'मोदी नॉट वेलकम' क्यों कह रहे हैं कुछ नेपाली?

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Image caption नेपाल की राजधानी काठमांडू से करीब 200 किलोमीटर दूर जनकपुर में एक मंदिर का दौरा करने पहुंचे भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेपाली प्रधानमंत्री के पी ओली

नेपाल के दौरे पर पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को जनकपुर में कहा कि भारत और नेपाल दो देश हैं, 'लेकिन हमारी मित्रता आज की नहीं त्रेता युग की है'.

मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली के साथ जनकपुर से अयोध्या के बीच सीधी बस सेवा की भी शुरुआत की.

मोदी की शुक्रवार से शुरू हुई नेपाल यात्रा पर लोग तीन नए रिकॉर्ड बनने की बात कर रहे हैं.

पहला कि कोई भारतीय प्रधानमंत्री अपने कार्यकाल में तीन बार नेपाल नहीं आया. दूसरा कि चार साल में तीन बार भारतीय प्रधानमंत्री नेपाल आए, और तीसरा कि नेपाल के प्रधानमंत्री की भारत यात्रा के 33 दिनों बाद भारतीय प्रधानमंत्री नेपाल आए.

साल 2014 में नरेंद्र मोदी की नेपाल यात्रा से संदेश गया था कि उच्च स्तर पर भी भारत की नेपाल में रुचि है लेकिन सितंबर 2015 में 'नाकाबंदी' के दौरान उभरे भारत विरोधी प्रदर्शनों ने संबंधों पर गहरी छाप छोड़ी.

ये 'नाकाबंदी' उस वक़्त हुई जब नेपाल अप्रैल 2015 के भीषण भूकंप से उबर भी नहीं पाया था.

नेपाल तेल और कई सामानों के लिए भारत पर आश्रित है. ये वो दौर था जब पेट्रोल, डीज़ल मिल नहीं रहा था या फिर चार या पांच गुना दाम पर मिल रहा था. खाने का सामान, दवाइयां, सभी की कमी हो गई थी. बच्चे, बूढ़े सड़कों पर निकलकर 'ब्लॉकेड' के विरोध में नारे लगा रहे थे.

भारत ने कहा नेपाल में सप्लाई में रुकावट के पीछे नेपाल के आंतरिक हालात थे. लेकिन नेपाल सरकार से लेकर दरबार स्क्वेयर पर रेहड़ी लगाने वाले लोग भारत को ज़िम्मेदार मानते हैं.

प्रधानमंत्री मोदी के दौरे को लेकर ट्विटर पर लोग 'ब्लॉकेड वाज़ क्राइम', 'मोदी नॉट वेलकम इन नेपाल', 'मोदी से सॉरी फ़ॉर ब्लॉकेड' हैशटैग के साथ ट्वीट कर रहे हैं.

भीम आत्रेय ने लिखा, ''छह महीने तक तेल, खाद्य सामान, दवाओं की कमी. दर्द अभी भी ताज़ा है मिस्टर मोदी.''

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Image caption साल 2015 की नाकेबंदी का नेपाल के बाज़ार पर व्यापक असर हुआ था

मोदी से नाराज़गी लेकिन भारत विरोधी नहीं

शैलेश पोखरेल ने ट्विटर पर लिखा, "हम आपका स्वागत नहीं कर रहे हैं इसका मतलब ये नहीं कि हम भारत विरोधी हैं."

काठमांडू के केंद्र में दरबार स्क्वेयर के नज़दीक धीमी आवाज़ में बात करने वाले हरिशंकर वैद्य मिले. आसपास भूकंप से तबाह इमारतों के पुनर्निर्माण का काम चीन और अमरीका की मदद से चल रहा था.

वैद्य ने बताया, "स्थिति के लिए नेपाल और भारत सरकार दोनों ज़िम्मेदार थे. हमने सोचा भारत जितनी सज़ा देगा हम सहेंगे. मोदी ने भूकंप के बाद एक ख़रब डॉलर देने की बात कही थी, लेकिन सिर्फ़ 25 पर्सेंट दिया है."

रोजिता श्रेष्ठ ने कहा, "अब मोदी आएं तो अच्छा करके जाएं. ऐसी समस्या दोबारा नहीं आनी चाहिए."

याद रहे सितंबर 2015 में मधेशी संगठनों ने आंदोलन चलाया और आरोप लगाया कि नए संविधान में उनके अधिकारों, आकाक्षाओं का ध्यान नहीं रखा गया. भारत ने नेपाल से सभी को साथ लेकर चलने की सलाह दी थी. नेपाल में माना जाता है कि भारत ने मधेशियों का पक्ष लेने के लिए और नेपाल को सज़ा देने के इरादे से सामान की सप्लाई रोक दी. भारत इन आरोपों से इनकार करता है.

नेपाल में भारत के राजदूत मंजीव सिंह पुरी ने बीबीसी से बातचीत में भविष्य की ओर देखने की बात कही लेकिन काठमांडू में लोग भारत के साथ संबंधों पर कुछ शब्द बोलने के बाद 'ब्लॉकेड' में भारत की भूमिका पर बात करने लगते हैं.

सितंबर 2015 में दीप कुमार उपाध्याय दिल्ली में नेपाल के राजदूत थे.

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Image caption नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली दोबारा देश की कमान संभालने के बाद पहले विदेशी दौरे पर भारत आए थे

भारत की वजह से चीन के करीब गया नेपाल

काठमांडू के प्रदूषण और राजनीतिक गर्मी से 300 किलोमीटर दूर भारतीय सीमा से लगे कपिलवस्तु में घर की छत के नीचे बैठे दीप कुमार उपाध्याय की शिकायत है कि सोशल मीडिया पर ऐक्टिव नरेंद्र मोदी ने कभी नेपाल के लोगों की परेशानियों पर एक लाइन भी नहीं लिखी.

वो कहते हैं उन्हें भारत सरकार की ओर से आश्वासनों के बावजूद ज़मीन पर कोई तबदीली नज़र नहीं आती थी.

वो कहते हैं, ''कई बार सुषमा जी ने मेरे सामने निर्देश दिए. (अजीत) डोभाल साहब भी निर्देश देते थे लेकिन समाधान होने में समय लगता था."

नेपाल के पूर्व वित्त मंत्री प्रकाश चंद्र लोहनी अपने आरामदेह घर में उन मुश्किल दिनों को याद किया, "हमारे घर में दो चार पेड़ थे उसे काटकर हमने तैयारी की थी कि दो चार महीने जितना चलेगा उसे काटकर ही बाहर खाना बनाएंगे पर जो हो रहा वो ठीक है. हमें झुकना नहीं चाहिए. दवाइयां महंगी हो गईं थीं. एंटीबायोटिक्स के दाम बढ़ गए थे. ब्लॉकेड का ग़रीबों पर सबसे ज़्यादा असर पड़ा था."

लोहनी कहते हैं इसी ग़ुस्से के कारण नेपाल का झुकाव चीन की तरफ़ बढ़ा क्योंकि "नेपाल में ये भावना बढ़ी कि सिर्फ़ भारत पर निर्भर नहीं रहा जा सकता."

वो कहते हैं, "भारत को लगा कि 10-15 दिन में नेपाल घुटने टेक देगा लेकिन ये बात ग़लत साबित हुई. इस कारण हमें चीन की ओर देखना पडा. चीन पिछले 10 सालों से ट्रांसिट ट्रीटी के लिए ज़ोर दे रहा था लेकिन हमने ऐसा नहीं किया. भारत ने हमें फ़ोर्स किया कि सिर्फ़ भारत पर निर्भर रहना ख़तरनाक है... दो तीन साल में चीन की ट्रेन नेपाल की सीमा तक पहुंच जाएगी."

'मोदी गुमराह हो गए'

ट्रांसिट ट्रीटी या समझौते के बाद नेपाल चीन से होकर दुनिया के अन्य देशों से व्यापार कर सकेगा. नेपाल हर तरफ़ से ज़मीन से घिरा है इसलिए समुद्री व्यापार के लिए उसे कोलकाता बंदरगाह पर निर्भर रहना पड़ता है.

लोहानी कहते हैं कि कोलकाता बंदरगाह में किसी भी गड़बड़ी का सीधा असर सामान की सप्लाई और व्यापार पर पड़ता है और भारत इसी निर्भरता का फ़ायदा उठाता रहा है.

याद रहे नेपाल का क़रीब 70 प्रतिशत व्यापार भारत से होता है.

हालांकि लोहनी के अलावा कई वरिष्ठ नेता ये भी कहते हैं, "नरेंद्र मोदी को अधिकारियों ने ग़लत जानकारियां दीं और वो गुमराह हो गए."

भारतीय मीडिया में कई बार नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को चीन का पक्षधर बताया जाता है.

इस पर वरिष्ठ पत्रकार युबराज घीमिरे मुस्कुराते हुए कहते हैं कि एक वक़्त ओली को उनकी पार्टी में भारत का पक्षधर बताया जाता था.

वो कहते हैं, "ओली की पार्टी भारत के साथ महाकाली प्रोजेक्ट समझौते के ख़िलाफ़ थी लेकिन ओली ने भारत का समर्थन किया था. पार्टी के भीतर उनकी छवि प्रो-इंडिया की थी. लेकिन जब उन्होंने 'नाकेबंदी' के दौरान नेपाल के आम सेंटिमेंट का साथ दिया तो भारत में उन्हें एंटी-इंडिया बताया जाने लगा."

Image caption चीन नेपाल में कई तरह के काम कर रहा है

हालांकि युबराज ये भी कहते हैं कि जब नेपाल के नेताओं को अपने फ़ायदे के लिए भारत की ज़रूरत पड़ती है तो वो उनका इस्तेमाल करने से भी नहीं चूकते.

साल 1996 के महाकाली समझौते का मुख्य हिस्सा पंचेश्वर प्रोजेक्ट था जिसका मक़सद था पानी की मदद से 6400 मेगावाट बिजली पैदा करना जिसका दोनो देश इस्तेमाल करें लेकिन दो दशक बाद भी काम काग़ज़ पर ज़्यादा ज़मीन पर कम हुआ.

दरअसल नेपाल में लोगों के पास भारत के अधूरे वायदों की एक पूरी सूची है.

महाकाली समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले पूर्व विदेश और वित्त मंत्री प्रकाश चंद्र लोहनी पूछते हैं, "जब भारत को महाकाली समझौते में रुचि नहीं थी तो आपने उस पर हस्ताक्षर क्यों किए? मधेस के लिए अतिआवश्यक पोस्टल हाईवे पर काम मुझे लगता है मेरे नाती पोतों के ज़माने में ही होगा."

पूरे नहीं होते वायदे

चीन ने काठमांडू में बने नेशनल आर्म्ड पुलिस फ़ोर्स अकादमी पर साल 2015 में काम शुरू किया और 2017 में इसे नेपाल के हवाले कर दिया. भारत ने भी ऐसी ही एक अकाडमी बनाने का वायदा था. बीस साल बाद भी ये एक वायदा ही है, हालांकि इस देरी के लिए स्थानीय कारणों को भी ज़िम्मेदार माना जाता है.

नेशनल आर्म्ड पुलिस फ़ोर्स अकादमी के एक वरिष्ठ अफ़सर ने बताया कि कैसे उन्होंने दो से ढाई साल तक चीन की कंपनी की ओर से 24 घंटे लगातार काम होते देखा और आज भी रखरखाव को लेकर कंपनी से उन्हें पूरा सहयोग मिलता है जबकि "भारत की पुलिस अकादमी का प्रोजेक्ट 25 सालों से लटका हुआ है."

भारत से ये शिकायत नई नहीं है. श्रीलंका, अफ़्रीका, आप कहीं भी जाएं, स्थानीय प्रशासन और सरकारें आपको बताएंगी कि भारत की तरफ़ से वायदे बहुत होते हैं लेकिन ज़मीन पर काम की रफ़्तार सुस्त रहती है.

सूत्र बताते हैं कि प्रधानमंत्री ओली ने अप्रैल की दिल्ली यात्रा में नई परियोजनाओं की घोषणा पर भारतीय नेताओं से कहा था कि वो पहले सालों से लटकी पड़ी पुरानी योजनाओं को पूरा करने पर ध्यान दें.

इन अधूरे वायदों पर नेपाल में भारत के राजदूत मंजीव सिंह पुरी कहते हैं, "नेपाल पुलिस अकादमी के कंसल्टेंट नियुक्त हो गए हैं और हम शीघ्र ही नेपाल को डिज़ाइन ऑप्शंस देने वाले हैं... प्रोजेक्ट्स आगे बढ़ रहे हैं... कुछ ही महीनों में जयनगर से जनकपुर तक ब्रॉड गेज रेलवे लाइन आ जाएगी... अरुण थ्री लगने से संदेश जाना चाहिए कि प्रोजेक्ट्स सिर्फ़ लिए नहीं गए बल्कि हक़ीक़त बन रहे हैं."

प्रधानमंत्री मोदी की नेपाल यात्रा के दौरान 900 मेगावाट प्रोजेक्ट 'अरुण थ्री' का शिलान्यास होगा.

नेपाली अधिकारी भूकंप के बाद एक अरब डॉलर की भारतीय मदद के वायदे के पूरा होने पर भी सवाल पूछते हैं.

मंजीव पुरी भरोसा दिलाते हैं कि हज़ारों घरों को बनाने का काम तेज़ी से चल रहा है और जल्द ही उसे देने का काम भी पूरा हो जाएगा.

उधर भारत में नेपाल के पूर्व राजदूत दीप कुमार उपाध्याय कहते हैं, "नेपाल में ये सोच है कि सब कुछ भारत कराता है, लेकिन दिल्ली में नेपाल के बारे में सोचने की किसे फ़ुरसत है. ये तो अच्छा है कि नेपाल मामले को मोदी जी ही देख रहे हैं."

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