पाकिस्तान में मीडिया कि​तना आज़ाद है?

  • 12 जुलाई 2018
पाकिस्तान, पाकिस्तानी मीडिया, पाकस्तान चुनाव, नवाज़ शरीफ़, पाकिस्तानी सेना इमेज कॉपीरइट AFP/GETTY IMAGES

पाकिस्तान में 25 जुलाई को आम चुनाव होने वाले हैं. बयानबाज़ी जारी है और जनता अपने वोट का फैसला कर रही है.

लेकिन चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले मीडिया को कुछ प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है.

पाकिस्तान में मीडिया पर प्रतिबंधों और पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर लगातार चिंता जताई जाती रही है. कई मीडिया समूहों को प्रसारण बंद होने से लेकर पत्रकारों के अपहरण तक काफी कुछ झेलना पड़ा है.

हाल के महीनों में, आज़ाद ख़्याल माने जाने वाले अख़बार डॉन और न्यूज चैनल जिओ को पाकिस्तान में प्रभावशाली सेना के ख़िलाफ़ टिप्पणी करने का ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा था.

यहां तक कि सेना की आलोचना करने वाले पत्रकारों पर भी हमले किए गए हैं.

हालांकि, सेना मीडिया पर ऐसे किसी नियंत्रण से इनकार करती है.

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मीडिया की आजादी का हाल

पाकिस्तान में मीडिया की आज़ादी पर सवाल उठते रहे हैं और सेना की बुमिश्कल होने वाली आलोचना के भी उन्हें परिणाम भुगतने पड़ते हैं.

रिपोर्ट्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) की ओर से साल 2018 में प्रकाशित वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में पाकिस्तान को 180 देशों में से 139वां स्थान दिया गया है.

वॉचडॉग फ्रीडम हाउस का कहना है कि सेना ''मीडिया को धमकाती है और अपनी ताकत का विवेकहीन व मनचाहा इस्तेमाल करती है जिस पर कोई रोक नहीं है.''

वहीं, जून में सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ गफूर ने कहा था कि सेना ने किसी भी मीडिया समूह पर दबाव डालने की कोशिश नहीं की है और उसे राजनीति में नहीं खींचा जाना चाहिए.

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विरोध प्रदर्शनों की कवरेज

पाकिस्तानी मीडिया को सेना की तय की गई लाइन से हटने पर भी बुरे नतीजे भुगतने पड़ते हैं.

साल 2018 के शुरुआती महीनों में पाकिस्तान में पश्तून तहफ़्फ़ुज़ (सुरक्षा) आंदोलन (पीटीएम) की कवरेज पर बड़े स्तर पर सेंसरशिप लगाई गई थी.

यह आंदोलन पाकिस्तान के आदिवासी इलाकों और अन्य जगहों से बड़े पैमाने पर लोगों के लापता होने और कथित ग़ैरन्यायिक हत्याओं के ख़िलाफ़ शुरू किया गया था.

अप्रैल में इसे लेकर सौ प्रतिष्ठित पत्रकारों ने मीडिया पर बढ़ रहे दबाव को लेकर एक ऑनलाइन बयान जारी किया था. उनका कहना था कि अधिकारों से जुड़े आंदोलनों की कवरेज को लेकर मीडिया पर रोक लगाई जा रही है. उनकी इस बात का संदर्भ पीटीएम से भी था.

पाकिस्तान में इस तरह सेना की आलोचना बहुत कम देखने को मिलती है.

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डेली टाइम्स अख़बार के संपादक रज़ा रूमी ने अपने एक लेख ''ए सीजन ऑफ सेल्फ-सेंसरशिप'' में ये बात स्वीकारी भी थी.

उन्होंने लिखा था, ''पेशावर में पीटीएम की रैली को टीवी चैनलों ने पूरी तरह नजरअंदाज किया था. कुछ ही मीडिया समूहों ने इस पर रिपोर्ट देने की हिम्मत दिखाई थी... बाद में हम बहुत हिचकिचाहट के साथ पीटीएम से जुड़ी ख़बरें दे रहे थे ताकि कुछ भी ऐसा न हो जो उन्हें नाराज कर दे.''

ख़बरों पर सेंसरशिप के मसले को उठाने वाले लोगों में से एक मुशर्रफ़ ज़ैदी ने कहा कि एक प्रमुख अख़बार द न्यूज ने उनका कॉलम प्रकाशित करने से इनकार कर दिया था. उन्होंने बताया कि ऐसा एक दशक में पहली बार हुआ था.

पेशावर में चलने वाले पीटीवी में प्रेजेंटर सना एजाज़ ने मई में बताया कि पीटीएम से जुड़े होने के कारण उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया था.

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Image caption सेनाध्यक्ष जनरल क़मर जावेद बाजवा

सत्ता विरोधी आवाज़ों पर हमला

सेना की आलोचना से जुड़ा कुछ भी प्रकाशित करने पर मीडिया हाउस को निशाना बनाने को लेकर पाकिस्तान में बड़े स्तर पर चिंता जताई जा रही है.

प्रमुख उर्दू चैनल जिओ अप्रैल में अचानक देश के कई हिस्सों में दिखना बंद हो गया था.

इस पर नज़र रखने वालों का कहना है कि इसके आदेश सेना की तरफ से दिए गए थे, जिसका केबल ​डिस्ट्रिब्यूशन नेटवर्क पर काफी प्रभाव है.

इसके पीछे ये वजह बताई गई कि चैनल पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के उन बयानों को काफी समय दे रहा था जो साल 2017 में उन्हें अयोग्य करार दिए जाने के बाद न्यायपालिका और सेना के ख़िलाफ़ दिए गए थे.

इसके अलावा साल 2014 में भी तब चैनल अस्थायी तौर पर अनुपलब्ध हो गया था जब उनके जाने-माने प्रेजेंटर हामिद मीर पर हमला किया गया था. हामिद के परिवार ने उनकी हत्या के लिए खुफ़िया एजेंसियों को जिम्मेदार ठहराया था.

जिओ न्यूज ने 5 मार्च को अपने दर्शकों के लिए एक ट्वीट पिन किया था कि अगर उन्हें टीवी पर चैनल न दिखाई दे या उसका चैनल नंबर बदल गया हो तो उसकी शिकायत करें.

साथ ही इसी मीडिया समूह के अख़बारों जंग और द न्यूज की कॉपियां न मिलने पर भी शिकायत करने के लिए कहा गया था.

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वहीं, सबसे ज्यादा बिकने वाले अख़बार डेली डॉन को भी मई में नवाज़ शरीफ़ का इंटरव्यू छापने के बाद कई जगहों पर सर्कुलेशन में समस्या का सामना करना पड़ रहा है.

इस इंटरव्यू में शरीफ़ ने मुंबई हमलों के मुकदमे में देरी के लिए परोक्ष तौर पर पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया था और ये बात सेना को परेशान करने वाली हो सकती है.

डॉन के प्रबंधन ने बार-बार अपने पाठकों को इस परेशानी के बारे में बताया है, लेकिन ये भरोसा भी दिलाया है कि "सभी बाधाओं के बावजूद" वह मजबूत होगा.

कुछ समय पहले ये अख़बार अपनी 2016 की एक रिपोर्ट को लेकर विवादों में घिर गया था. इस रिपोर्ट में एक उच्च स्तरीय सुरक्षा बैठक के दौरान सेना और सरकारी अधिकारियों के बीच अनबन होने का दावा किया गया था.

डॉन अपने इस दावे पर कायम रहा लेकिन यह ख़बर लिखने वाली पत्रकार सिरिल अलमेडा के विदेश जाने पर रोक लगा दी गई थी.

पाकिस्तान में विदेशी मीडिया पर भी प्रतिबंध लगाए गए हैं. जनवरी में ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के निर्देशों पर प्रशासन ने अमरीका समर्थित पश्तो भाषा में चलने वाले रेडियो मशाल को बंद कर दिया था.

उस पर आतंकवाद विरोधी प्रयासों को लेकर पाकिस्तान की खराब छवि दिखाने का आरोप था.

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Image caption गुल बुखारी पाकिस्तानी फ़ौज की मुखर आलोचक रही हैं

पत्रकारों के लिए ख़तरे

इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स का कहना है कि पत्रकारों के लिए पाकिस्तान बेहद ख़तरनाक देशों में से एक है.

जनवरी में, सेना के मुखर आलोचक पत्रकार ताहा सिद्दीक़ी के अपहरण की कोशिश की गई थी. बाद में उन्होंने पाकिस्तान छोड़ दिया.

अप्रैल में जिओ न्यूज के प्रेजेंटर के इस्लामाबाद स्थित घर में हथियारबंद लोगों ने घुसने की कोशिश की थी.

ये घटना ठीक तब हुई जब उन्होंने कुछ देर पहले ही जंग की वेबसाइट पर सेना के चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश को लेकर एक लेख पोस्ट किया था.

वहीं, जून की शुरुआत में सेना की एक और आलोचक गुल बुखारी को लाहौर से अगवा कर लिया गया था. पाकिस्तानी फ़ौज ने इस घटना में किसी भी भूमिका से इनकार किया था.

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क्या कहता है मीडिया

पाकिस्तानी मीडिया समूह और अधिकारों पर काम करने वाली संस्थाएं पत्रकारों पर लगने वाले प्रतिबंधों और उत्पीड़न पर चिंता व्यक्त करते हैं.

आरएसएफ और पाकिस्तान में उनके सहयोगी फ्रीडम नेटवर्क ने कार्यकारी प्रधानमंत्री नसिरुल मुल्क को इसी संबंध में 25 जून को एक पत्र लिखा था.

पत्र में उन्होंने लिखा था कि धमकियों, अपहरण, मारपीट, अवैध निलंबन और वितरण में रुकावट के ज़रिये सेना, ख़ुफ़िया एजेंसियां और राजनेता मीडिया को परेशान कर रहे हैं.

पाकिस्तान की फेडरल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट ने मीडिया सेंसरशिप के ख़िलाफ़ अभियान शुरू किया है. वहीं सेना को ज़िम्मेदार ठहराए बिना डॉन ने इस मामले में उच्च स्तरीय अधिकारियों से दखल देने की मांग की है.

27 जून को डॉन में छपे एक संपादकीय 'टार्गेटिंग डॉन' में लिखा गया, ''ऐसा लगता है कि देश के अंदर मौजूद तत्व ये नहीं मानते कि संविधान और उसमें दी गई आज़ादी को बनाए रखना उनकी जिम्मेदारी है.''

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