ट्रंप-किम की मुलाकात में भारत का क्या रोल हो सकता है

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भारत ने बताया है कि उसने अपने एक मंत्री को दो दशक बाद उत्तर कोरिया भेजा है.

इससे पहली 1998 में आखिरी बार किसी भारतीय मंत्री ने उत्तर कोरिया का दौरा किया था. उस वक्त भी बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंध सरकार थी.

तत्कालिन सूचना और प्रसारण मंत्री मुख्तार अब्बास नक़वी प्योंगयांग में एक फिल्म महोत्सव में शिरकत करने पहुंचे थे.

इस बार भारत सरकार ने अपने विदेश राज्य मंत्री और पूर्व सेना प्रमुख वीके सिंह को उत्तर कोरिया भेजा है. उनके इस दौरे को काफी अहम माना जा रहा है.

वीके सिंह ने अपने इस दौरे के दौरान उत्तर कोरिया के कई वरिष्ठ मंत्रियों और अधिकारियों से मुलाकात की.

इस हफ्ते की शुरुआत में दो दिन चली वार्ताओं में दोनों देशों के बीच राजनीतिक, क्षेत्रीय, आर्थिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक सहयोग बढ़ाने को लेकर चर्चा हुई.

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ऐतिहासिक मुलाकात

ये दौरा ऐसे वक्त में हुआ है जब कुछ हफ्तों पहले ही उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच एक दशक से भी ज्यादा समय में पहला शिखर सम्मेलन हुआ.

अगले महीने उत्तर कोरिया और अमरीका के नेताओं के बीच पहली ऐतिहासिक मुलाकात होने की तैयरी चल रही है.

हालांकि किम जोंग उन और डोनल्ड ट्रंप के बीच 12 जून को होने वाली इस वार्ता पर आशंका के बादल भी मंडराने लगे हैं.

दरअसल उत्तर कोरिया के नेता ने कहा है कि अगर अमरीका उस पर परमाणु हथियार छोड़ने का दबाव बनाएगा तो वो ये मुलाकात रद्द कर देंगे.

तो ऐसे समय में भारत का उत्तर कोरिया के पास जाने का क्या कारण है?

क्या वो इस बात की तसल्ली कर लेना चाहता है कि अचानक हुए राजनयिक बदलावों के दौर में वो कहीं पीछे ना छूट जाए?

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भारत-उत्तर कोरिया संबंध

या वो अपने सहयोगी अमरीका का पक्षधर बनकर उत्तर कोरिया पुहंचा है?

कई लोगों को ये याद भी नहीं होगा कि उत्तर कोरिया और भारत के बीच 45 सालों तक अच्छे-खासे राजनयिक संबंध रहे हैं.

दिल्ली और प्योंगयांग में दोनों के छोटे दूतावास भी है.

दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान से जुड़े प्रोग्राम हुआ करते थे और दोनों ने विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में सहयोग को लेकर समझौतों पर हस्ताक्षर भी किए थे.

भारत में विदेशी राजनयिकों के लिए जो कोर्सेस चलाए गए उनमें भी उत्तर कोरिया के राजनयिकों ने भाग लिया था.

संयुक्त राष्ट्र के एक कार्यक्रम के तहत भारत उत्तर कोरिया में खाने की सप्लाई कर चुका है.

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उत्तर कोरिया के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर...

और जब 2004 में भारत में सुनामी आई थी तो उत्तर कोरिया ने 30,000 डॉलर की मदद की थी.

हालांकि इस बात को 20 साल हो गए जब भारत ने अपने किसी मंत्री को उत्तर कोरिया भेजा हो. वहीं उत्तर कोरिया के वरिष्ठ नेता सालों से भारत आते रहे हैं.

अप्रैल 2015 में उत्तर कोरिया के विदेश मंत्री भारत आए थे और अपने भारतीय समकक्ष से मिलकर मानवीय सहायता की मांग की थी.

वहीं 2016 में एक भारतीय मंत्री उत्तर कोरिया के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर उत्तर कोरिया के दूतावास गए थे.

शायद ये पहला मौका था जब उत्तर कोरिया के किसी आधिकारिक समारोह में भारत सरकार का कोई मंत्री शामिल हुआ था.

उस वक्त भारतीय मंत्री किरन रिजीजू ने कहा था कि व्यापार और वाणिज्य पर आधारित दोनों देशों के संबंधों लंबे चलेगें.

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उत्तर कोरिया का मिसाइल कार्यक्रम

2013 में चीन और दक्षिण कोरिया के बाद भारत उत्तर कोरिया का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार था.

भारत उत्तर कोरिया को मुख्य रूप से औद्योगिक रसायन, कच्चा तेल और कृषि उत्पाद निर्यात करता था.

जबकि उत्तर कोरिया भारत को सूखे और तले मेवे, नैचरल गम और आसाफोटिडा निर्यात करता था.

2014 में दोनों देशों के बीच होने वाला 200 मीलियन डॉलर से ज्यादा का व्यापार घटकर 130 मीलियन डॉलर रह गया.

लेकिन 2017 में उत्तर कोरिया के मिसाइल कार्यक्रम को लेकर जब संयुक्त राष्ट्र ने उत्तर कोरिया पर प्रतिबंध लगाए तो भारत ने उसके साथ होने वाले व्यापार पर लगभग पूरी तरह से रोक लगा दी.

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'पुराने संबंध'

पूर्वी एशिया में भारत के दखल पर नज़र रखने वाले प्रशांत कुमार सिंह ने बीबीसी को बताया, "भारत उन गिने-चुने देशों में से एक है जिसके साथ उत्तर कोरिया ने राजनयिक संबंध बनाए रखे. उत्तर कोरिया के लिए भारत दुनिया तक पहुंचने का अहम रास्ता है. दोनों देशों के बीच लंबे समय तक संबंध रहे हैं."

पिछले साल जब पूर्व अमरीकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने भारत को प्योंगयांग में अपनी राजनयिक मौजूदगी घटाने की सलाह दी तो भारत ने इसे मानने से इनकार कर दिया.

तब भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने टिलरसन को कहा था, "आपके कुछ मित्र देशों के दूतावास उत्तर कोरिया में बने रहने चाहिए ताकि बातचीत के कुछ रास्ते खुले रह सकें."

भारतीय सरकार ने बताया है कि उत्तर कोरिया ने वीके सिंह को कोरियाई प्रायद्वीप में हाल की घटनाओं की जानकारी दी.

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भारत का क्या रोल हो सकता है

साथ ही वीके सिंह ने भी कोरिया में शांति कायम करने की कोशिशों को भारत सहयोग होने की बात दोहराई है.

तो क्या वीके सिंह के दौरे का किम जोंग उन और डोनल्ड ट्रंप की आगामी मुलाकात से भी कोई लेना देना है?

इस सवाल के जवाब पर प्रशांत कुमार सिंह कहते हैं, "हम इस बात का सिर्फ अंदाज़ा ही लगा सकते हैं. ट्रंप कभी भी अपनी शिखर वार्ता को खतरे में नहीं डालना चाहेंगे. हो सकता है कि अमरीका के लोग इस शिखर वार्ता को रद्द होने से बचाने के लिए भारत का कुछ सहयोग चाहते हों."

भारत यहां एक छोटा प्लेयर ज़रूर है लेकिन कोरियाई प्रायद्वीप की समस्याओं में वो कोई पार्टी नहीं है. बल्कि उसके उत्तर कोरिया से अच्छे संबंध है.

जब एक अलग-थलग देश से बातचीत की बात आती है तो एक छोटा-मोटा दोस्त भी मदद कर सकता है.

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