ईरान को बदहाल होने से चीन भी क्यों नहीं बचा पाएगा

  • 3 जुलाई 2018
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ईरान से परमाणु समझौता रद्द करने के बाद से अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का रुख़ नरम नहीं हो रहा है.

ट्रंप प्रशासन ईरान को वैश्विक व्यवस्था से बिल्कुल अलग-थलग करने को लेकर प्रतिबद्ध दिख रहा है. अमरीका के इस रुख़ का असर ईरान और यूरोप के संबंधों पर भी पड़ा है.

कई विश्लेषकों को लगता है कि ईरान चीन को संकट की स्थिति में गोपनीय हथियार के तौर पर देखता रहा है. ईरान को लगता है कि वो पश्चिम के नुक़सान को चीनी निवेश और उसे तेल बेचकर भरपाई कर लेगा.

अमरीका और चीन के बीच जारी ट्रेड वॉर में ऐसा माना जा रहा है कि ईरान को चीन का साथ मिलेगा. हालांकि ज़्यादातर विश्लेषकों को लगता है ईरान के लिए चीनी मदद किसी फंतासी से ज़्यादा कुछ नहीं है.

कहा जा रहा है कि चीन ईरान को प्रतिबंधों में कुछ छूट तो दे सकता है, लेकिन वो उसका तारणहार नहीं बन सकता.

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क्या कर पाएगा चीन?

ईरान में लगातार बदतर स्थिति होती जा रही है. ईरान की मुद्रा रियाल इतिहास के सबसे निचले स्तर पर आ गई है. अनाधिकारिक बाज़ार में तो एक डॉलर के बदले 90 हज़ार रियाल देने पड़ रहे हैं.

इस साल की शुरुआत में रियाल की क़ीमत डॉलर की तुलना में मौजूदा वक़्त से आधी से भी कम थी.

पिछले हफ़्ते ईरान में 2012 के बाद पहली बार बड़ी संख्या में लोग सरकार के ख़िलाफ़ तेहरान की सड़कों पर उतरे. ईरान के पक्ष में कुछ भी सकारात्मक होता नहीं दिख रहा है.

तेल निर्यातक देशों के संगठन ओपेक ने पिछले हफ़्ते तेल उत्पादन बढ़ाने का फ़ैसला किया था. ओपेक के इस क़दम को ट्रंप का समर्थन हासिल था. ओपेक का यह क़दम ईरान को और परेशान करने वाला है.

अमरीकी रुख़ और ईरान के चरमराते आधारभूत ढांचे के कारण वो तेल का उत्पादन बढ़ाने की स्थिति में नहीं है. ईरान के पास विदेशी मुद्रा हासिल करने का कोई ज़रिया नहीं रहेगा क्योंकि वो तेल का भी निर्यात नहीं करने की स्थिति में होगा.

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अमरीका दुनिया के तमाम तेल आयातक देशों पर ईरान से तेल नहीं ख़रीदने का दबाव बना रहा है. इन देशों में भारत भी शामिल है.

ऐसे में सवाल उठता है कि ईरान से सबसे ज़्यादा तेल आयात करने वाला देश चीन संकट की घड़ी में क्या उसका साथ देगा? कहा जा रहा है इस सवाल पर अमरीका में ख़ूब बहस हो रही है.

ईरान पर अमरीका के नए प्रतिबंधों की वजह से चीन के निजी सेक्टर प्रभावित नहीं होंगे और ऐसा ही यूरोप के साथ होगा. दूसरी तरफ़ ईरान के पास सीमित विकल्प हैं.

इसमें कोई शक नहीं है कि ईरान को केवल चीनी निवेश, निर्यात और तेल की ख़रीदारी से ही मदद मिल सकती है.

यूरोप का भी साथ नहीं

अमरीका ने जब परमाणु समझौते को ख़त्म किया तो ईरान ने यूरोप की तरफ़ रुख़ किया. ईरान ने कोशिश की कि यह परमाणु समझौता ख़त्म नहीं हो और इसी के तहत यूरोपीय यूनियन के अधिकारियों ने अपनी कंपनियों को प्रोत्साहित किया कि वो ईरान के साथ व्यापार और निवेश जारी रखें.

यूरोप की सरकारों ने ईरान के साथ कई छूटों का प्रस्ताव रखा और अमरीका से भी कहा कि उनकी कंपनियों को ईरान के साथ व्यापार करने दे.

अब यूरोप की कंपनियां भी नहीं सुन रही हैं. निवेश के मोर्चे पर पीएसए समूह ने ईरानी ऑटो मैन्युफ़ैक्चरर्स के साथ एक साझे उपक्रम को बंद करने का फ़ैसला किया.

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वहीं तेल के मोर्चे पर फ़्रांस की कंपनी 'टोटल' ने कहा है कि जब तक अमरीका से कोई विशेष छूट नहीं मिल जाती है तब तक वो ईरान के साथ प्रस्तावित अरबों डॉलर के समझौते को रद्द करती है.

इसके साथ ही यूरोप की दर्जनों कंपनियों ने इस इस्लामिक गणतंत्र में अपना निवेश रद्द करने का फ़ैसला किया है.

यह सच है कि ईरान और चीन के बीच मज़बूत संबंध हैं. 2015 में जब ईरान के साथ परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर हुआ था तो चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने संबंधों के दायरे को और बढ़ाने पर सहमति बनाई थी.

ईरान और चीन ने अगले 25 सालों के लिए नीतियों और संबंधों की नई लकीर खींची थी. दोनों देशों में अगले एक दशक में द्विपक्षीय व्यापार 600 अरब डॉलर से 10 गुना बढ़ाने की बात हुई थी.

अब चीन के पास भी ये विकल्प है कि वो सारे क़रार को ख़त्म कर दे.

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कई विश्लेषकों का कहना है कि चीन का निवेश इस पर निर्भर नहीं करता है कि ईरान को पश्चिम से कितना नुक़सान हो रहा है.

मिसाल के तौर पर ईरान को तेल निकालने और उत्पादन लागत कम करने के लिए मज़बूत आधारभूत ढांचे के साथ-साथ उच्च गुणवत्ता वाली तकनीक की ज़रूरत भी पड़ती है.

ईरान के पास तकनीक नहीं है और वो इसे आयात के ज़रिए ही हासिल कर सकता है. ये तकनीक यूरोप और अमरीका के सिवा किसी के पास है नहीं.

चीन कितना सक्षम

ब्लू की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ ये तकनीक चीन के पास भी नहीं है. इस रिपोर्ट में लिखा गया है, ''पश्चिम की टेक्नॉलजी की तरह चीन की टेक्नॉलजी तेल के अन्वेषण और उत्पादान में प्रभावी नहीं है. ऐसे में चीन का साथ मिल भी जाए तो ईरान को कोई फ़ायदा नहीं होगा.''

कई विशेषज्ञों का मानना है कि चीनी निवेश ईरान में मूर्त रूप नहीं ले सकता. चीन की ज़्यादातर कंपनियों की दिलचस्पी अमरीका और डॉलर में व्यापार करने पर है.

मतलब इन कंपनियों की भी दिलचस्पी ईरान में नहीं है. ईरान के मामले में अमरीकी प्रतिबंध सभी फ़र्मों पर लागू होते हैं.

अगर चीनी कंपनियां ईरान के साथ व्यापार प्रतिबंधों के बावजूद व्यापार करती हैं तो इन कंपनियों के लिए अमरीका में मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी. ईरान पर अमरीकी प्रतिबंध छह अगस्त से लागू होने जा रहा है.

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यह प्रतिबंध अमरीकी डॉलर से सभी तरह की खरीदारी और सोने से व्यापार पर भी लागू होगा. इन प्रतिबंधों को चीन की कंपनियां बाइपास नहीं कर सकतीं.

ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए तेल का निर्यात 'जीवन रक्त' की तरह है और तेहरान के पास फ़िलहाल कोई विकल्प नहीं दिख रहा है.

सेंट्रल बैंक ऑफ़ द इस्लामिक रिपब्लिक के अनुसार 2010 में जब अमरीका ने ईरान पर प्रतिबंध लगाया था तो उसके तेल उत्पादन में हर दिन 40 लाख बैरल की गिरावट आ गई थी.

2013 में यह गिरावट प्रति दिन 25 लाख बैरल की थी. जब परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर हुआ तो 2016 में ईरान में तेल के उत्पादन में हर दिन 40 लाख बैरल की बढ़ोतरी हुई थी.

ब्लूमबर्ग के अनुसार ईरान की जीडीपी भी तीन फ़ीसदी से 12 फ़ीसद पर पहुंच गई थी.

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ईरान के भीतर भी चिंता

वर्तमान समय में ईरान हर दिन क़रीब 27 लाख बैरल तेल निर्यात कर रहा है. फ़ाइनेंशियल ट्रिब्यून के अनुसार इनमें से 38 फ़ीसदी तेल ईरान यूरोप की कंपनियों को बेचता है.

अगर यूरोपीय कंपनियों ने ईरान का साथ नहीं दिया तो वो तेल नहीं बेच पाएगा. चीन को ज़्यादा तेल देकर ईरान इसकी भरपाई कर सकता है, लेकिन यह भी इतना आसान नहीं है.

कई विश्लेषकों का कहना है कि चीन भी चाहेगा कि वो ईरान की मजबूरी का फ़ायदा उठाए. चीन ईरान के लिए बाक़ी देशों के साथ राजनयिक कलह पैदा नहीं करना चाहेगा.

ईरान के तेल निर्यात में कमी आती है तो उसके विदेशी मुद्रा भंडार में तेज़ी से गिरावट आएगी. ऐसे में उसके लिए भुगतान संकट से निकलने का कोई रास्ता नहीं होगा.

ईरान के भीतर भी इस संकट को लेकर लोग सड़क पर निकल रहे हैं. ईरान में कई लोगों को लग रहा है कि वर्तमान सरकार अर्थव्यवस्था के साथ दुःसाहस करती दिख रही है. ईरान के भीतर ही लोग कहने लगे हैं कि अगर वो चीन की तरफ़ देख रहा है तो उसे निराशा ही हाथ लगेगी.

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इराक़ बन जाएगा ईरान?

ईरान के पहले उपराष्ट्रपति को सुधारवादी माना नेता माना जाता है. उन्होंने कहा है कि ईरान को सीधे अमरीका से बात करनी चाहिए. इशाक़ ने कहा है कि ईरान गंभीर 'इकनॉमिक वॉर' में जा रहा है और इसका नतीज़ा बहुत बुरा होगा.

उन्होंने कहा है कि ईरान को इस संकट से चीन और रूस भी नहीं निकाल सकते हैं. उनका कहना है कि अमरीका ही इस संकट से ईरान को निकाल सकता है.

अरमान अख़बार ने लिखा है कि ईरान आने वाले दिनों में और मुश्किल में होगा.

इस अख़बार ने संयुक्त राष्ट्र में ईरान के पूर्व राजदूत अली ख़ुर्रम के बयान को छापा है जिसमें उन्होंने कहा है, ''जिस तरह अमरीका ने इराक़ में सद्दाम हुसैन की सरकार को उखाड़ फेंका था उसी तरह से ईरान के लिए भी अमरीका ने योजना बनाई है. अमरीका ने इराक़ में यह काम तीन स्तरों पर किया था और ईरान में भी वैसा ही करने वाला है. पहले प्रतिबंध लगाएगा, फिर तेल और गैस के आयात को पूरी तरह से बाधित करेगा और आख़िर में सैन्य कार्रवाई करेगा.''

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