डोनल्ड ट्रंप और किम जोंग-उन के लिए शीत युद्ध के तीन सबक

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अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता किम जोंग-उन के बीच सिंगापुर में एक ऐतिहासिक मुलाक़ात होने जा रही है.

पूरी दुनिया में इस मुलाक़ात को लेकर काफी उम्मीदें हैं. ऐसे में कुछ राजनीतिक विश्लेषक शीत युद्ध के दिनों में हुई ऐसी ही ऐतिहासिक मुलाकातों को याद कर रहे हैं.

इनमें से कुछ कूटनीति की दृष्टि से सफल हुईं तो कुछ बैठकें बुरी तरह असफल साबित हुईं.

इन मुलाक़ातों में अमरीकी राष्ट्रपतियों की सोवियत संघ के नेताओं और चीनी नेताओं से हुई मुलाक़ातें शामिल हैं.

लेकिन ध्यान देने की बात ये है कि ट्रंप पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जॉन एफ़ केनेडी और रोनाल्ड रीगन जैसे नहीं हैं.

इसके साथ ही किम जोंग-उन भी सोवियत संघ के अनुभवी नेता मिख़ाइल गोर्बाचोफ़ और चीनी नेता माओ जैसे नहीं है.

लेकिन विश्लेषकों के मुताबिक़, इतिहास के उस संवेदनशील दौर में इन नेताओं ने जो समझौते कायम रखे, उस तरह की कुछ स्थितियां आज भी मौजूद हैं.

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Image caption पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जॉन एफ़ केनेडी (दाएं) के साथ सोवियत संघ के नेता निकिता ख्रुश्चेव (बाएं)

1. बड़ा मक़सद बनाम मामूली एजेंडा

विघटित हो चुके सोवियत संघ के विदेश मंत्रालय में काम कर चुके निकोलाइ सोकोव कहते हैं, "अगर इतिहास में ऐसी किसी बैठक की बात करें तो साल 1961 में अमरीकी प्रेसीडेंट जॉन एफ केनेडी और सोवियत संघ के नेता निकिता ख्रुश्चेव के बीच ऐसी ही बैठक हुई थी."

सोकोव उन लोगों में शामिल रहे हैं जिन्होंने अमरीका और सोवियत संघ के बीच परमाणु हथियारों को लेकर बातचीत पर काम किया था.

दोनों देशों के सर्वोच्च नेताओं के बीच विएना में हुई इस बैठक को कई इतिहासकार एक असफल मुलाक़ात के रूप में देखते हैं.

नौजवान जॉन एफ़ केनेडी अमरीका के राष्ट्रपति बनने के चार महीने बाद ही बिना तैयारी और अड़ियल रुख़ के साथ ख्रुश्चेव से मिले. लेकिन आख़िर में 67 साल के अनुभवी नेता ख्रुश्चेव युवा राष्ट्रपति केनेडी पर भारी पड़ गए.

अमरीकी विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी याद करते हुए बताते हैं कि इस बैठक में दोनों महाशक्तियों के बीच तनाव इस हद तक बढ़ गया कि सोवियत नेता ने धमकी दी, "अगर अमरीका जर्मनी के लिए युद्ध शुरू करना चाहता है तो यही सही."

जॉन एफ़ केनेडी ने 'द न्यू यॉर्क टाइम्स' को दिए अपने एक इंटरव्यू में ये बात मानी कि "(ख्रुश्चेव) ने मुझे बर्बाद कर दिया."

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क्यूबा मिसाइल संकट

सोकोव ने बीबीसी को बताया, "इस शिखर सम्मेलन की असफलता ने एक तरह से क्यूबा मिसाइल संकट, बर्लिन वॉल और वियतनाम युद्ध के लिए हालात पैदा किए. अगर इसकी तुलना ट्रंप और किम जोंग-उन के साथ की जाती है तो ये बहुत प्रेरणादायक नहीं हैं."

कैलिफोर्निया के परमाणु प्रसार निरोध अध्ययन के लिए चल रहे जेम्स मार्टिन सेंटर में शोधाकर्ता के रूप में काम कर रहे सोकोव इस बात पर ज़ोर देते हैं कि ये अहम है कि अपेक्षाओं को कम किया जाए.

वह समझाते हुए कहते हैं, "ये मीटिंग सीमित उद्देश्यों के साथ सफल हो सकती है या ये महत्वाकांक्षी उद्देश्यों की वजह से असफल हो सकती है."

हालांकि, सोकोव ये भी कहते हैं कि इतिहास के अनुभवों को ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर नहीं देखना चाहिए लेकिन वह ऐसी कई स्थितियों की ओर इशारा करते हैं जो सफलता के लिए मुफ़ीद साबित हो सकती हैं.

वह बताते हैं, "एक बढ़िया तैयारी और हासिल होने वाले नतीज़ों को जानना बेहतर होगा. मैं व्यक्तिगत रूप से सीमित नतीज़ों से भी बहुत संतुष्ट हऊंगा. ये बहुत उचित होगा अगर ये संपर्क रखने और बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए तैयार हो जाएं. ये सबसे शानदार नतीज़ा होगा."

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2. अच्छे लोग और बुरे लोग

ट्रंप और किम जोंग-उन के बीच होने वाली मुलाक़ात पर बात करते हुए ज़ेहन में एक और ऐतिहासिक मुलाक़ात आती है. ये मुलाक़ात पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और चीन के सर्वोच्च नेता माओ त्सेतुंग की मुलाक़ात से जुड़ा था.

ये पहला मौका था जब एक अमरीकी राष्ट्रपति किसी एशियाई देश से दशकों तक चली शत्रुता के बाद उस देश में पहुंचा हो. दोनों देशों के बीच ऐसा दुश्मनी का भाव था कि निक्सन की टीम को ये भी नहीं पता था कि निक्सन के चीन पहुंचने पर माओ उनसे मुलाकात करेंगे भी या नहीं.

कैलिफोर्निया के मोन्टेरी में मिडिलबरी इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ के जानकार जेफ़री लेविस याद करते हैं, "चीन के पास पहले से परमाणु हथियार होने की वजह से अमरीका को एक कम्युनिस्ट चीन को स्वीकार करने में कोई दिक्कत नहीं हुई."

"परमाणु हथियार उन कारणों में से एक थे जिनकी वजह से अमरीका ने चीन को एक अहम देश माना और इसे नज़रअंदाज नहीं कर सका. और मुझे लगता है कि उत्तर कोरिया ने ये सबक सीखा है."

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लेविस कहते हैं, "इन दोनों मुलाक़ातों में एक बड़ा अंतर है और वो ये है कि निक्सन की चीन यात्रा के दौरान अनुभवी राजनयिकों के साथ लंबी और गंभीर बातचीत हुई थी. ऐसे राजनयिकों में पूर्व विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर शामिल थे. जबकि मौजूदा विदेश मंत्री माइक पोम्पोइ के पास बिलकुल भी अनुभव नहीं है."

लेविस के अनुसार, इस यात्रा से कई अन्य सबकों के साथ एक विरोधाभास भी पैदा होता है.

"अमरीका में हम बचकाने अंदाज में सोचते हैं कि परमाणु हथियार ख़राब होते हैं और जो लोग उन्हें चाहते हैं वो भी ख़राब होते हैं लेकिन चीन में जो लोग परमाणु हथियार चाहते थे, वे भी अमरीका के साथ अपने रिश्ते सुधारना चाहते थे. हमें इसके लिए तैयार रहना चाहिए वो उत्तर कोरियाई लोग जो परमाणु हथियार विकसित करना चाहते हैं, वे अमरीका के साथ बेहतर रिश्ते भी चाहते हों."

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3. अपने दुश्मन को पहचानें

आइसलैंड में साल 1986 में रोनाल्ड रीगन और मिख़ाइल गोर्बाचोफ़ की मुलाक़ात से जुड़ी ख़बरों को खंगालें तो अपने आप किम और ट्रंप की मुलाक़ात की याद आ जाएगी.

राष्ट्रपति रीगन ने सोवियत संघ को 'शैतानी साम्राज्य' की संज्ञा देने के बाद इस मीटिंग में पहुंचे. जबकि मिख़ाइल गोर्बाचोफ़ रीगन को एक 'झूठा व्यक्ति' मानते थे. दोनों के बीच ठीक उसी तरह की बयानबाज़ी हुई थी जैसी पिछले साल ट्रंप और किम के बीच देखने को आई थी.

पूर्व राष्ट्रपति की सहयोगी रहीं पेगी ग्रांड कहती हैं, "उस समय लोग बहुत चिंतित थे क्योंकि रीगन सोवियत संघ के ख़िलाफ़ बहुत गुस्से में थे और उस समय तीसरे विश्व युद्ध का ख़तरा मंडरा रहा था."

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अंग्रेजी अख़बार पोस्ट में छपी ओप-एड में लेखक डेविड ई हॉफ़मैन याद करते हैं, "गोर्बाचोफ़ एक के बाद एक छूट देते जा रहे थे जिसमें कई परमाणु हथियारों को नष्ट करना भी शामिल था और अमरीकी राष्ट्रपति आश्चर्यचकित थे लेकिन तभी गोर्बाचोफ़ ने एंटी-मिसाइल शील्ड को सीमित करने की मांग की जिसके लिए रीगन ने मना कर दिया."

हॉफमैन कहते हैं कि इसका सबक ये है कि अपने विरोधी देश के साथ मुलाक़ात करने से पहले उसके मकसद और क्षमताओं को पहचाना जाए और इसके लिए ही हमारे पास खुफिया एजेंसियां, राजनयिक और अकादमिक संस्थान हैं.

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Image caption ट्रंप निक्सन नहीं है और न ही किम माओ... लेकिन जानकार किम और ट्रंप की मीटिंग और ऐसी ही कुछ ऐतिहासिक मुलाकातों के बीच समानताएं खोज रहे हैं

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