मैनचेस्टर के छात्रों ने किपलिंग की कविता पर उठाए सवाल

  • 21 जुलाई 2018
फ़ातिमा अबिद उन छात्रों में से एक हैं जिन्होंने रुडयार्ड किपलिंग की कविता को दीवार से साफ किया. इमेज कॉपीरइट SARA KHAN
Image caption फ़ातिमा अबिद उन छात्रों में से एक हैं जिन्होंने रुडयार्ड किपलिंग की कविता को दीवार से साफ किया

ब्रिटेन की मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी की एक दीवार पर प्रसिद्ध कवि रुडयार्ड किपलिंग की एक कविता को भारतीय मूल के छात्रों ने दीवार से साफ़ कर दिया है.

छात्रों का कहना है कि वो कविता के शब्दों से आहत हुए हैं और इस कारण उन्होंने इसे दीवार से मिटा दिया है.

भारतीय मूल के छात्रों का मानना है कि अंग्रेज़ी कवि और लेखक रुडयार्ड किपलिंग की कविता 'इफ़' में नस्लीय टिप्पणियां की गई हैं और ये भारत में ब्रितानी हूकूमत का समर्थन भी करती है.

किपलिंग ने 'इफ़' कविता साल 1895 में लिखी थी. इस कविता को मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी की यूनियन बिल्डिंग की एक नई दीवार पर लिखा गया था.

दीवार से कविता को साफ़ करने के बाद छात्रों ने इसकी जगह अमरीकी कवि और नागरिक अधिकारों की कार्यकर्ता माया एंजेलो की एक कविता 'स्टिल आई राइज़' को पेंट कर दिया है.

कविता में 'नस्लीय भेदभाव'

इस घटना के बाद यूनिवर्सिटी यूनियन ने भी इस बात के लिए माफ़ी मांगी है कि उन्होंने दीवार पर कविता लिखने से पहले छात्रों से सलाह मशविरा नहीं किया.

यूनिवर्सिटी में छात्र संघ की डायवर्सिटी ऑफ़िसर रिद्दि विश्वनाथन का कहना है कि छात्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्यों को ऐसा महसूस हुआ कि किपलिंग की कविता नस्लीय भेदभाव को बढ़ावा देने वाली थी.

रिद्दी विश्वनाथन ने कहा, "यह हमारे लिए बहुत ज़रूरी है कि काले और सांवले छात्रों की आवाज़ सुनी जाए और उनका भी प्रतिनिधित्व हो, यही वजह है कि हमें रुडयार्ड किपलिंग की कविता यहां उचित नहीं लगी."

यूनियन में लिबरेशन और एक्सेस ऑफ़िसर सारा ख़ान ने अपने फ़ेसबुक पोस्ट पर लिखा है कि किपलिंग का नस्लीय काम अंग्रेज शासन का समर्थन करता है जबकि माया एंजेलो की कविता उन लोगों का प्रतिनिधित्व करती है जिन्हें सालों तक शोषित किया गया है.

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Image caption छात्रों ने किपलिंग की कविता की जगह माया एंजेलो की कविता दीवार पर पेंट कर दी uw

हालांकि दूसरी तरफ कुछ लोगों का मानना है कि किपलिंग को नस्लवादी व्यक्ति के तौर पर पेश करना ग़लत है.

केंट यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर और साल 2007 में किपलिंग पर एक किताब लिख चुके लेखक जैन मोन्टेफ़ोयर का कहना है, "रुडयार्ड किपलिंग को नस्लवाद मानने वाला व्यक्ति कहना बहुत ही गिरा हुआ काम है."

यह बात भी दिलचस्प है कि यूनिवर्सिटी की जिस बिल्डिंग की दीवार पर किपलिंग की कविता लिखी गई थी वह दक्षिण अफ़्रीकी नेता और रंगभेद के ख़िलाफ़ अभियान चलाने वाले स्टीव बीको के नाम पर बनी बिल्डिंग है.

नाराज़ छात्रों ने 13 जुलाई को पहले तो उस कविता को सफ़ेद पेंट से साफ़ किया उसके बाद 16 जुलाई को संघ की कार्यकारी समिति के ज़रिए चुनी गई माया एंजेलो की कविता को दीवार पर लिख दिया.

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Image caption रुडयार्ड किपलिंग

भारत में जन्मे किपलिंग

किपलिंग का जन्म साल 1865 में मुंबई में हुआ था. वे भारत में अंग्रेज़ी राज का समर्थन करने के लिए भी जाने जाते रहे हैं.

उन्हें 'द जंगल बुक' की वजह से काफी प्रसिद्धि मिली. साल 1907 में वे साहित्य का नोबल पुरस्कार प्राप्त करने वाले अंग्रेजी भाषा के पहले लेखक बने.

किपलिंग के बारे में प्रोफ़ेसर मोन्टेफ़ोयर कहते हैं, "उनकी राजनीतिक विचारधारा भले ही एकपक्षीय हो लेकिन यह अधूरी कहानी ही है."

"उन्होंने बहुत शानदार चीज़ें लिखी हैं और वे बेहतरीन कहानीकार थे लेकिन ऐसा भी नहीं है कि वे हमेशा ही शानदार कविताएं लिखते रहे हों."

प्रोफ़ेसर मोंटेफ़ोयर किपलिंग की साल 1899 में लिखी गई 'द व्हाइट मैन्स बर्डन' के बारे में कहते हैं कि इस कविता में उन्होंने फिलिपींस में अमरीकी अधिकारियों से शाही प्रथा शुरू करने की बात कही थी. उनके इन विचारों से उस समय भी कुछ लोग सहमत नहीं थे और आज तो कोई भी सहमत नहीं होगा.

छात्र संघ के एक प्रवक्ता ने कहा कि वे आने वाले वक्त में कैम्पस की दीवारों पर और अधिक नए विचारों से युक्त कविताओं को पेंट करेंगे.

इस पूरी घटना पर मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी का कहना है कि यूनियन अपने फ़ैसले लेने के लिए स्वतंत्र है और यूनिवर्सिटी प्रशासन इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता.

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