थाईलैंड: गुफा में फंसने का बच्चों के दिमाग़ पर क्या होगा असर

  • 10 जुलाई 2018
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थाईलैंड की टैम लूंग गुफा में फंसी बच्चों की एक फुटबॉल टीम और उनके कोच को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए बीते कुछ दिनों से बचाव अभियान चलाया जा रहा था.

अब सभी बच्चों और कोच को इस गुफा से सुरक्षित निकाला जा चुका है.

थाईलैंड: गुफा में फंसे सभी बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाला गया

लेकिन सवाल ये उठता है कि गुफा से सुरक्षित बाहर निकाले गए इन बच्चों के दिमाग़ पर इस घटना के दूरगामी असर किस रूप में सामने आएंगे.

गुफा से निकाले बच्चों के बारे में उनके माता-पिता को क्यों नहीं बताया गया?

कैसी है गुफा से बाहर आए बच्चों की सेहत

थाईलैंड के स्वास्थ्य अधिकारियों ने बताया है कि बाहर निकाले गए बच्चों की हालत ठीक है.

कुछ बच्चों के फेफड़ों में संक्रमण की आशंका जताई जा रही है और उन्हें डॉक्टरों की निगरानी में रखा गया है.

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हालांकि, किसी बच्चे के स्वास्थ्य से जुड़ी किसी बड़ी परेशानी की बात फ़िलहाल सामने नहीं आई है.

मानसिक हालत पर असर

इन बच्चों की सेहत से जुड़े कुछ सवाल और भी हैं.

क्या हफ़्तों तक अंधेरी गुफा में रहने के बाद बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर कोई असर पड़ेगा?

क्या उन्हें लंबे वक़्त तक किसी परेशानी का सामना करना पड़ेगा?

किसी अंधेरी, सुनसान जगह में हफ़्तों फंसे रहने का एक बच्चे के दिमाग पर कैसा असर पड़ता है?

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ब्रिटेन के किंग्स कॉलेज यूनिवर्सिटी में चाइल्ड साइकियाट्रिक्स डॉ. एंड्रिया डानेज़ी के मुताबिक़ चूंकि ये बच्चे ऐसे हालात से होकर गुज़रे हैं जहां वो ज़िंदगी और मौत के बीच में झूल रहे थे इसलिए सुरक्षित बाहर आने के बाद भी उन्हें कुछ भावनात्मक परेशानियों का सामना कर पड़ सकता है.

बात-बात पर रोने की आदत

डॉक्टर एंड्रिया के मुताबिक़ ऐसा हो सकता है कि इन्हें बात-बात पर रोना आए और वो पल भर के लिए भी अपने माता-पिता का साथ न छोड़ें.

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अगर इसके दूरगामी असर की बात करें तो भयानक हालात में फंसने के बाद लोगों में डिप्रेशन, एंग्ज़ाइटी और पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर जैसी तकलीफ़ों की आशंका बढ़ जाती है.

बच्चों पर पीटीएसडी का असर

पोस्ट ट्रॉमैटिक डिसऑर्डर में बच्चे उस घटना और उससे जुड़ी चीजों को दोबारा याद नहीं करना चाहते.

हालांकि बुरी यादों को भुलाना आसान नहीं होता क्योंकि घटना से जुड़ी कोई न कोई बात सामने आती ही रहती है.

क्योंकि थाईलैंड की घटना पर दुनिया भर की निगाह थी इसलिए मीडिया, स्कूल, परिवार और दोस्त बच्चों से बार-बार सवाल पूछेंगे और उन्हें चीजें बार-बार याद आएंगी.

ऐसी हालत में मुमकिन है कि बच्चे अप्रिय सवालों और यादों से बचने के लिए खुद को लोगों से अलग-थलग कर लें.

अंधेरे के प्रति नफ़रत का भाव

चूंकि ये बच्चे लंबे वक़्त तक अंधेरी गुफा में रहे हैं इसलिए मुमकिन है कि वो अंधेरे से नफ़रत करने लग जाएं क्योंकि ये उन्हें गुफा में फंसे होने और बचाव अभियान की याद दिलाएगा.

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इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए ज़रूरी है कि बच्चों और उनके कोच को मनोवैज्ञानिक सलाह और मदद मुहैया कराई जाए.

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मदद की दरकार

ज़िंदगी में किसी ऐसे हादसे से गुज़रने के बाद लोगों को ज़िंदगी को वापस पटरी पर लाने के लिए मदद की दरकार होती है.

प्रोफ़ेशनल मनोवैज्ञानिक की मदद से इन बच्चों को नकारात्मक विचारों में फंसे बिना अप्रिय स्थितियों का सामना करने में सहजता हासिल होगी.

ऐसी स्थितियों में अंधेरा और अपने अनुभवों के बारे में बात करने जैसी चीज़ें शामिल हैं.

साल 2010 में चिली में खान में काम करने वाले मज़दूरों के साथ भी ऐसे ही लक्षण देखे गए थे.

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इन मज़दूरों के लिए एक खान में फंसना कोई आसान घटना नहीं थी. लेकिन उनके पेशे और ट्रेनिंग की वजह से उन्होंने ऐसी परिस्थिति से बचने के लिए तैयारी की होगी.

लेकिन थाईलैंड की गुफा में फंसने वाले बच्चों के लिए ये घटना पूरी तरह से अप्रत्याशित थी. इस वजह से इन बच्चों में मानसिक अवसादों के शिकार होने का ख़तरा ज़्यादा है.

किसी भी तरह से इन बच्चों के लिए रोजमर्रा की ज़िंदगी में वापस लौटना मुश्किल होगा.

ज़िंदगी बचाने गए थे मगर ख़ुद ज़िंदगी हार गए

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