वो डर जिससे नेपाल खुलकर चीन के साथ नहीं आ रहा

  • 20 जून 2018
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नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली चीन के पांच दिवसीय दौरे पर हैं.

नेपाली प्रधानमंत्री के चीनी दौरे को चीनी मीडिया ने काफ़ी तवज्जो दी है. चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि नेपाल आर्थिक सहयोग और आधारभूत ढांचे के विकास से जुड़े मुद्दों को अंजाम तक पहुंचाना चाहता है.

ग्लोबल टाइम्स ने ये भी लिखा है कि भारत को इस यात्रा से निराश नहीं होना चाहिए क्योंकि नेपाल में उसका प्रभाव कम नहीं होगा.

हालांकि इसके साथ ही यह भी जोड़ा गया है कि नेपाल, चीन और भारत को त्रिपक्षीय सहयोग पर ज़ोर देना चाहिए.

केपी ओली मंगलवार को चीन पहुंचे और वो रविवार तक वहां रहेंगे. इस दौरान उनकी मुलाक़ात चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से भी होगी. नेपाली प्रधानमंत्री की अहम बातचीत चीन के प्रधानमंत्री ली कचियांग से होनी है.

ग्लोबल टाइम्स से शंघाई इंस्टीट्यूट फ़ोर इंटरनेशनल स्टडीज सेंटर के निदेशक चाओ गेनचेंग ने कहा है, ''चीन के लिए नेपाल हमेशा से अहम रहा है. दोनों देशों की लंबी सीमा लगती है. दोनों देशों के अच्छे द्विपक्षीय संबंध चीन और स्वायत्त तिब्बत की स्थिरता के लिए बहुत ज़रूरी है.''

चाओ ने यह भी कहा है कि चीन के वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट में नेपाल एक अहम देश है और नेपाल चाहता भी है कि चीन उसके आर्थिक विकास के लिए काम भी करे.

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नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार युवराज घिमिरे का ओली के चीन दौरे पर कहना है, ''भारत इस दौरे से दुखी नहीं होगा. चीन और नेपाल के रिश्ते बेहतर हुए हैं. 2006 तक नेपाल के आंतरिक मामलों में भारत की निर्णायक हैसियत होती थी, लेकिन अब वो बात नहीं रही. नेपाल में चीन की उपस्थिति बढ़ी है. चीन की रुचि भी नेपाल में बढ़ी है. चर्चा का विषय यह है कि नेपाल और भारत में दूरी कितनी बढ़ी है.''

ओली का चीन जाना और भारत की चिंता

ओली के इस दौरे पर चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गेंग शुंग ने कहा है, ''चीन को उम्मीद है कि ओली के दौरे से वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट के तहत राजनीतिक साझेदारियां बढ़ेंगी. इसके साथ ही सांस्कृतिक आदान-प्रदान और दोनों देशों के नागरिकों के मेलजोल से भी संबंध और गहरे होंगे.''

केपी शर्मा ओली के हाथ में नेपाल की कमान दूसरी बार आई है. ओली के बारे में कहा जाता है कि नेपाल को चीन के क़रीब ले जाने में उनकी दिलचस्पी रही है.

ओली जब दोबारा नेपाल के प्रधानमंत्री बने तो इसी साल मार्च महीने के दूसरे हफ़्ते में उन्होंने तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शाहिद ख़ाक़ान अब्बासी का अपने देश में स्वागत किया था.

ओली के सत्ता संभालने के बाद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नेपाल पहुंचने वाले पहले राष्ट्र प्रमुख थे. पाकिस्तानी पीएम के इस दौरे पर कई विश्लेषकों का मानना था कि नेपाल ने शाहिद ख़ाक़ान का स्वागत तब किया जब भारत और पाकिस्तान के संबंध बिल्कुल पटरी से नीचे उतरे हुए थे.

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चीन के एक विश्लेषक का कहना है कि भारत नेपाल के मामले में पूरे इलाक़े में नफ़ा-नुक़सान के समीकरण को देखता है और उसे इससे बाज आना चाहिए.

नेपाल का वन बेल्ट वन रोड परियोजना में शामिल होना

ग्लोबल टाइम्स से शंघाई एकेडमी ऑफ़ सोशल साइंस के एक रिसर्चर ने कहा, ''चीन और नेपाल के संबंधों को लेकर नेपाल में भारत का प्रभाव कम होने की बात बढ़ा-चढ़ाकर कही जाती है. भारत को नफ़े-नुक़सान के समीकरण से बाहर निकलकर सोचना चाहिए. नेपाल की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से भारत पर निर्भर है.''

भारत चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना वन बेल्ट वन रोड का विरोध कर रहा है. दूसरी तरफ़ नेपाल इस परियोजना के साथ है. भारत के लिए यह असहज करने वाला है कि नेपाल वन बेल्ट वन रोड परियोजना का समर्थन कर रहा है.

अपने पहले कार्यकाल में भी ओली ने चीन का दौरा किया था और उन्होंने ट्रांज़िट ट्रेड समझौते पर हस्ताक्षर किया था. ओली चाहते हैं कि चीन तिब्बत के साथ अपनी सड़कों का जाल फैलाए और नेपाल को भी जोड़े ताकि भारत पर से उसकी निर्भरता कम हो.

चीनी रेलवे का विस्तार हिमालय के ज़रिए नेपाल तक ले जाने की बात भी कही जा रही है.

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जब भारत ने अनाधिकारिक रूप से 2015-16 में आर्थिक नाकेबंदी की थी तो उस वक़्त ओली ही नेपाल के प्रधानमंत्री थे. तब भारत से नेपाल में आपूर्ति पूरी तरह से बंद हो गई थी और उसे कई बुनियादी सामानों के अभाव से गुजरना पड़ा था.

इसी दौरान नेपाल में ओली की लोकप्रियता बढ़ने की बात कही जाती है और चीन से क़रीब आने का एक मज़बूत तर्क भी मिला था. ओली के बारे में कहा जाता है कि वो चीन से संबंधों को आगे बढ़ाने में भारत की चिंताओं की फ़िक्र नहीं करते हैं.

क्या नेपाल भारत के ख़िलाफ़ चीन कार्ड खेलता है?

आर्थिक नाकेबंदी के बाद नेपाल के लिए यह अहम हो गया था कि वो भारत पर अपनी निर्भरता कम करे. नेपाल दशकों से चाह रहा है कि चीन के साथ रेल संपर्क स्थापित हो. हालांकि चीनी विशेषज्ञों का भी मानना है कि नेपाल और चीन को रेल से जोड़ना आसान नहीं है.

इस रेल परियोजना में भारी खर्च की भी बात कही जा रही है. ऐसे में नेपाल को ये भी डर है कि तज़ाकिस्तान, लाओस, मालदीव, जिबुती, कीर्गिस्तान, पाकिस्तान, मंगोलिया, श्रीलंका और मोंटेनेग्रो की तरह कहीं वो भी कर्ज़ के बोझ तले दब न जाए.

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यूरेशिया रिव्यू की एक रिपोर्ट के अनुसार चाइना-लाओस रेलवे परियोजना को वन बेल्ट न रोड के तहत शुरू किया गया.

इस परियोजना की पूरी लागत 6 अरब डॉलर है यानी यह लाओस की जीडीपी से का आधा है. इस रिपोर्ट के अनुसार चीनी के साथ नेपाल का यह डर बना हुआ है कि कहीं वो भी पाकिस्तान की तरह कर्ज़ में ना फंस जाए.

ओली के बारे में कहा जाता है कि वो चुनाव भारत विरोधी भावना के कारण ही जीते हैं. भारत चाहता है कि नेपाल महाकाली नदी का बचा पानी यमुना को दे. यूरेशिया रिव्यू का कहना है कि भारत इसके लिए पहले ही दो बार संपर्क कर चुका है. कहा जा रहा है कि ओली के रहते शायद ही दोनों देश इस पर सहमत हों.

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इस बात पर कई विशेषज्ञ सहमत दिखते हैं कि नेपाल भारत से खुलकर दुश्मनी का इज़हार नहीं कर सकता है. ओली के बारे में कहा जा रहा है कि उन्होंने इस चीज़ को मज़बूती से स्थापित करने की कोशिश की है कि नेपाल एक संप्रभु देश है और वो अपनी विदेश नीति को किसी देश के मातहत होकर आगे नहीं बढ़ाएगा.

नेपाल में चीन के जमते पांव से भारत के लिए चिंतित होना लाजिमी है. चीन के लिए नेपाल एक रणनीतिक ठिकाना है. नेपाल में हज़ारों तिब्बती रहते हैं और चीन को डर रहता है कि कहीं नेपाल में तिब्बतियों का कोई आंदोलन न शुरू हो जाए जिसका प्रभाव तिब्बत में पड़े. इसलिए नेपाल में उसकी मज़बूत मौजूदगी ज़रूरी सी लगती है. साथ ही भारत का मसला तो महत्वपूर्ण है ही.

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