क्या हड़कंप ला सकता है ट्रंप-जिनपिंग का व्यापार युद्ध?

  • 23 जून 2018
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युद्ध शब्द की आपके दिमाग में क्या छवि है? बंदूकें लेकर दौड़ते सैनिक, गोले दागते टैंक और झन्नाटेदार आवाज़ों के साथ उड़ती मिसाइलें.

लेकिन अब हम एक नए क़िस्म के युद्ध के बारे में सुन रहे हैं. दुनिया जिसे 'व्यापार युद्ध' यानी 'ट्रेड वॉर' कहती है.

यह व्यापार युद्ध क्या है, जिसने अमरीका बनाम शेष की स्थिति और समूची दुनिया में महंगाई बढ़ने का ख़तरा पैदा कर दिया है?

यहां तक कि अमरीका का सहयोगी समझा जाने वाला भारत भी मुंह फुलाकर अमरीका के ख़िलाफ़ उतर आया है.

यह 'व्यापार युद्ध' संरक्षणवादी आर्थिक नीतियों की उपज है, जिसकी सबसे ताज़ा शुरुआत अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की नीतियों ने की है.

इस युद्ध के हथियार आपके चारों ओर हैं. खाने की चीज़ें, पानी का गिलास, आपके घर में रखी अलमारी और जिस फ़ोन पर आप यह स्टोरी पढ़ रहे हैं, वह भी इस युद्ध का हथियार हो सकती है.

युद्ध की पृष्ठभूमि: हाल की घटनाएं

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राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप 'सर्वप्रथम अमरीका' के वादे के साथ चुनाव जीतकर आए थे. आसान भाषा में इसका मतलब है कि अमरीकी हितों का संरक्षण पहले और देश-दुनिया की फिक़्र बाद में.

वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार सुषमा रामचंद्रन के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन यह मानता है कि अमरीका में विदेशी उत्पादों की सस्ती उपलब्धता का बुरा असर उनके अपने उद्योगों और रोजगार पर पड़ा है और वहां व्यापार घाटा बढ़ा है. अपने घर में जब देश का आयात ख़र्च कुल निर्यात से ज़्यादा हो जाए तो उसे अर्थशास्त्र की भाषा में व्यापार घाटा यानी ट्रेड डेफिसिट कहते हैं.

इसलिए अमरीका ने कुछ दिनों पहले स्टील और एल्यूमीनियम पर इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ा दी. इससे चीन और बाक़ी देशों का अमरीका में बिकने वाला स्टील और एल्यूमीनियम महंगा हो गया और उनकी ख़रीद और मुनाफ़ा दोनों कम हो गए.

चीन और यूरोपीय संघ ने भी उसी भाषा में जवाब देते हुए अपने बाज़ार में आने वाली कई अमरीकी चीज़ों पर इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ा दी.

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चूंकि अमरीका की स्टील-एल्यूमीनियम पर नई दरों का विपरीत असर भारत पर भी पड़ना था, इसलिए भारत ने भी अमरीका से आने वाले सेब, बादाम, अखरोट और छोले जैसे कृषि उत्पादों पर इंपोर्ट ड्यूटी 20 से 90 फ़ीसदी तक बढ़ा दी. पहले बादाम पर प्रति किलो 35 रुपये इंपोर्ट ड्यूटी थी, जो अब बढ़कर 42 रुपये प्रति किलो कर दी गई.

अब अमरीका ने कई और वस्तुओं पर इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाने की धमकी दी है जिसका चीन और यूरोपीय देशों पर बुरा असर पड़ेगा.

दिल्ली विश्वविद्यालय में वाणिज्य के एसोसिएट प्रोफेसर आलोक पुराणिक कहते हैं, "ट्रंप का यह कहना है कि बाहर वाले हमें ज़्यादा माल बेच जाते हैं और हम उन्हें उतना माल नहीं बेच पाते क्योंकि देश प्रभारी उनके माल पर भारी कर लगा देते हैं. तो हम अपने देश में उनके माल को महंगा कर दें तो उनका माल कम बिकेगा. ऐसी स्थिति में दोनों पक्षों के बीच जो मुनाफ़े का फर्क़ है, वह कम हो जाएगा. यानी फिर अमरीका को कम से कम आयात करना पड़ेगा और वह उन देशों को अधिकतम निर्यात कर पाएगा, जिन्हें वह आयात करना चाहता है."

इसके असर: 'अटलांटिक से हिंद तक, बढ़ेगी महंगाई'

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सुषमा रामचंद्रन कहती हैं कि अमरीका अपने तर्कों में सही है क्योंकि वह अब तक वाक़ई अपने यहां बहुत कम इम्पोर्ट ड्यूटी लगाता रहा है. जबकि दूसरे देश, मसलन भारत अपने आयात पर काफी ड्यूटी लगाते हैं क्योंकि वहां अपने उद्योगों को मदद बनाए रखने की नीति रहती है.

लेकिन सुषमा इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाए जाने को इसका समाधान नहीं, बल्कि ख़तरा बताती हैं.

उनके मुताबिक, "अमरीकी लोगों को सस्ती इम्पोर्ट ड्यूटी के माहौल में रहने की आदत है और इसलिए प्रतिस्पर्धा के चलते उन्हें सस्ती चीज़ें उपलब्ध रही हैं. महंगाई कम रहती है और इसलिए मांग ज़्यादा रहती है. लेकिन दीर्घकालिक नज़रिये से ट्रंप की यह नीति अमरीका के हित में नहीं है क्योंकि जो चीज़ें पहले वहां सस्ती थीं, वे अब महंगी हो जाएंगी और इसका असर सबसे पहले वहां लोगों की जेब पर पड़ेगा."

वह कहती हैं कि चूंकि बाक़ी देश भी जवाब में अपने यहां बिकने वाली अमरीकी चीज़ों पर इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ा रहे हैं तो महंगाई उनके यहां भी आएगी. मसलन भारत में ही अब सेब और बादाम महंगे होने वाले हैं.

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'वैश्वीकरण का विचार, सुविधा अनुसार'

वैश्वीकरण ने सरहदें लांघकर व्यापार करने का मौक़ा दिया है. इससे देशों की अर्थव्यवस्थाएं भी एक दूसरे से अछूती नहीं रही हैं.

जानकार मानते हैं कि इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाने का विचार सैद्धांतिक तौर पर ही वैश्वीकरण के ख़िलाफ़ है. अमरीका अपनी नीतियों से बाक़ी मुल्क़ों को भी संरक्षणवादी नीतियों की ओर धकेल रहा है और प्रतिस्पर्धा के समुद्र का पानी कम कर रहा है.

दिल्ली यूनिवर्सिटी में वाणिज्य के एसोसिएट प्रोफेसर आलोक पुराणिक वैश्वीकरण के विचार को बड़े देशों की मनमानी पर निर्भर बताते हैं.

वह कहते हैं, "अमरीकी कारें, अमरीकी बाइक्स भारत में बिकें, इसका फायदा अमरीकी कंपनियों को हो तो इसे आप कहिए वैश्वीकरण. लेकिन भारत या चीन का सामान वहां सस्ता बिके तो आप कहें कि यह तो हमारे हितों पर प्रहार है. अमरीका ऐसा ही कह रहा है. कुल मिलाकर कहानी हितों पर प्रहार की है."

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अनिश्चितबाज़ार

इस व्यापार युद्ध का एक त्वरित असर बताते हुए आलोक पुराणिक बाज़ारों की हालत का ज़िक्र करते हैं.

वह कहते हैं, "आप देखिए कि बीते एक हफ़्ते में दुनिया के तमाम स्टॉक बाज़ार गिरे हैं. यह अनिश्चितता वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह है. अगर यह ट्रेड वॉर ज़्यादा बढ़ा और दोनों देशों के आर्थिक संबंधों में समस्या आई तो निश्चय ही चीन के माल को अमरीका में बाज़ार नहीं मिलेगा."

"इसका असर यह भी हो सकता है कि चीन में कारखाने बंद होने की सूरत पैदा हो जाए या श्रमिकों का रोज़गार प्रभावित हो. इसी तरह अमरीका में उपभोक्ताओं को चीन का सस्ता और संभवत: अच्छा माल नहीं मिलेगा."

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छोटे उद्योग धंधे और रोज़गार

अर्थशास्त्री अरुण कुमार बताते हैं कि अमरीका इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था है तो इसका सभी देशों के उत्पादन पर असर पड़ सकता है. उत्पादन घटना, महंगाई और बेरोज़गारी बढ़ना, इन चीज़ों का आम लोगों की ख़ुशहाली पर असर पड़ सकता है.

सुषमा याद करती हैं कि राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने अपने कार्यकाल में भी इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाई थी. इससे अमरीका में स्टील और एल्यूमीनियम महंगे हो गए थे और इसका नुकसान यह हुआ कि वहां के छोटे उद्योग उन्हें ख़रीद नहीं सके और बंद हो गए.

इससे ख़ासी नौकरियां भी गईं और तब बुश सरकार को यह फैसला वापस लेना पड़ा.

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Image caption साल 2000 से 2016 के बीच अमरीका की स्टील इंडस्ट्री में लगभग 50 हज़ार लोगों ने अपनी नौकरियां गंवाई

'पर शेष दुनिया तो क़रीब आएगी'

अर्थशास्त्री अरुण कुमार इसका एक दूसरा पहलू भी बताते हैं. वह कहते हैं कि अगर अमरीका बनाम शेष की यह स्थिति कुछ दिन जारी रह गई तो बाक़ी देशों के आपस में आर्थिक संबंध सुधरेंगे.

वह बताते हैं, "अमरीका से आने वाले सेब पर भारत ने इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ा दी तो हो सकता है कि अब ऑस्ट्रेलिया या यूरोप से सेब ज़्यादा आए. अमरीका के साथ व्यापार कम होगा, लेकिन हो सकता है कि बाक़ी देशों के साथ व्यापार बढ़ जाए. अगर अमरीकी सामान पर बाक़ी देशों ने इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ा दी है और हम वो सामान निर्यात कर सकते हैं तो हो सकता है कि हमारा निर्यात भी बढ़ जाए."

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भारत ने जो किया, ठीक किया?

आलोक पुराणिक के मुताबिक, मूल रूप से यह लड़ाई चीन और अमरीका की है.

वह कहते हैं, "यह हाथियों की लड़ाई है और भारत इसमें चूहा भी नहीं है. भारत की उपस्थिति इस परिदृश्य में सिर्फ प्रतीकात्मक है. भारत ने अमरीका को जवाब देते हुए सेब पर जो इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाई है, जिसके महंगे होने से भारत को जो ड्यूटी हासिल होगी वह है 2.4 करोड़ डॉलर. भारत जैसी अर्थव्यवस्था के लिए कोई बड़ी रकम नहीं है."

वह मानते हैं कि अमरीका-भारत संबंधों में इसका सिर्फ प्रतीकात्मक महत्व है. लेकिन चीन और अमरीका की लड़ाई का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है.

सुषमा का मत यह है कि भारत ने सेब, बादाम और अखरोट जैसी चीज़ों पर इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाकर अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार ली है.

वह कहती हैं, "यह सोच-समझकर करना चाहिए था. इसका असर आम लोगों की जेब पर पड़ेगा. अमरीका बनाम शेष की लड़ाई में भारत को शेष के साथ ही खड़ा होना चाहिए था, लेकिन यह लड़ाई उसे विश्व व्यापार संगठन के मंच पर लड़नी चाहिए थी जो समूची दुनिया में सस्ती इम्पोर्ट ड्यूटी का पक्षधर है. हमारे वाणिज्य मंत्रालय को थोड़ा इंतज़ार करना चाहिए था."

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क्या वाक़ई यह ज़रूरी था, मिस्टर ट्रंप?

सवाल है कि क्या अमरीका में हालात वाक़ई ऐसे थे कि ट्रंप अर्थव्यवस्था में दीवार बनाने के लिए मजबूर हो गए? प्रोफेसर अरुण कुमार इससे इत्तेफाक़ नहीं रखते.

वह बताते हैं, "2008 की आर्थिक मंदी के बाद अमरीका की आर्थिक स्थिति डांवाडोल थी, बेरोज़गारी बढ़ गई थी. लेकिन पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा का आख़िरी कार्यकाल ख़त्म होने से एक साल पहले से स्थिति बेहतर होने लगी थी. इस समय अमरीका की विकास दर अच्छी है. ट्रंप की रेटिंग भी बढ़ गई है."

अरुण कुमार इसकी जड़ें ट्रंप के चुनावी अभियान में देखते हैं.

उनके मुताबिक, "अपने चुनाव अभियान में ट्रंप ने कई ऐसे वादे किए जो संरक्षणवादी आर्थिक नीतियों पर आधारित थे. उन्होंने अपनी नौकरियां और अपना धन बचाने की बात कही. उन्होंने एक तरह से कहा कि हम चीन जैसे देशों के लिए गुल्लक बन गए हैं. इस तरह उन्होंने वहां के कारीगरों को प्रभावित किया. अब वह यही संकेत दे रहे हैं कि वह 'अमरीका सर्वप्रथम' के अपने चुनावी वादे पर बने हुए हैं."

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अब आगे क्या?

आलोक पुराणिक कहते हैं कि चीन और अमरीका दोनों परिपक्व अर्थव्यवस्थाएं हैं. चूंकि इसका असर दोनों देशों पर पड़ रहा है, इसलिए उन्हें पता है कि किस हद तक इस व्यापार युद्ध को ले जाना है.

वह कहते हैं, "मुझे ऐसा लगता है कि दोनों देश बातचीत की मेज़ पर आएंगे और तय करेंगे कि व्यापार घाटा (ट्रेड डेफिसिट) कम करने के लिए क्या किया जाए. मुझे नहीं लगता कि यह व्यापार युद्ध ज़्यादा लंबा चलेगा."

आलोक पुराणिक के मुताबिक, अमरीका यह चाहता है कि बाक़ी देश अपने यहां बिकने वाली अमरीकी चीज़ों पर इम्पोर्ट ड्यूटी घटाएं और अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो उन्हें अमरीका में भारी इम्पोर्ट ड्यूटी का सामना करना पड़ेगा. इसी संबंध में दबाव बनाने के लिए उसने यह युद्ध शुरू किया है.

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