क्या उत्तर कोरिया चोरी-छिपे परमाणु कार्यक्रम चला रहा है?

  • 7 जुलाई 2018
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अमरीकी विदेश मंत्री के साथ बीतचीत का दौर ख़त्म होन के बाद उत्तर कोरियाई न्यूज़ एजेंसी ने कहा है कि "अमरीका का रवैया अफ़सोसजनक है."

उत्तर कोरियाई सरकार के एक प्रवक्ता के हवाले से न्यूज़ एजेंसी ने कहा है कि अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए जो मांगें कर रहे हैं वो एकतरफा हैं.

माइक पोम्पियो शुक्रवार को दो दिवसीय यात्रा पर उत्तर कोरिया पहुंचे थे, जहां उन्होंने उत्तर कोरिया के आला नेताओं से मुलाक़ात की. इसके बाद वो जापान के लिए रवाना हो गए.

उत्तर कोरिया के बयान से ठीक पहले पोम्पियों ने कहा था कि उत्तर कोरिया के साथ उनकी बातचीत "सकारात्मक" रही है.

उत्तर कोरिया की मंशा पर उठे सवाल

हाल में सिंगापुर में किम जोंग-उन और अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की मुलाक़ात हुई थी.

दोनों नेताओं के बीच इस बात पर सहमति बनी कि उत्तर कोरिया अपना परमाणु कार्यक्रम बंद करेगा.

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लेकिन हाल में अमरीकी मीडिया में इस तरह की ख़बरें आईं कि उत्तर कोरिया परमाणु निरस्त्रीकरण के अपने वायदे से मुकर रहा है और अपने परमाणु कार्यक्रम को गोपनीय तरीके से आगे बढ़ा रहा है.

इस ख़बर के बाद सिंगापुर में बनी सहमति को लेकर उत्तर कोरिया की मंशा पर सवाल उठने लगे.

अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसियों के गोपनीय दस्तावेज़ों के अनुसार पहले की तरह उत्तर कोरिया का परमाणु कार्यक्रम जारी है और वो यूरेनियम संवर्धन कर रहा है.

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Image caption योंगब्योन परमाणु संयंत्र

अमरीकी मीडिया के अनुसार उत्तर कोरिया योंगब्योन परमाणुं संयंत्र की क्षमता बढ़ा रहा है जो आधिकारिक तौर पर देश का एकमात्र यूरेनियम संवर्धन प्लांट है.

अमरीकी मीडिया का दावा है कि योंगब्योन के अलावा और दो गुप्त ठिकानों पर ये काम चल रहा है. साथ ही उत्तर कोरिया बैलस्टिक मिसाइल लांच प्रणाली भी बना रहा है.

वो ठोस परमाणु ईंधन इस्तेमाल करने वाले मिसाइलों का उत्पादन बढा रहा है.

मीडिया में आ रही ख़बरें कितनी भरोसेमंद?

ये सही बात है कि ये आधिकारिक बयान नहीं है. लेकिन इन रिपोर्टों को उत्तर कोरिया मामलों पर नज़र रखने वाले जानकार बिल्कुल सही मानते हैं.

ये रिपोर्ट अमरीकी ख़ुफ़िया समुदाय के अज्ञात स्रोतों और 38 नॉर्थ नाम की एक वेबसाइट पर प्रकाशित योंगब्योन की पर आधारित थी.

मेसाच्यूसेट इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलॉजी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर और प्रसार मामलों में जानकार विपिन नारंग कहते हैं, "इनमें से कोई भी हरकत किम जोंग-उन और डोनल्ड ट्रंप के बीच सिंगापुर में बनी सहमति का उल्लंघन नहीं है."

इस मुलाक़ात में उत्तर कोरिया ने कोरियाई प्रायद्वीप पर परमाणु निरस्त्रीकरण का वादा किया था लेकिन ये कई चरणों में होना था. लेकिन इसमें विस्तार से कुछ नहीं बताया गया था.

नारंग करते हैं, "ये एकतरफा या अचानक होने वाला काम नहीं है और इसीलिए किम जोंग-उन मौजूदा परमाणु संयंत्रों में काम जारी रखने के लिए आज़ाद हैं."

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लेकिन उत्तर कोरिया के परमाणु संयंत्र में काम जारी रहने की ख़बरों को सम्मेलन की मूल भावना के ख़िलाफ़ देखा जा रहा है. इस तरह की बातें होने लगीं कि क्या वाकई उत्तर कोरिया परमाणु निरस्त्रीकरण करेगा.

'द दिप्लोमैट' मैगज़ीन के संपादक अंकित पंडा कहते हैं, "आम तस्वीर ये है कि किम जोंग-उन ने जैसा जनवरी में कहा था, उत्तर कोरिया ने अपने परमाणु कार्यक्रम को बंद नहीं किया है. उन्होंने कहा था कि वो परमाणु विस्फोटक और बैलिस्टिक मिसाइलें बनाने का काम जारी रखेंगे."

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क्या है ताज़ा जानकारी?

ठोस परमाणु ईंधन वाले रॉकेट को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना आसान होता है और ये उत्तर कोरिया के लिए नई उपलब्धि है. इसके साथ ही मोबाइल लॉच प्लेटफॉर्म के ज़रिए उत्तर कोरिया ऐसी जगहों से मिसाइल छोड़ सकता है जिनका आसानी से दक्षिण कोरिया और अमरीका को पता नहीं चल पाएगा.

लेकिन फिलहाल जो सबसे ताज़ा जानकारी सामने आई है वो ये है कि उनके पास गुप्त यूरेनियम एनरिचमेंट प्लांट हैं. उत्तर कोरिया ने योंगब्योन परमाणु संयंत्र के होने की बात आधिकारिक तौर पर मानी है.

अब तक इसका संदेह मात्र था. एनबीसी पर आई एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में अमरीकी ख़ुफ़िया विभाग के हवाले से योंगब्योन के अलावा एक और का नाम बताया गया था और एक और जगह के बारे में शंका ज़ाहिर की गई थी.

नारंग बताते हैं, "आप उत्तर कोरिया की रणनीति के बारे में जान सकते हैं. एक तरफ उन्होंने अपने कुछ सेंटर के नाम बताए हैं और उन्हें बंद करने की पेशकश की है और इसके एवज़ में खुद पर लगे प्रतिबंधों को हटवाना चाहते हैं. लेकिन दूसरी तरफ वो इन गुप्त ठिकानों पर अपना काम पहले की तरह आगे बढ़ा रहे हैं."

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Image caption उत्तर कोरिया की दो दिन की यात्रा के बाद शनिवार को माइक पोम्पियो जापान के टोक्यो पहुंचे

ये बिल्कुल संभव है कि जो जानकारी अभी लीक हुई है उसके बारे में अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसियों को पहले से ही पता हो. और ये भी संभव है कि ट्रंप को इस बारे में सिंगापुर में मुलाक़ात से पहले ही जानकारी दे दी गई हो.

ग्रिफिथ एशिया इंस्टीट्यूट में एडजंक्ट रिसर्च फैलो आंद्रे अब्राह्मियन उत्तर कोरिया मामलों के जानकार हैं. वो कहते हैं, "हाल में जो लीक दस्तावेज़ हैं वो अंदाज़ा देते हैं कि ये जानबूझ कर की गई कोशिश है ताकि ख़ुफ़िया जानकारी आम लोगों तक पहुंचाई जाए."

जानकार मानते हैं कि इसका उद्देश्य उत्तर कोरिया पर दवाब बनाना हो सकता है. अमरीकी ख़ुफ़िया तंत्र की पहुंच के बारे में बता कर अमरीका उत्तर कोरिया पर दवाब बना सकता है कि वो अपने गुप्त ठिकानों के बारे में जानकारी साझा करे.

अंकित पंडा कहते हैं, "हमेशा से ही माना जा रहा था कि हम उत्तर कोरिया को अपने परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी जानकारी पहले साझा करने दें फिर ख़ुफ़िया सूत्रों से मिली जानकारी के साथ उसकी तुलना करें और आपको तुरंत पता चल जाएगा कि वो सही मायनों में क्या करना चाहते हैं."

"इसके बाद गेंद उनके पाले में छोड़ दी जाए और देखा जाए कि क्या वो सारी जानकारी, यानी गुप्त ठिकानों की जानकारी भी साझा करते हैं या नहीं."

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लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि क्या सिंगापुर सम्मेलन के बाद उत्तर कोरिया पर इस तरह का दवाब काम करेगा.

नारंग कहते हैं, "उत्तर कोरिया ये जानता है कि चीन उसके ख़िलाफ़ कड़े प्रतिबंध लगाने का समर्थन नहीं करता और चीन की मदद के बिना अमरीका अकेला ज़्यादा कुछ नहीं कर पाएगा."

किम जोंग-उन बड़ी आसानी से कह सकते हैं, "मैंने अपने देश पर लग रहे प्रतिबंधों को ख़त्म करने का प्रयास किया है और मुझे लगता है कि मैंने जो किया ठीक किया."

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