तो फ़्लॉप हो सकता है ईरान के साथ डील ख़त्म करने का ट्रंप कार्ड?

  • 10 मई 2018
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Image caption ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने मंगलवार को एक ऐसी चाल चली जिससे वो वैश्विक कूटनीति की ज़मीन पर बिछी चौसर पर ईरान को घेर सकें.

ट्रंप ने अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में ईरान के साथ हुई परमाणु डील को रद्द कर दिया.

लेकिन ईरान न बाज़ी छोड़ने के इरादे में है और न ही चाल बदलने के. रूहानी ने कहा है कि वो बाकी सहयोगियों के साथ बातचीत के बाद आगे की राह तय करेंगे.

दो साल की माथापच्ची के बाद जुलाई 2015 में ईरान के साथ हुई डील पर अमरीका के अलावा ब्रिटेन, रूस, फ्रांस चीन और जर्मनी ने भी दस्तख़्त किए थे.

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क्या तय हुआ था डील में?

'ज्वाइंट कॉन्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन' यानी इस डील के तहत ईरान को अपनी परमाणु गतिविधियों को सीमित करना था और बदले में उस पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाने थे.

जुलाई 2015 में अमरीका के तब के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने दुनिया के सामने इसे बेस्ट डील के तौर पर पेश किया था.

तब व्हॉइट हाउस ने दलील दी थी कि ईरान के पास करीब 20 हज़ार सेंट्रीफ्यूज और यूरेनियम का पर्याप्त भंडार है जिससे दो महीने में आठ से दस बम बनाए जा सकते थे और समझौते के बाद इस प्रक्रिया में एक साल से ज़्यादा वक़्त लगेगा.

इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी यानी आईएईए की पुष्टि के बाद जनवरी 2016 में ईरान पर लगी आर्थिक पाबंदी हटा ली गई थी. लेकिन ट्रंप हमेशा से इस डील के ख़िलाफ़ थे.

उन्हें लगातार मनाने की कोशिश में रहे ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी अब भी डील में बने रहने की बात कर रहे हैं. रूस और चीन का भी यही रुख है.

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अमरीका के हटने का क्या असर?

लेकिन, अमरीका के हटने के बाद डील की कितनी अहमियत होगी?

अमरीका की डेलावेयर यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर मुक़्तदर ख़ान कहते हैं, "अगर यूरोप अपनी ताकत दिखाता है तो अमरीका की नीति फेल हो सकती है लेकिन बीते दशकों में यूरोप ने ऐसा कोई फ़ैसला नहीं किया जो अमरीकी हितों के ख़िलाफ़ हो."

वो कहते हैं, "अगर यूरोप डील से हटने का समर्थन नहीं करता तो ये प्रतिबंध सिर्फ़ अमरीकी कंपनियों पर होगा. तो एक तरह से अमरीकी कंपनियों के लिए ये अवसर गंवाने जैसा है. लेकिन जो व्यापार समर्थित रिपब्लिकन सीनेटर हैं वो कांग्रेस में ट्रंप की नीति को हरा सकते हैं. ये अगले 60 से 90 दिन में पता चलेगा कि अमरीकी कांग्रेस हस्तक्षेप करती है या नहीं. लेकिन ईरान के मामले में अपने ही राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ जाना बहुत मुश्किल है."

एक सवाल ये भी है कि क्या ट्रंप ने इस डील से बाहर होने का फ़ैसला सिर्फ इस वजह से किया है कि ईरान पर पाबंदियां सीमित वक़्त के लिए लगाई गई थीं और इसमें उनके मिसाइल कार्यक्रम पर रोक नहीं थी.

मुक्तदर ख़ान का मानना है, "अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां ही नहीं बल्कि ट्रंप के रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने भी तस्दीक की है कि ईरान शर्तों का पालन कर रहा है. ये भी साफ़ है कि ईरान के मिसाइल कार्यक्रम से अमरीका और यूरोप को कोई ख़तरा नहीं. दिक्कत इसराइल और सऊदी अरब को हो सकती है."

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ईरान की नीति

वाशिंगटन में नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर और लेखक हसन अब्बास भी मानते हैं कि ट्रंप की नीति ईरान के बजाए सऊदी अरब और इसराइल जैसे उन पुराने सहयोगियों की मदद करने की है जिनसे अमरीका के आर्थिक हित जुड़े हैं.

वो कहते हैं, "डील को ख़त्म करना सामने की बात है लेकिन इसके पीछे आर्थिक हित हैं. इसके पीछे ईरान और सऊदी अरब की जंग है. ईरान को आप ये नहीं कह सकते कि ईरान मासूम सादा बच्चा है जिसके साथ जुल्म हो रहा है. ईरान ने भी ऐसे फ़ैसले किए हैं जिनसे दिक्कतें बढ़ी हैं."

मुक्तदर ख़ान ट्रंप प्रशासन की नीति और इस फ़ैसले की पीछे की वजह पर कहते हैं, "ईरान मिडिल ईस्ट में काफी विस्तारवादी नीति अपनाता है. उनके प्रॉक्सी हिज्बुल्ला सीरिया में डोमिनेट कर रहे हैं. यमन में सऊदी अरब को नाको चने चबवा दिए. इराक़ में अमरीका ने दो ट्रिलियन डॉलर खर्च किया और इराक़ बन गया है ईरान का क्लाइंट. मेहनत और धन अमरीका खर्च कर रहा है और फायदा ईरान का हो रहा है. और ट्रंप समझते हैं कि अगर हम प्रतिबंध लगाते हैं तो ईरान की विदेश नीति पर भी इसका असर होगा."

लेकिन, विशेषज्ञों की राय है कि अमरीका के ताज़ा रुख के बाद भी ईरान अपनी नीति बदलने को तैयार नहीं होगा.

किंग्स कॉलेज लंदन के प्रोफेसर हर्ष पंत कहते हैं, "मिडिल ईस्ट में ईरान उभरती हुई शक्ति है और मुझे नहीं लगता कि वो पीछे हटने वाला है. आप सीरिया देखें, यमन देखें और अभी-अभी जो लेबनान में चुनाव हुए हैं उसमें जो ईरान समर्थित उम्मीदवार को जीत मिली है, उससे लगता है कि ईरान को सफलता मिलती जा रही है और वो चाहेगा कि ये आगे जारी रहे."

हालांकि, ईरान मध्य-पूर्व में कोई सीधी जंग छेड़े इसके आसार फिलहाल ज़्यादा नहीं है. एक तो हसन रूहानी घरेलू मोर्चे पर दबाव में हैं. दूसरी बात ये है कि आर्थिक हालात भी ईरान के साथ नहीं है.

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कितना ख़तरनाक है ईरान?

मुक्तदर ख़ान याद दिलाते हैं कि 18वीं शताब्दी में हुए नादिर शाह के बाद ईरान ने किसी मुल्क पर हमला नहीं किया. लेकिन ताक़त के ज़ोर से उसे दबाना भी आसान नहीं है.

मुक्तदर ख़ान कहते हैं, "अगर अमरीका हमला करेगा तो क्या परमाणु बम का इस्तेमाल करेगा. सारे परमाणु साइट्स पहाड़ों में हैं अमरीका ने अनुमान लगाया था कि पारंपरिक हथियारों के साथ अमरीका वायुसेना के विमानों को तीन हज़ार चक्कर लगाने होंगे उन साइट्स को मिटाने के लिए जिनके बारे में जानकारी है".

लेकिन आर्थिक मोर्चे पर ईरान की दिक्कतें बढ़ सकती हैं. अमरीका से व्यापारिक संबंध रखने वाली कंपनियां ईरान से दूरी बढ़ाएंगी.

हर्ष पंत की राय है कि ईरान के साथ रणनीतिक और आर्थिक रिश्ते बेहतर करने में जुटे भारत और चीन जैसे देशों पर भी दबाव बढ़ेगा.

वो कहते हैं, "जब डील थी तब भी ईरान ख़ास फायदे में नहीं था. ईरान जिस तरह की आर्थिक प्रगति की उम्मीद कर रहा था, वो नहीं हुई. मुझे लगता है कि जो आर्थिक हालात ईरान के लिए बनेंगे वो काफी मुश्किल भरे होंगे. तीसरे पक्ष के लिए ईरान में निवेश करने की संभावना नहीं है. वो समस्या अब और भी जटिल हो जाएगी."

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दुनिया की चिंता

डील से हटने का घोषणा करते हुए ट्रंप ने सऊदी अरब और इसराइल को गदगद कर दिया है. लेकिन क्या इससे अमरीका को कोई और फायदा होगा.

हर्ष पंत कहते हैं, "ट्रंप प्रशासन जिस तरह के फ़ैसले ले रहा है, वो हैरान करने वाले हैं. चाहे वो जलवायु परिवर्तन की बात हो, व्यापार की बात हो या फिर ये परमाणु डील हो. अमरीका के साथ दूसरे देश जो संबंध बनाते हैं वो ये उम्मीद रखते हैं कि चाहे सरकार बदल जाए लेकिन जो अंतरराष्ट्रीय डील की गई है उसे बरकरार रखा जाएगा. अब ट्रंप हर चीज को उखाड़ रहे हैं. ऐसे में कौन अमरीका के साथ बातचीत करना चाहेगा. हाल में तो उत्तर कोरिया पर इसका असर होगा."

ट्रंप ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित रखने के लिए कोई योजना भी सामने नहीं रखी है.

अगर ईरान दोबारा परमाणु हथियार बनाने की योजना शुरू करता है तो पूरे मध्य पूर्व में हथियारों की होड़ शुरू होने की आशंका है. डील डिसमिस होने के बाद पूरी दुनिया की सबसे बड़ी चिंता यही है.

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