चीन के बेशुमार क़र्ज़ तले दबा पाकिस्तान कैसे उबर पाएगा?

  • 1 जुलाई 2018
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आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को चीन ने फिर से एक अरब डॉलर का क़र्ज़ दिया है. पाकिस्तान के ख़ज़ाने में विदेशी मुद्रा भंडार लगातार कम हो रहा है और आलम यह है कि कुछ ही हफ़्ते के आयात भर की रक़म बची हुई है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स से पाकिस्तानी वित्त मंत्रालय के दो सूत्रों ने इस क़र्ज़ की पुष्टि की है. कहा जा रहा है कि पाकिस्तान एक बार फिर से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में जा सकता है.

इससे पहले पाकिस्तानी केंद्रीय बैंक के गवर्नर तारिक़ बाजवा ने फ़ाइनैंशियल टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा था कि चीनी बैंकों से पाकिस्तान ने अप्रैल महीने में एक अरब डॉलर का क़र्ज़ लिया था. बाजवा ने कहा था, ''प्रतिस्पर्द्धी ब्याज दर पर यह क़र्ज़ चीन समर्थित बैंकों से लिया गया है.''

पाकिस्तानी अख़बार डॉन का कहना है कि इस क़र्ज़ से एक बार फिर साफ़ हो गया है कि चीन पर पाकिस्तान की निर्भरता लगातार बढ़ रही है.

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ख़ाली होता विदेशी मुद्रा भंडार

डॉन के अनुसार पिछले हफ़्ते पाकिस्तान की विेदेशी मुद्रा कम होकर 9.66 अरब डॉलर हो गई जो कि मई 2017 में 16.4 अरब डॉलर थी. हालांकि 2017 के मुक़ाबले देखें तो अप्रैल 2016 तक पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार 18.1 अरब डॉलर था.

इस क़र्ज़ के साथ ही चीन से पाकिस्तान इस वित्तीय वर्ष में पाँच अरब डॉलर से ज़्यादा का क़र्ज ले चुका है.

रॉयटर्स ने पाकिस्तान के वित्त मंत्रालय के दस्तावेजों के हवाले से बताया है कि इस वित्त वर्ष के पहले 10 महीने में चीन पाकिस्तान को 1.5 अरब डॉलर क़र्ज़ दे चुका है.

इसी वक़्त पाकिस्तान ने कई व्यावसायिक बैंकों से 2.9 अरब डॉलर के क़र्ज़ लिए. रॉयटर्स का कहना है कि ज़्यादातर बैंक चीन के हैं.

कई आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि चीन नहीं चाहता है कि पाकिस्तान किसी गंभीर आर्थिक संकट में फंसे, क्योंकि इससे उसकी महत्वाकांक्षी परियोजना चाइना पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) पर बुरा असर पड़ेगा.

सीपीईसी परियोजना क़रीब 60 अरब डॉलर का है. हालांकि कई विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि चीन का यह क़र्ज़ पाकिस्तान के संकट को कम करने के लिए काफ़ी नहीं है.

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13वीं बार आईएमएफ़ की शरण में

पाकिस्तान में 25 जुलाई को चुनाव है और कहा जा रहा है कि नई सरकार को एक बार फिर से 2013 की तरह आईएमएफ़ के पास जाना होगा. 2013 में आईएमएफ़ ने पाकिस्तान को 6.7 अरब डॉलर की आर्थिक मदद की थी.

फाइनैंशल टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान 1988 से अब तक 12 बार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की शरण में जा चुका है.

पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी के मुखिया इमरान ख़ान तो संकेत भी दे चुके हैं कि अगर वो चुनाव जीतकर सत्ता में आते हैं तो आईएमएफ़ का रुख़ करेंगे. पाकिस्तान इस बार आईएमएफ़ गया तो 13वीं बार मदद के लिए जाएगा.

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था चौतरफ़ा संकट से घिरी हुई है. आयात और निर्यात का संतुलन हद से ज़्यादा ख़राब हो गया है. पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक की रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान वित्तीय वर्ष के पहले 10 महीने में पाकिस्तान का चालू खाता घाटा 14.03 अरब डॉलर तक पहुंच गया है.

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स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान के अनुसार पिछले वित्तीय वर्ष में इसी वक़्त यह घाटा 9.35 अरब डॉलर का था.

कहा जा रहा है कि कच्चे तेल की बढ़ती क़ीमत के कारण पाकिस्तान का चालू खाता घाटा 16 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा. पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से आयातित पेट्रोलियम पर निर्भर है.

पाकिस्तान पिछले छह महीने में तीन बार अपनी मुद्रा का अवमूल्यन कर चुका है ताकि घाटे को कम किया जा सके. कहा जा रहा है पाकिस्तानी रुपए के अवमूल्यन से निर्यात में तो बढ़ोतरी हुई, लेकिन आयात में कोई कमी नहीं आई.

पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक के अनुसार इस वित्तीय वर्ष के पहले 10 महीने में पाकिस्तान का चालू खाता घाटा 14.03 अरब डॉलर रहा जो कि पिछले पूरे वित्तीय वर्ष के घाटे से लगभग दो अरब डॉलर ज़्यादा है.

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चीन क़र्ज़ देकर ख़ुश क्यों?

कई विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान बुरी तरह से आर्थिक संकट में फंसा है फिर भी चीन क़र्ज़ देकर ख़ुशी महसूस करता है. ऐसा इसलिए क्योंकि चीन नहीं चाहता है कि चाइना पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर में पाकिस्तान को कितना क़र्ज़ दिया गया है वो सार्वजनिक हो.

क़रीब 60 अरब डॉलर की सीपीईसी परियोजना के तहत चीन पाकिस्तान में आधारभूत ढांचा का विकास कर रहा है. फाइनैंशियल टाइम्स की रिपोर्ट का कहना है कि चीन हमेशा से इस परियोजना के तहत पाकिस्तान को मिले क़र्ज़ को सार्वजनिक करने को लेकर अनिच्छुक रहा है.

पाकिस्तान के अर्थशास्त्रियों का मानना है कि चीन से क़र्ज़ समस्या का समाधान नहीं है. पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक के पूर्व अर्थशास्त्री मुश्ताक़ ख़ान ने फाइनैंशियल टाइम्स से कहा, ''पाकिस्तानी नीति निर्माता आर्थिक घाटे को कम करने के लिए कोई ठोस क़दम नहीं उठा रहे हैं. ये केवल नुक़सान के गैप को कम करने की कोशिश कर रहे हैं. चीन से हमारी समस्या का समाधान नहीं हो सकता है.''

पाकिस्तान को लेकर अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने भी कड़ा रुख़ अपना लिया है. अमरीका ने पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक मदद लगभग रोक दी है.

इसका असर यह हुआ कि पाकिस्तान की चीन पर निर्भरता और बढ़ गई. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल पाकिस्तान ने 51.4 करोड़ डॉलर के हथियार चीन से आयात किए जबकि अमरीका से महज 2.1 करोड़ डॉलर का ही हथियार सौदा हुआ.

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एक ही टोकरी में सारे अंडे?

सीपीईसी परियोजना को लेकर कहा जा रहा है कि पाकिस्तान ने सारे अंडे एक ही टोकरी में रख दिए हैं और अगर अंडे फूटे तो एक भी नहीं बचेगा.

सीपीईसी से पाकिस्तान की ऊर्जा संकट के समाधान की बात कही जा रही है, लेकिन इसे लेकर कई तरह की दिक़्क़तें भी हैं. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक़ चीन पाकिस्तान को अपने इस प्रोजेक्ट में चीनी उपकरण ही ख़रीदने पर मजबूर कर रहा है. पाकिस्तान को चीन इसलिए क़र्ज़ बढ़ाते जा रहा है और पाकिस्तान इसमें और उलझता जा रहा है.

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ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान पर विदेशी क़र्ज़ 91.8 अरब डॉलर हो गया है. क़रीब पांच साल पहले नवाज़ शरीफ़ ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी तब से इसमें 50 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है.

पाकिस्तान पर क़र्ज़ और उसकी जीडीपी का अनुपात 70 फ़ीसदी तक पहुंच गया है. कई विश्लेषकों का कहना है कि चीन का दो तिहाई क़र्ज़ सात फ़ीसदी के उच्च ब्याज दर पर है.

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