मेक्सिको में ओब्राडोर की जीत क्या वाकई वामपंथ की जीत है?

  • 6 जुलाई 2018
मेक्सिको, राष्ट्रपति, आंद्रेस मैनुएल लोपेज़ ओब्राडोर इमेज कॉपीरइट Getty Images

लातिन अमरीकी देश मेक्सिको में हाल ही संपन्न राष्ट्रपति चुनाव में लेफ़्ट विंग के उम्मीदवार आंद्रेस मैनुएल लोपेज़ ओब्राडोर ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया है.

चुनाव जीतने के बाद ओब्राडोर ने मेस्किसो में बड़ा बदलाव लाने का वादा किया है लेकिन फ़िलहाल पूरी दुनिया में चर्चा उस बदलाव की हो रही है, जो ओब्राडोर लेकर आए हैं. मेक्सिको में पहली बार वामपंथी उम्मीदवार को राष्ट्रपति बनने का मौका मिला है.

क्या कारण है जब पूरी दुनिया में दक्षिणपंथ की हवा बह रही है, उसी दौर में मेक्सिको में वामपंथ का जादू चल गया?

ओब्राडोर

आंद्रेज़ मैनुएल लोपेज़ ओब्राडोर को लोग उनके नाम के पहले अक्षरों (AMLO) के आधार पर आम्लो कहकर भी पुकारते हैं. पहले दो बार राष्ट्रपति चुनाव में हार का सामना कर चुके ओब्राडोर ने इस बार 53.8 प्रतिशत वोट हासिल करके चुनाव जीता है.

64 साल के ओब्राडोर की लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी को सिर्फ 22.8 प्रतिशत वोट मिले.

आंद्रेज़ मैनुएल लोपेज़ ओब्राडोर की जीत मेक्सिको के लिए कई मायनों में ख़ास है. 70 सालों में यहां दो ही पार्टियों का दबदबा रहा था, कभी रूढ़िवादी नैशनल ऐक्शन पार्टी का शासन रहा तो कभी इंस्टिट्यूशनल रेवलूशनरी पार्टी का. मगर इस बार वामपंथी नेशनल रीजेनेरेशन मूवमेंट पार्टी के नेतृत्व वाले तीन पार्टियों के गठबंधन के उम्मीदवार ओब्राडोर ने यह सिलसिला तोड़ दिया.

लातिन अमरीकी देश ब्राज़ील के साओ पाओलो में रह रहे वरिष्ठ पत्रकार शोभन सक्सेना बताते हैं कि ओब्राडोर की जीत अप्रत्याशित नहीं थी.

ओब्राडोर को भारी जनसमर्थन मिलने के कारणों पर रोशनी डालते हुए शोभन सक्सेना कहते हैं, "मेक्सिको में भ्रष्टाचार बहुत ज्यादा है, ड्रग्स की समस्या भी गंभीर है. वॉर ऑन ड्रग्स से लाखों लोग प्रभावित हुए हैं, लाखों लोग मारे जा चुके हैं. वहां की जनता स्थापित चुनावी पार्टियों से त्रस्त हो चुकी थी. भ्रष्टाचार ड्रग्स को लेकर उन्होंने ख़ास काम नहीं किया था. ऐसे में इस बार आम्लो ने लोगों को भरोसा दिलाया कि उनकी नीतियां बाकी पार्टियों से अलग होंगी. लोगों ने आम्लो को सुना, उनकी बातों पर यकीन किया और उन्हें जिताया भी."

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ओब्राडोर का व्यक्तित्व

ऐसा नहीं है कि ओब्राडोर को उनकी बातों और वादों के आधार पर ही जनता ने चुन लिया या फिर पिछली सरकारों से तंग आकर किसी नए को मौका देने के लिए उन्हें जिता दिया.

शोभन सक्सेना बताते हैं कि ओब्राडोर न सिर्फ लंबे समय से समाजसेवा में सक्रिय हैं बल्कि उनकी पहचान एक अच्छे प्रशासक और बुद्धिजीवी की भी है.

ओब्राडोर के व्यक्तित्व के बारे में शोभन सक्सेना बताते हैं, "ओब्राडोर लंबे समय से ऐक्टिविस्ट हैं. मेक्सिको के ग्रामीण इलाके में उन्होंने बहुत काम किया है वह राजनेता ही नहीं, अच्छे लेखक भी हैं और उन्होंने 14 किताबें लिखी हैं."

"आम्लो बुद्धिजीवी भी हैं, नेता भी हैं, समाजसेवी भी हैं और लेखक भी हैं. इनकी छवि अच्छी रही है. जब वह देश की राजधानी मेक्सिको सिटी के मेयर थे, तब उन्होंने अच्छा काम किया था. लातिन अमेरिका में मेयर का पद बहुत महत्वपूर्ण पद है. ऐसे में इस बार उनका रिकॉर्ड अच्छा देखते हुए ही लोगों ने उन्हें चुनने का फैसला किया."

Image caption आंद्रेस मैनुएल लोपेज़ ओब्राडोर के ट्विटर से ली गई तस्वीर

क्या यह वामपंथ की जीत है?

सेंटर राइट पार्टी से रानजीतिक करियर की शुरुआत करने वाले ओब्राडोर 2002 में वामपंथ से जुड़े थे. इस बार राष्ट्रपति चुनाव के प्रचार अभियान के दौरान उन्होंने ख़ुद को सत्ता-विरोधी के तौर पर पेश किया और अब तक देश में राज करने वाली पार्टियों को 'सत्ता का माफ़िया' करार दिया.

उन्होंने एकदम वामपंथी और जनवादी नीतियों का प्रचार किया और उन्हें भरपूर समर्थन भी मिला. पूरी दुनिया में उनकी जीत को मेक्सिको में वामपंथी राजनीति के उदय के तौर पर देखा जा रहा है. मगर अंतरराष्ट्रीय मामलों पर क़रीबी नजर रखने वाले पुष्पेश पंत कहते हैं कि इसे वामपंथ का उदय भी कहा जा सकता है और पुनर्जन्म भी.

जेएनयू के पूर्व प्रोफ़ेसर पुष्पेश पंत कहते हैं, "मुझे लगता है कि यह निष्कर्ष निकालना तर्कसंगत है कि वामपंथी राजनीति का उदय हो रहा है. हालांकि इसे पुनर्जन्म भी कहा जा सकता है क्योंकि भले ही मेक्सिको में वामपंथ पहली बार सत्तारूढ़ हुआ है मगर लातिन अमरीका में क्रांति की पुरानी परंपरा है, भले ही वह नाममात्र की रही हो मगर जज़्बा वामपंथी ही रहा है."

"जब तक वेनेजुएला में ह्यूगो श़ावेज़ थे, तब तक वह साम्यवाद और समाजवाद गढ़ था. का एकमात्र गढ़ नजर आ रहा था. क्योंकि उस दौर में चीन और रूस ने भी कमोबेश पूंजीवाद का रास्ता अपना लिया था. वेनेजुएला के बाद मेक्सिको में वामपंथियों का जबरदस्त तरीके से सामने आना बताता है कि भूमंडलीकरण के प्रति वहां वितृष्णा है. साथ ही डोनल्ड ट्रंप के बड़बोलेपन और थोड़ी अपमानजनक नीतियो का भी प्रभाव इसमें रहा है. इन हालात में देशप्रेम का स्वर भी उभर आता है. ठीक उसी तरह, जैसे वियतनाम युद्ध में वामपंथ और राष्ट्रप्रेम का मिश्रण सामने आया था."

मेक्सिको में वामपंथ को मिले समर्थन के पीछे पुष्पेष पंत एक और कारण मानते हैं. वह कहते हैं, "लोगों को ऐसा भी लगता है कि वहां पर भ्रष्टाचार का ख़ात्मा वामपंथी पार्टियां ही कर सकती हैं. यह मरीचिका भी हो सकती है. एक भ्रम भी हो सकता है कि लोगों का कि उन्हें लगता हो कि वामपंथी इस मामले में अच्छा करेंगे क्योंकि उन्होंने वामपंथियों के अलावा अन्य पार्टियों की सत्ता वहां पर देख ली है."

हालांकि वह यह भी मानते हैं कि जो कहा जा रहा था कि साम्यवाद ख़त्म हो चुका है, पूंजीवाद की जय हो चुकी है, वह सबकुछ अब मेक्सिको में वामपंथी ओब्राडोर की जीत के बाद ग़लत साबित हो गया है.

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Image caption मेक्सिको में वापमंथी नेता के जीतने के बाद अमरीका के साथ उसके संबंधों पर सभी की नज़र रहेगी

मेक्सिको में वामपंथ

वरिष्ठ पत्रकार शोभन सक्सेना बताते हैं कि मेक्सिको का वामपंथ यूरोप या एशिया के वामपंथ से अलग है. वह बताते हैं, "ओब्राडोर की तुलना कुछ लोग वेनेज़ुएला के पूर्व राष्ट्रपति शावेज़ से कर रहे हैं जो कट्टर वामपंथी थे जबकि कुछ कह रहे हैं कि वह ब्राज़ील के पूर्व राष्ट्रपति लूला की तरह हैं जो वामपंथी होते हुए भी बीच का रास्ता अपनाते थे."

"लातिन अमरीका का वामपंथ चीन या रूस के वामपंथ से अलग है. यहां का वामपंथ चर्च से प्रभावित है. लोगों में यह भावना डालने में चर्च का रोल रहा है कि कैसे ग़रीबों और पिछड़े लोगों की मदद की जाए, उनकी सेवा की जाए."

जिस समय पूरी दुनिया में दक्षिणपंथी रानजीतिक दलों और नेताओं को मिलने वाला जनसमर्थन बढ़ रहा है, उस दौर में मेक्सिको में वामपंथ को जनसमर्थन मिलने का कारण क्या है? इस पर जेएनयू के पूर्व प्रोफ़ेसर पुष्पेश पंत कहते हैं कि मेक्सिको की तुलना बाक़ी देशों से नहीं की जा सकती.

वह कहते हैं, "समझना होगा कि यह पूर्व और पश्चिम का अंतर नहीं बल्कि उत्तर और दक्षिण का भी अंतर है. यह अमीर और ग़रीब समाज का अंतर भी है. भूलना नहीं चाहिए कि मेक्सिको ऐसा देश है जो पूंजीवादी संसार पर निर्भर रहा है. वह पूंजीवादी संसार का हिस्सा रहा है. वहां विकास भी हुआ है. मगर वह आदिवासी बुनियाद की बुलंद इमारत पर खड़ा है."

"भारत में दक्षिणपंथ का उभार अलग कारणों से हुआ है. हो सकता है आप इससे सहमत न हों, यह तुष्टीकरण के खिलाफ उभरा है. उसी तरह रूस समेत गोरे देशों में अश्वेत लोगों के ख़िलाफ दुर्भावना के कारण दक्षिणपंथी कहीं न कहीं एकजुट हुए हैं. वहां का दक्षिणपंथ नस्लभेद के कारण है. ऐसे में वहां के हालात मेक्सिको से अलग हैं."

Image caption ओब्राडोर के ट्विटर से ली गई तस्वीर

ओब्राडोर के सामने क्या हैं चुनौतियां

ओब्राडोर को जहां व्यापक जनसमर्थन हासिल है, वहीं उनके विरोधी उनकी नीतियों को लेकर चिंता जताते हैं. उनका मानना है कि ओब्राडोर की लेफ्टिस्ट और पॉप्युलिस्ट नीतियां मेक्सिको को वेनेज़ुएला की राह पर ले जा सकती हैं, जो कि गहरे आर्थिक संकट और बेहद महंगाई से जूझ रहा है. मगर पुष्पेश पंत मानते हैं कि ओब्राडोर के सामने असल इम्तिहान कुछ और ही हैं.

वह कहते हैं, "लातिन अमरीका में यह दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. वह परानी सांस्कृतिक वारिस रहा है. अब तक की सरकारों की सोच मध्यमार्गी थी कि जो है, वो बना रहे. मगर ओब्राडोर जानबूझकर अपने कश्ती को तूफान में ले जा रहे हैं कि मेक्सिको को इस पार या उस पार करके दिखा देंगे. लेकिन सवाल उठता है कि क्या वह ट्रंप के अमरीका से लोहा ले सकते हैं, जैसे पुतिन ले रहे हैं? ध्यान देना होगा कि मेक्सिको न तो रूस है न क्यूबा. जैसा मिथकीय व्यक्तित्व कास्त्रो का था, मेक्सिको के पास वैसा व्यक्तित्व नहीं है. लोब्राडोरा में भी नहीं हैं. हां, उम्मीदें बहुत हैं."

क्या क़ामयाब हो पाएंगे?

ओब्राडोर ने चुनाव प्रचार अभियान के दौरान तीन प्रमुख वादे किए थे- करप्शन को खत्म करेंगे, ड्रग्स की समस्या सुलझाएंगे और देश को आगे ले जाएंगे. इसके साथ ही उनके सामने अमरीका के साथ बिगड़े रिश्ते सुलझाने की भी जिम्मेदारी होगी. उन्होंने इन समस्याओं के समाधान के लिए पहले की सरकारों से अलग नीति अपनाने की बात कही है. ऐसे में वह क्या रास्ता अपनाएंगे और क्या वह रास्ता कामयाब हो पाएगा?

वरिष्ठ पत्रकार शोभन सक्सेना कहते है, "मेक्सिको सिटी के मेयर के रूप में ओब्राडोर के रिकॉर्ड को देखें तो उन्होंने करप्शन को सीमित किया था. मगर यह किसी भी देश में सिस्टम की समस्या होती है. इसे सिस्टम से बाहर निकालना आसान नहीं है. इस बार यहां तीन चुनाव एकसाथ हुए हैं और बहुत से लोग ऐसे हैं जो पहली बार राजनीति में आए हैं. मेक्सिको में परिवर्तन हुआ है तो उम्मीद जगी है करप्शन पर लगाम लगाई जा सकेगी."

ड्रग्स की समस्या पर शोभन कहते हैं, "जहां तक वॉर ऑन ड्रग्स की बात है, इसमें मेक्सिको अकेला कुछ नहीं कर सकता. ये लातिन अमेरीकी देशों की समस्या है. जब तक अमरीका मेक्सिको की मदद नहीं करेगा, तब तक कुछ होगा नहीं. 1974 में रिचर्ड निक्सन ने इस अभियान को शुरू किया था.""ड्रग्स के कारण पिछले 11 सालों में 2 लाख लोग यहां मारे जा चुके हैं. यह वहां की गंभीर सामाजिक समस्या बन चुकी है, लोग परेशान हो चुके हैं. ओब्रोडार इश दिशा में जो भी काम करेंगे, लोगों से उन्हें मदद मिलेगी. लेकिन ड्रग कार्टल भी मज़बूत हैं, ऐसे में एक भीषण संग्राम होने वाला है सरकार और ड्रग गिरोहों के बीच होगी. हालांकि ओब्राडोर ने अलग तरीका अपनाने की बात की है मगर वह कितना कारगर होगा, वह समय की बताएगा."

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अमरीका से रिश्ते

लोपेज़ के सामने कई चुनौतियां हैं. उन्हें अपने देश की आर्थिक विषमता से जूझना होगा. ग़रीबी से लड़ाई लड़नी होगी, भ्रष्टाचार का मुक़ाबला करना होगा और साथ ही साथ ड्रग्स के खिलाफ जंग फ़तह करनी होगी. यही नहीं, जानकारों का मानना है कि हो सकता है कि अमरीका वामपंथी ओब्राडोर पर दबाव डालने की कोशिश करे. देश की अंदरूनी समस्याओं को सुलझाते-सुलझाते उस बाहरी दबाव का मुकाबला ओब्राडोर कैसे कर पाएंगे, यही उनका असल इम्तिहान होगा.

वरिष्ठ पत्रकार शोभन सक्सेना कहते हैं, "राजनीतिक दृष्टि से देखें तो ट्रंप और ओब्राडोर में कोई समानता नहीं है. लेकिन ट्रंप ने ओब्राडोर को फोन करके बधाई दी और आधे घंटे तक बात की कि दोनों देशों के रिश्ते में कैसे सुधार किया जाए. मेरे विचार से दोनों दृढ़ इच्छाशक्ति वाले नेता नज़र आते हैं और दोनों अपने देश को लेकर चिंतित हैं. ऐसे में वे बाक़ी मामलों पर तो काम कर सकते हैं, मगर माइग्रेशन को लेकर थोड़ी दिक्कत आ सकती है. हालांकि संभव है कि वे मिलकर इन समस्याओं का हल तलाशने की कोशिश करें."

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