क्या अमरीका की तर्ज़ पर भारत पर दबाव बनाना चाहता है ईरान?

रूहानी और मोदी

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ईरान के साथ हुए वैश्विक परमाणु समझौते से बाहर आने के अमरीका के फ़ैसले के बाद अमरीका और ईरान के बीच तनातनी का असर बाक़ी दुनिया पर दिखना भी शुरू हो गया है.

डोनल्ड ट्रंप की सरकार ने ईरान पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए हैं. अब अमरीका चाह रहा है कि अन्य देश भी उसकी राह पर चलते हुए ईरान पर दबाव डाले.

भारत में ईरान के राजनयिक मसूद रजवानियन रहाग़ी ने एक सेमिनार में कहा कि अगर भारत अन्य देशों की तरह ईरान से तेल का आयात कम करके अन्य देशों से आयात करता है तो ईरान उसे मिलने वाले विशेष लाभों को वापस ले लेगा.

उन्होंने यह भी कहा कि चाबहार बंदरगार से जुड़ी परियोजनाओं को लेकर भारत ने अपने निवेश के वादे पूरे नहीं किए हैं.

ईरान के राजनयिक के इस तरह से बयान देने के मायने क्या हैं? क्या अमरीका के बाद अब ईरान ने भी भारत पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है?

इन सवालों को लेकर बीबीसी संवाददाता आदर्श राठौर ने बात की अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और सऊदी अरब में भारत के राजदूत रहे तलमीज़ अहमद से. पढ़िए उनका नज़रिया उनके शब्दों में:

भारत को अपने हिसाब से चलाने की कोशिश

भारत में कूटनीतिक प्रतियोगिता चल रही है, जिसमें ईरान और अमरीका दोनों शामिल हैं. ये दोनों भारत पर दबाव डालना चाहते हैं ताकि वह उनके हिसाब से आगे बढ़े.

कुछ दिन पहले संयुक्त राष्ट्र में अमरीकी राजदूत निकी हेली भारत आई थीं. उन्होंने कोशिश की थी कि अमरीका ने ईरान पर जो प्रतिबंध लगाए हैं, भारत उन्हें फॉलो करे. उस समय बयान था कि ईरान से तेल का आयात पूरी तरह बंद कर दिया जाए.

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निकी हेली भारत के तीन दिन के दौरे पर आई थीं

ईरान अब कोशिश कर रहा है कि भारत के क़दम न डगमगाएं और वह अपने वादे पूरे करे.

ईरान से तेल आयात कम कर सकता है भारत?

इसमें दो बातें हैं. पहली बात है तेल की ख़रीददारी. भारत सऊदी अरब और कुवैत जैसे देशों से तेल खरीद सकता है, लेकिन जितनी मात्रा में तेल भारत को चाहिए, वह आसानी से नहीं मिलेगा.

ईरान अभी हमें सिर्फ आगाह कर रहा है कि आप हमसे पुराना रिश्ता बहाल रखिएगा.

भारत के विदेश मंत्री ने कुछ सप्ताह पहले कहा था कि हमारा देश किसी देश के लगाए गए प्रतिबंधों को मान्यता नहीं देता, बस संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों को मानता है.

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हमारे तेल मंत्री का भी कहना था कि भारत अपने हितों को ध्यान में रखते हुए फ़ैसला लेगा.

मेरे विचार से हमारा तेल ख़रीदने का रिश्ता बदलेगा नहीं. हम अपनी ज़रूरतों के हिसाब से आगे बढ़ना जारी रखेंगे.

हो सकता है कि निकट भविष्य में तेल का आयात थोड़ा कम हो जाएगा लेकिन ऐसा ज्यादा समय तक नहीं रहेगा.

चाबहार प्रॉजेक्ट पर क्या भारत का रवैया

चाबहार की बात करें तो यहां भारत पूरी तरह से प्रतिबद्ध है. भारत के लिए यह परियोजना और उसके जरिए भारत की कनेक्टिविटी अहमियत रखती है. मेरे विचार से यह प्रोजेक्ट आगे बढ़ेगा.

दिल्ली में कुछ लोग कह रहे हैं कि अमरीका शायद चाबहार प्रोजेक्ट को प्रतिबंधों से अलग रखे.

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अमरीका की सोच समझ में नहीं आ पा रही. क्योंकि पहले तो ट्रंप ने कहा था कि शून्य आयात होना चाहिए. बाद में बयान आया कि शून्य आयात तो संभव नहीं है.

अमरीका की स्थिति थोड़ी नरम होगी भविष्य में लेकिन किस हद होगी, कहना मुश्किल है.

लगता है कि यह कूटनीतिक आतिशबाजी चल रही है दिल्ली में अमरीका और ईरान की. दोनों तरफ के राजनयिक कोशिश कर रहे हैं कि उनकी बात मानी जाए.

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