किस करवट बैठेगा सऊदी और इसराइल का रोमांस?

  • 18 मई 2018
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गज़ा में पिछले दिनों इसराइली हमले में कम से कम 60 फ़लस्तीनी मारे गए, लेकिन इसे लेकर ज़्यादातर मुस्लिम देश ख़ामोश रहे. इन देशों में वो देश ज़्यादा हैं जो सऊदी अरब के मातहत हैं. कहा जा रहा है कि मध्य पूर्व के मुस्लिम देश शिया और सुन्नी की लाइन पर इस कदर बँट गए हैं कि इससे इसराइल की बल्ले-बल्ले हो गई है.

सऊदी अरब के बारे में कहा जा रहा है कि वो इसराइल की भाषा बोलने लगा है. इसराइल और सऊदी अरब दोनों क़तर के न्यूज़ चैनल अल-जज़ीरा को बंद करने की मांग कर रहे हैं. दोनों देशों के बारे में यह भी कहा जाता है कि इनके जंगी विमान बम बरसाने निकलते हैं तो जान लेना चाहिए कि कोई शिया देश ही निशाने पर आएगा.

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सऊदी अरब और इसराइल का इश्क

सऊदी अमीज़ादों के बारे में यह भी कहा जाता है कि वो बीमार पड़ते हैं तो अपने निजी जेट से सीधे तेल अवीव के बेहतरीन अस्पतालों में इलाज कराने पहुंचते हैं. सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान मानते हैं कि मध्य-पूर्व के लिए ईरान सबसे बड़ा ख़तरा है और इसराइल भी ऐसा ही मानता है.

हालांकि मध्य-पूर्व मामलों के जानकार क़मर आग़ा कहते हैं, ''सऊदी अरब को लगता है कि मध्य-पूर्व में ईरान कमज़ोर होगा तो उसका वर्चस्व बढ़ेगा पर सच तो यह है कि अमरीका और इसराइल का वर्चस्व बढ़ेगा. ईरान का मज़बूत होना मध्य-पूर्व के हक़ में है.''

फ़लस्तीनी आबादी सुन्नी है. दुनिया भर के कई ताक़तवर इस्लामिक देश सुन्नियों के हैं. ऐसे में इसराइली हमले में फ़लस्तीनी मारे जाते हैं तो ये देश ख़ामोश क्यों रहते हैं? यहां तक कि मध्य-पूर्व में शिया देश ईरान, इसराइल से मोर्चा ले रहा है पर सुन्नी देश सऊदी इसराइल के साथ है. आख़िर ऐसा क्यों है?

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सऊदी और ईरान का टशन

क़मर आगा कहते हैं, ''जो भी इस्लामिक देश हैं, उन्होंने फ़लस्तीन के लिए कभी ज़ोर से आवाज़ नहीं उठाई. ये मौक़े-मौक़े पर प्रस्ताव ज़रूर पास कर देते थे. यहां तक कि इस्लामिक धार्मिक कट्टरपंथियों ने भी कभी फ़लस्तीनियों का साथ नहीं दिया. फ़लस्तीन में जब इस्लामिक आंदोलन शुरू हुआ तो सऊदी समेत खाड़ी के कई देशों को रास नहीं आया. शिया देश ईरान की इस इलाक़े में अपनी महत्वाकांक्षा है और फ़लस्तीन में इस्लामिक आंदोलन से उसके अच्छे ताल्लुकात रहे हैं. ईरान मध्य-पूर्व में एक ताक़त के तौर पर उभर भी गया है. अब फ़लस्तीनियों का संघर्ष सऊदी और ईरान की लड़ाई में दब सा गया है.''

क़मर आग़ा कहते हैं कि पूरे इलाक़े में शिया और सुन्नी की प्रतिस्पर्धा चरम पर है. आग़ा मानते हैं कि इराक़ में शिया सरकार का होना सुन्नी देशों को रास नहीं आ रहा है. सऊदी को लगता है कि इराक़ में शिया सरकार रही तो ईरान का प्रभाव बढ़ेगा और ऐसा हुआ भी है. सद्दाम हुसैन के जाने के बाद ईरान का प्रभाव बढ़ा है.

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क़मर आग़ा कहते हैं, ''इस्लामिक देशों में शक्ति का संतुलन ईरान की तरफ़ शिफ़्ट हुआ है. ज़ाहिर है ईरान के ताक़तवर होने का मतलब इलाक़े में शियाओं का सुन्नियों पर भारी पड़ने के रूप में देखा जाएगा. सीरिया, इराक़, ईरान, यमन और लेबनान में बड़ी संख्या में शिया आबादी है और उन्हें दमन का सामना करना पड़ा है. ये पहली दफ़ा है जब शिया ख़ुद को मज़बूत स्थिति में पा रहे हैं. इसमें किसी को शक नहीं होना चाहिए कि शिया और सुन्नियों की लड़ाई में अगर किसी को फ़ायदा हो रहा है तो वो इसराइल है.''

'मुफ़्त में दूध'

इसराइल से सऊदी अरब के रिश्तों के बारे में कहा जाता है कि अगर आपको मुफ़्त में दूध मिल रहा है तो गाय पालने की क्या ज़रूरत है? मतलब यह कि जो ईरान के लिए बुरा है वो इसराइल के लिए अच्छा होगा.

ज़ाहिर है सऊदी अरब और ईरान एक दूसरे को फूटी आंखों नहीं सुहाते हैं. यही स्थिति इसराइल और ईरान की है. ऐसे में दुश्मन एक होने के कारण इसराइल और ईरान को तमाम विपरीत हालात के बावजूद क़रीब आने में बहुत मेहनत नहीं करनी पड़ी.

द यरूशलम पोस्ट ने इसी साल जनवरी महीने में अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि ईरान के ख़िलाफ़ लड़ाई में दुश्मन एक होने के दम पर सऊदी को इसराइल से सैन्य मदद आसानी से मिलती है.

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इसराइल और सऊदी की दोस्ती का रंग तब और गहरा हुआ जब 32 साल के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान 81 साल के अपने पिता किंग सलमान पर भारी पड़ते गए. इसके साथ ही अमरीका में डोनल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद इसराइल और सऊदी ईरान के ख़िलाफ़ आक्रामक रूप से गोलबंद हुए.

राष्ट्रपति ओबामा ने अपने शासनकाल में ईरान के साथ जो परमाणु समझौता किया था, उसे तोड़ने की मांग इसराइल-सऊदी अरब ज़ोर-शोर से करने लगे. राष्ट्रपति ट्रंप ने भी इसका खुलकर समर्थन किया.

सऊदी के साथ क्राउन प्रिंस सलमान

हालांकि दोनों देशों में संबंधों की सीमा पर कुछ वाजिब सवाल भी हैं. जब तक सऊदी अरब, इसराइल को औपचारिक रूप से मान्यता नहीं देता है, तब तक दोनों देशों के संबंधों में व्यापक संभावना की उम्मीद धुंधली ही रहेगी.

कई जानकारों को लगता है कि सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने इसी साल अमरीकी पत्रिका द अटलांटिक को दिए इंटरव्यू में संकेत दे दिया है कि आने वाले वक़्त में वो इसराइल को औपचारिक मान्यता भी दे सकते हैं.

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इस इंटरव्यू में मोहम्मद बिन सलमान ने कहा था कि यहूदियों को अपने पुरखों की ज़मीन पर एक राष्ट्र-राज्य के रूप में रहने का हक़ है.

इंटरव्यू में मोहम्मद बिन सलमान ने कहा था, ''हमारे मुल्क को यहूदियों से कोई समस्या नहीं है. हमारे पैग़म्बर मोहम्मद ने एक यहूदी महिला से शादी की थी. वो महिला न केवल उनकी दोस्त थी, बल्कि पत्नी भी थी. हमारे पैग़म्बर के पड़ोसी भी यहूदी ही थे. सऊदी अरब में अमरीका और यूरोप से बड़ी संख्या में यहूदी आए हैं. ईसाई, मुस्लिम और यहूदियों के बीच कोई समस्या नहीं है.''

मोहम्मद बिन सलमान के इस इंटरव्यू की काफ़ी आलोचना हुई कि उन्होंने फ़लस्तीनियों के संघर्ष की उपेक्षा करते हुए इसराइल को मान्यता दी है. इसराइल और सऊदी अरब के बीच कोई आधिकारिक और राजनयिक संबंध नहीं है.

द टाइम्स ऑफ इसराइल ने इसी साल दो अप्रैल को अपनी एक रिपोर्ट में लिखा था कि हाल के वर्षों में इसराइल और सऊदी अरब ने ईरान से मुक़ाबला करने के लिए गोपनीय रूप से साथ आने के संकेत दिए हैं. इसी रिपोर्ट के अनुसार 2016 में सऊदी जनरल इसराइल के दौरे पर गए थे और उन्होंने इसराइली नेताओं से मुलाक़ात की थी. इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि सऊदी ने मार्च महीने से एयर इंडिया की उड़ानों को अपने हवाई क्षेत्र से तेलअवीव जाने की इजाज़त दी.

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ईरान के कारण इसराइल का साथ?

द अटलांटिक ने सलमान से इंटरव्यू में पूछा था कि क्या इसराइल के साथ सऊदी की दोस्ती ईरान के कारण है? इस सवाल पर सलमान ने जवाब दिया था, ''इसराइल की अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है और आकार में भी वो हमसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. ज़ाहिर है हम दोनों के साझे हित हैं. अगर इलाक़े में शांति रहती है तो इसराइल और गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल के देशों के बीच सहयोग बढ़ेगा.''

इसराइल में इस्टीट्यूट फॉर नेशनल सिक्योरिटीज़ स्टडीज़ में मध्य-पूर्व मामलों के जानकार एरी हेइस्टेइन ने यरूशलम पोस्ट में 20 जनवरी 2018 को अपनी रिसर्च रिपोर्ट में कहा था, ''मोहम्मद बिन सलमान अपने हितों को लेकर जैसा सोचते हैं वो विशेषज्ञों की लाइन से बिल्कुल अलग है. वो यमन में सैन्य अभियान चला रहे हैं. क़तर में नाकाबंदी कर दी है और लेबनान के प्रधानमंत्री को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया. इनमें से कोई भी क़दम उनके हितों को साधने में कामयाब नहीं रहा. सवाल यह है क्या ये ग़लतियां उनके अनुभवहीनता का परिणाम है? वो एक बेसब्र सुल्तान हैं जो बिना परिणामों का आकलन किए फ़ैसले लेने को आतुर रहते हैं.''

क़मर आगा भी मानते हैं कि मोहम्मद बिन सलमान ने अपने फ़ैसलों से अनुभवहीनता और अपरिपक्वता का परिचय दिया है. आग़ा कहते हैं, ''ईरान सऊदी से बहुत आगे निकल चुका है. वो चाहे सैन्य शक्ति की बात हो या बौद्धिक क्षमता के मामले में. ईरान ने ज़बर्दस्त अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद इतना कुछ किया है. अब सऊदी या इसराइल के लिए इतना आसान नहीं है कि वो ईरान को पीछे धकेल दें. ईरान के पास गैस और तेल के बड़े भंडार हैं और इसके साथ ही अन्य खनिज पदार्थ भी हैं. ईरान के पास मुकम्मल परमाणु कार्यक्रम है और साथ ही अंतरिक्ष प्रोग्राम भी है.''

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ईरान की तुलना में सऊदी अर्थव्यवस्था की सेहत ठीक नहीं है. इसके लिए वहां के शासक के ग़लत फ़ैसलों की भी बड़ी भूमिका रही है. क़मर आग़ा कहते हैं, ''सऊदी कई ऐसी लड़ाइयां लड़ रहा है जो ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहीं. यमन में सऊदी का रोज़ का खर्च 10 करोड़ डॉलर का है. सऊदी अरब के कई ऐसे प्रोजेक्ट हैं जिन्हें अरबों डॉलर की ज़रूरत है. इसके साथ ही सऊदी ने अरबों डॉलर के असलहे ख़रीदे हैं जिन्हें उनके सैनिक चलाना तक नहीं जानते. सऊदी की सेना काफ़ी कमज़ोर है और वो एक पुलिस बल से ज़्यादा नहीं है. सऊदी अपनी सुरक्षा के लिए पश्चिमी देशों और पाकिस्तान पर निर्भर रहता है. यमन से लड़ने के लिए भी सऊदी को 30 देशों का सैन्य गठबंधन बनाना पड़ा है.''

दुनिया भर के इस्लामिक देशों में पाकिस्तान एक ऐसा देश है जिसके पास परमाणु शक्ति है. फ़लस्तीनियों को लेकर पाकिस्तान भी चुप रहता है. आख़िर पाकिस्तान के साथ ऐसी क्या मज़बूरी है? सऊदी अरब में भारत के राजदूत रहे तलमीज़ अहमद कहते हैं ''पाकिस्तान ने फ़लस्तीन का कभी साथ नहीं दिया. पाकिस्तान के भीतर जो कट्टर धार्मिक संस्थाएं हैं उन्होंने भी फ़लस्तीन के मुद्दे को उस तरह से नहीं उठाया. भारत में भी यासिर अराफ़ात आए थे तो सिमी ने विरोध किया था.'' तलमीज़ अहमद मानते हैं सऊदी और इसराइल का रोमांस मध्य-पूर्व के हक़ में नहीं है.

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