क्या है इसराइल-फ़लस्तीन के बीच संघर्ष की जड़ में 'नकबा'?

  • 15 मई 2018
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कुछ के लिए ये जश्न का दिन है और कुछ के लिए विनाश का. ये इस बात पर तय होगा कि आप गज़ा पट्टी के किस ओर खड़े हैं.

इसराइल में 14 मई को राष्ट्रीय अवकाश होता है. 70 साल पहले इसी दिन एक नए राष्ट्र की स्थापना हुई थी.

लेकिन फ़लस्तीनियों की त्रासदी की शुरूआत भी उसी दिन से हो गई थी.

फ़लस्तीनी लोग इस घटना को 14 मई के बजाय 15 मई को याद करते हैं. वो इसे साल का सबसे दुखद दिन मानते हैं. 15 मई को वो 'नकबा' का नाम देते हैं. नकबा का अर्थ है 'विनाश'. ये वो दिन था जब उनसे उनकी ज़मीन छिन गई थी.

बीते बीस साल में 15 मई के दिन प्रदर्शन होते रहे हैं. इस साल भी हो रहे हैं. फ़र्क इतना है कि इस बार ये पहले से कहीं अधिक हिंसक हो सकते हैं क्योंकि सोमवार को यरूशलम में अमरीकी दूतावास खोले जाने का विरोध कर रहे 55 फ़लस्तीनी इसराइली सेना की गोलियों से मारे गए हैं.

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यरूशलम का पेंच

यरूशलम का स्टेट्स इसराइल और फ़लस्तीन के बीच हमेशा से ही विवाद और संघर्ष का मुद्दा रहा है क्योंकि इसराइल इसे अपना 'अविभाज्य राजधानी' मानता है और फ़लस्तीनी इसे अपने भविष्य के राष्ट्र का मुख्यालय बनाने की ख़्वाहिश रखते हैं.

मंगलवार को हज़ारों लोग कल मरने वालों के जनाज़े में शामिल होंगे. ये कल्पना करना मुश्किल नहीं कि लोग गुस्से से भरे होंगे. उनमें से कई बाड़ा तोड़ कर पूर्वी यरूशलम में घुसने की कोशिश कर सकते हैं क्योंकि वे उसे अपनी ज़मीन मानते हैं.

क्या है नकबा और इसे क्यों याद किया जाता है?

नकबा यानि विनाश के दिन की शुरुआत 1998 में फ़लस्तीनी क्षेत्र के तब के राष्ट्रपति यासिर अराफ़ात ने की थी. इस दिन फ़लस्तीन में लोग 14 मई 1948 के दिन इसराइल के गठन के बाद लाखों फलस्तीनियों के बेघर बार होने की घटना का दुख मनाते हैं.

इतिहासकार बेनी मॉरिस अपनी किताब 'द बर्थ ऑफ़ द रिवाइज़्ड पैलेस्टीनियन रिफ़्यूजी प्रॉब्लम' में लिखते हैं, " 14 मई 1948 के अगले दिन साढ़े सात लाख फ़लस्तीनी, इसराइली सेना के बढ़ते क़दमों की वजह से घरबार छोड़ कर भागे या भगाए गए थे. कइयों ने ख़ाली हाथ ही अपना घरबार छोड़ दिया था. कुछ घरों पर ताला लगाकर भाग निकले. यही चाबियां बाद में इस दिन के प्रतीक के रूप में सहेज कर रखी गईं."

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Image caption 15 मई 1948 को कई लोग अपने घरों में ताला लगाकर भागे थे. उन्हें वापस लौटने की उम्मीद थी.

इसराइल का रवैया

लेकिन इसराइल इस कहानी को नहीं मानता. उसका दावा है कि फ़लस्तीनी लोग उनकी वजह से नहीं बल्कि मिस्र, जॉर्डन, सीरिया और इराक़ के हमले की वजह से भागे थे क्योंकि इन देशों की सेनाएं यहूदी जीत को रोकना चाहती थीं.

जब ये संघर्ष ख़त्म हुआ तो इसराइल ने फ़लस्तीनियों को वापस नहीं लौटने दिया.

उसका तर्क था कि उन मकानों के मालिक ग़ैर हाज़िर हैं इसलिए उन्हें ज़ब्त करना वाजिब है.

इसके बाद संयुक्त राष्ट्र ने पड़ोसी देशों की सीमाओं पर कई रिफ़्यूजी कैंप खोल दिए. इनमें से कुछ पूर्वी यरूशलम में भी थे, लेकिन तभी से दोनों पक्षों के बीच तनाव और संघर्ष जारी है.

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फ़लस्तीनियों के लिए नकबा उसी दिन से शुरू हो गया था. लेकिन ये शब्द भी दोनों पक्षों के बीच संघर्ष का कारण रहा है. इसराइल ऐसे किसी 'विनाश के दिन' से इनकार करता है और वो इस शब्द को इसराइल के अस्तित्व को नकारने वाला बताता है.

बहरहाल हर साल 15 मई को फ़लस्तीनी इसराइल के साथ हुए संघर्षों को याद करते हैं और उनकी राय में नकबा 15 मई 1948 को ही ख़त्म नहीं हुआ था. वो तब से लेकर अब तक इसराइल के साथ तनावग्रस्त संबंधों को नकबा का हिस्सा मानते हैं.

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अन्य झड़पें

इसराइल के गठन और लाखों फ़लस्तीनियों के पलायन के बाद, फ़लस्तीनी राष्ट्रीय आंदोलन वेस्ट बैंक और गज़ा में एकजुट होने लगा.

साल 1956 में स्वेज़ नहर पर नियंत्रण को लेकर मिस्र और इसराइल एक बार फिर आमने-सामने थे. हालांकि ये मसला मैदाने जंग में नहीं बल्कि इसराइल, फ़्रांस और इंग्लैंड पर अंतरराष्ट्रीय दवाब से सुलझा.

साल 1967 में हुए छह दिन के युद्ध के दौरान यहूदियों और अरबों के बीच फिर संघर्ष छिड़ गया और उस साल पांच जून से लेकर 10 जून तक जो कुछ हुआ उसका असर कई स्तरों तक आज भी महसूस किया जा सकता है.

इस ऐतिहासिक युद्ध में इसराइल की जीत ने उसे बेहद मज़बूत स्थिति में पहुंचा दिया. इसराइल ने मिस्र से गज़ा पट्टी और सिनाई प्रायद्वीप, जॉर्डन से पूर्वी यरूशलम समेत वेस्ट बैंक और सीरिया से गोलन हाइट्स को अपने कब्ज़े में ले लिया.

एक बार फिर पांच लाख फ़लस्तीनी घरबार छोड़कर भागे.

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इसके बाद 1973 में योम किप्पुर युद्ध हुआ. इस जंग में मिस्र और सीरिया इसराइल से लोहा ले रहे थे. मिस्र ने सिनाई प्रायद्वीप को तो छुड़ा लिया, लेकिन गज़ा पट्टी को वापस हासिल नहीं कर पाया.

छह साल बाद मिस्र इसराइल के साथ शांति समझौता करने वाला पहला अरब देश बना. इसी राह पर बाद में जॉर्डन भी चला.

साल 1967 में हुई जंग से कुछ दिन पहले यासिर अराफ़ात ने लिबरेशन ऑफ़ पेलेस्टाइन ओर्गेनाइज़ेशन यानि पीएलओ का गठन किया. इस नए गुट में कई पुराने संगठन शामिल हुए.

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Image caption यासिर अराफ़ात ने पीएलओ का गठन किया था.

पीएलओ ने पहले जॉर्डन और फिर लेबनान से इसराइल के विरुद्ध ऑपरेशन शुरू कर दिए.

साल 1994 आते-आते गज़ा पट्टी एक बार फिर फ़लस्तीनियों के कब्ज़े में आ गई. लेकिन यहां 2008, 2009, 2012 और 2014 में कई ख़ूनी संघर्ष हुए.

ताज़ा हिंसा के दौर की जड़ें 70 साल पहले 14 मई को हुई घटनाओं से जुड़ी हैं. इसी वजह से आज और हिंसा का ख़तरा है.

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