिंतित रहेंगे."

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Image caption चीन की कंपनियों को रणनीतिक क्षेत्रों में विकास करने के लिए सब्सिडी दी जा रही है.

'राष्ट्रीय चैंपियन'

बिजिंग में एक लॉ फर्म विल्मरहेल से जुड़े और यूएस-चीन चैंबर ऑफ़ कॉमर्स के सदस्य लेस्टर रॉस कहते हैं, "चीन की योजना कंपनियों को काम करने के लिए निष्पक्ष नियमों वाली ज़मीन मुहैया नहीं कराती."

बीबीसी से बातचीत में रॉस ने कहा, "चीन भारी सब्सिडी देकर मार्केट ख़राब कर रहा है. वो विदेशी कंपनियों पर तकनीक का हस्तांतरण करने का दबाव बना रही है."

'मेड इन चाइना' को रणनीतिक क्षेत्रों में घरेलू बाज़ार के 70 फीसदी हिस्से को 2025 तक अपने कब्ज़े में लेने के मकसद से डिज़ाइन किया गया है.

विशेषज्ञों की मानें तो इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए चीन को कई चुनौतियों का भी सामना करना होगा.

उसे अंतरराष्ट्रीय रुकावटों से निपटने के साथ साथ ये भी ध्यान रखना होगा कि उसके प्रतिद्वंद्वी कई साल पहले ही इस दौड़ में उतर चुके हैं.

इन सब बातों के बावजूद, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को अपनी योजना समय से कुछ पहले लागू करने के भी कई फायदे मिल सकते हैं.

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