प्रशांत महासागर के 'रणक्षेत्र' में अमरीका को चीन की चुनौती

प्रशांत महासागर, चीन, अमरीका

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एक समंदर है जो अमरीका और चीन को एक दूसरे से अलग करता है और अब दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर विवाद बढ़ता हुआ दिख रहा है.

दूसरे विश्व युद्ध के बाद से ही प्रशांत महासागर समेत दुनिया के दूसरे महासागर अमरीकी नौसेना के रडार पर रहे हैं.

रूस और भारत जैसे दुनिया की दूसरी बड़ी नौसैनिक ताक़तें क्षमता के लिहाज से कभी भी अमरीकी नौसेना को पार कर नहीं पाई हैं.

लेकिन बीते कुछ सालों से अमरीकी नौसेना विशेषज्ञ एक नए ख़तरे की आहट महसूस कर रहे हैं और वो ख़तरा है ताक़तवर नौसेना वाला चीन.

अमरीका के सिक्स्थ फ़्लीट के पूर्व इंटेलीजेंस डायरेक्टर जेम्स फ़ैनल ने मई में कांग्रेस को 64 पन्नों की एक रिपोर्ट सौंपी थी.

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युद्धपोत 001A तक चीन के पास केवल एक युद्धपोत था, इसे सोवियत संघ ने 1985 में बनाया था और चीन ने 1998 में इसे यूक्रेन से खरीदा था

चीन की नौसैनिक ताक़त

रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन अमरीका से दोगुनी ताक़तवर नौसेना खड़ी करने की कोशिश कर रहा है.

लिले गोल्डस्टीन यूएस नैवल कॉलेज में इस्टीट्यूट ऑफ़ चाइना मैरिटाइम स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर हैं.

वे बताते हैं, "चीन की नौसेना अपनी क्षमता के विकास और विस्तार की योजनाओं पर तेजी से काम कर रही है और इसे लेकर अमरीका में चिंताएं बढ़ रही हैं."

"हाल के समय में हमने देखा है कि चीन ने अपना एक युद्धपोत विकसित किया है. ये उन्होंने अपने बूते तैयार किया है."

"अब वे तीसरे देश के लिए भी युद्धपोत तैयार करने के सौदे पर बात कर रहे हैं. इसमें परमाणु क्षमता भी होगी."

"ये भले ही चीन के लिए गर्व की बात है लेकिन अमरीका की चिंताएं बढ़ना लाजिम है."

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चीन के युद्धपोत लिआओनिंग पर तैनात J15 लड़ाकू विमान

अमरीका ने वापस लिया न्योता

अप्रैल के आख़िर में नए युद्धपोत को लॉन्च करके चीन ने दुनिया को अपनी नौसैनिक ताक़त का एहसास करा दिया है.

  • मई में चीन ने क्लास 055 कैटगिरी का अपना दूसरा विध्वंसक जहाज समंदर में उतारा. एशिया में अपनी तरह का ये सबसे आधुनिक और ताक़तवर जहाज है.
  • विवादास्पद साउथ चाइना सी में चीन के युद्धक जहाज और लड़ाकू विमान उसकी सैनिक ताकत का एहसास कराते रहे हैं.
  • साउथ चाइना सी वो इलाका है जिस पर चीन के दखल का अमरीका और क्षेत्र के दूसरे देश विरोध करते रहे हैं.
  • चीनी नौसेना ने इस इलाके में कई बार परमाणु क्षमता वाले H-6K बमवर्षक विमान भेजे हैं.

मरीन कॉर्प्स यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर क्रिस्टोफ़र युंग इन तथ्यों का जिक्र करते हुए कहते हैं, "ये वो बाते हैं जिनका निश्चित तौर पर एक सैनिक संदेश है."

"यही वजह है कि इन गर्मियों में होने वाले दुनिया के सबसे बड़े नौसैनिक युद्धाभ्यास के लिए चीन को दिया न्योता अमरीका ने वापस ले लिया है."

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चीन ने अमरीकी नौसेना के साथ अपने तकनीकी फ़ासले कम किए हैं

एक अपराजेय नौसेना

लेकिन वाशिंगटन में ख़तरे की पहले ही बज चुकी है. ब्रायन मैक्ग्राथ अमरीका के हडसन इंस्टीट्यूट के यूनाइटेड स्टेट्स नैवल पावर सेंटर में रिसर्चर हैं.

ब्रायन का कहना है कि चीनी नौसेना दशकों से इस रेस में पीछे चल रही थी लेकिन हाल के समय में उसने जबर्दस्त तरक्की दिखलाई है.

राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सेना से अपनी प्राथमिकताएं तय करने के लिए कहा है. वे अपनी फौज में तीन लाख सैनिकों की कटौती करने जा रहे हैं.

इसके बदले चीन की योजना टेक्नॉलॉजी और मॉडर्नाइजेशन पर ज़्यादा जोर देने की है. उनका फ़ोकस नौसेना, वायुसेना और मिसाइल क्षमता के विकास की है.

कांग्रेस में रखी गई जेम्स फ़ैनल की रिपोर्ट ये कहती है कि चीन की नौसेना पहले ही कुछ मामलों में अमरीकी नौसेना को पीछे छोड़ चुकी है.

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फिलिपींस के सैनिक अमरीकी सैनिकों के साथ साउथ चाइना सी में युद्धाभ्यास करते हुए

चीन और अमरीका का फासला

जेम्स फ़ैनल की रिपोर्ट के मुताबिक़ चीन ने 330 युद्धपोत और 66 पनडुब्बियों की तैनाती कर रखी है. दोनों मिलाकर कुल संख्या 396 होती है.

अमरीका ने इस समय 211 युद्धपोत और 72 पनडुब्बियां तैनात कर रखी हैं जिनकी कुल संख्या चीन से 113 कम हैं.

फ़ैनल की रिपोर्ट ये बताती है कि साल 2030 तक चीन के बेड़े में 450 युद्धपोत और 99 पनडुब्बियां और अमरीका के पास 355 युद्धपोत हो जाएंगे.

फ़ैनल ने इस बात की भी फिक्र जताई है कि अमरीकी अपनी नौसैनिक क्षमता बढ़ाने के लिए ज़रूरी निवेश कर पाएगा या नहीं.

सिक्स्थ फ़्लीट में जासूसी विभाग के निदेशक रह चुके इस अधिकारी ने कहा कि इस समय अमरीका की नेवी और एयरफ़ोर्स चीन से तकनीकी तौर पर बेहतर है लेकिन चीन तेज़ी से ये गैप भर रहा है.

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सागर में शक्ति संघर्ष

एशिया-पैसेफ़िक इलाक़े में...

जेम्स फ़ैनल ने कहा,"चीन के बहरी जहाज़ों की क्वॉलिटी पहले ही एशिया-पैसेफ़िक इलाक़े में एक ख़तरा बन चुकी है."

बहरहाल, प्रोफ़ेसर यंग ये नहीं मानते कि इस समय चीन दुनिया की सबसे बड़ी ताकत की सैन्य शक्ति के आस-पास भी है.

प्रोफ़ेसर यंग कहते हैं, "ऐसे विषयों की विवेचना सेना के साज़ो-सामान की संख्या के आधार पर होनी चाहिए.

मुझे लगता है इस मामले मे चीन को अमरीका के बराबर पहुंचने में कम से कम दो दशक लगेंगे.

गोल्डस्टीन कहते हैं कि अमरीका के पास 11 बड़े परमाणु हथियारों से लेस एयरक्राफ़्ट कैरियर हैं और चीन के पास सिर्फ़. और वो भी काफ़ी छोटे और बिना परमाणु हथियारों के.

वो कहते हैं,"वो पनडुब्बी सेना का विकास करने में जुटे हैं लेकिन हम उनसे काफ़ी बेहतर हैं और हमारे पास अनुभव भी है."

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अमरीका और चीन आमने-सामने

खुला समुद्र है साउथ चाइना सी

शोधकर्ता ब्रायन मैकग्राथ के मुताबिक हाल के वर्षों में चीन की नौसैनिक शक्ति के विकास ने इलाके की ताक़त का संतुलन प्रभावित किया है.

गोल्डस्टीन कहते हैं कि कई मायनों में साउथ चाइना सी में इस समय चीन की नैसेना का पलड़ा भारी है.

"ये सारा इलाक़ा भौगोलिक तौर पर चीन के करीब है इसलिए ज़ाहिर है चीन वहां मज़बूत है. लेकिन खुले समुद्र में अमरीकी नौसेना अब बहुत आगे है. "

यंग के मुताबिक ये जानना अधिक ज़रूरी है कि चीन क्या सिर्फ़ साउथ चाइना सी में अपनी श्रेष्ठता साबित करना चाहता है या वो एक ग्लोबल नेवल पॉवर पर अमरीका की आंख में आंख मिलाना चाहता है.

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'ताइवानी राष्ट्रपति से बात करना अमरीका के लिए अप्रत्याशित'

सबसे बड़ा मुल्क़

स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम स्थित इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीच्यूट के मुताबिक साल 2017 में अमरीका दुनिया में मिलिट्री पर ख़र्च करने वाला सबसे बड़ा मुल्क़ है.

लेकिन चीन ने उसी वर्ष अपने सैन्य ख़र्चे में सर्वाधिक बढ़ोतरी की है.

मैकग्राथ का कहना है कि इसी वजह से आने वाले दशकों में चीन इस इलाके की एक बड़ी सैन्य ताक़त बनने की राह पर है. और वो एशिया-पैसेफ़िक क्षेत्र में कुछ दशकों के भीतर चुनौती दे सकता है.

उनके मुताबिक, "मुझे लगता है कि आने वाले 15 साल में अमरीकी नेवी दुनिया की सबसे ताक़तवर फ़ोर्स नहीं रहेगी. क्योंकि नेवी को मौजूदा हालात में बनाए रखने के लिए जो ख़र्चे किए जाने चाहिए, भविष्य में उनके लिए समर्थन मिलना मुश्किल होगा."

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