ये हैं पाकिस्तान की राजनीति के अहम खिलाड़ी

  • 21 जुलाई 2018
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Image caption नवाज़ शरीफ़ और उनकी बेटी मरियम नवाज़

पाकिस्तान में 25 जुलाई को आम चुनाव होने जा रहे हैं. पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के भ्रष्टाचार के मामले में जेल जाने के बाद पाकिस्तान की सियायत में भारी उथल-पुथल है. हालाँकि उनकी पार्टी मुस्लिम लीग (नवाज़) को अब भी सत्ता की दौड़ में माना जा रहा है.

एक नज़र उन पाकिस्तान की उन पार्टियों पर जो सत्ता की रेस में हैं.

मुस्लिम लीग (नवाज़)

पीएमएल-एन निवर्तमान सत्ताधारी पार्टी है जिसके अध्यक्ष पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के भाई शहबाज़ शरीफ़ हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने नवाज़ शरीफ़ पर सार्वजनिक पद पर होने या पार्टी के अध्यक्ष पद पर रहने पर रोक लगा दी है. पीएमएल-एन पाकिस्तान की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है और ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की उत्तराधिकारी होने का दावा करती है.

पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत पंजाब पार्टी का गढ़ है और कई बड़े व्यापारी इसके नेता है.

पीएमएल-एन तीन बार केंद्र और पंजाब प्रांत की सत्ता में रही है. 1992 में पाकिस्तान मुस्लिम लीग के विभाजन के बाद पीएमएल-एन अस्तित्व में आई थी.

नवाज़ शरीफ़ पर पूर्व सैन्य शासक ज़िया उल हक़ का क़रीबी होने का आरोप लगता रहा है. ज़िया उल हक़ ने ही साल 1981 में नवाज़ शरीफ़ को संसद के लिए नामित करके उनका राजनीतिक करियर आगे बढ़ाया था.

1999 में पाकिस्तान में हुए सैन्य तख़्तापलट के बाद पीएमएल-एन को सत्ता से हटा दिया गया था और पार्टी नेताओं के सऊदी अरब में शरण लेनी पड़ी थी. आठ साल के निर्वासन के बाद साल 2013 में पार्टी फिर से सत्ता में आ गई.

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Image caption नवाज़ शरीफ़ की पार्टी पीएमएल-एन का चुनाव चिन्ह

पनामा पेपर लीक मामले के बाद जुलाई 2017 में पार्टी अध्यक्ष नवाज़ शरीफ़ को भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बीच पद छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा. सुप्रीम कोर्ट ने उन पर किसी सार्वजनिक पद पर बैठने को लेकर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया.

भले ही पार्टी नेतृत्व पूर्व तानाशाह ज़िया उल हक़ की सरपरस्ती में बढ़ा हो लेकिन ये पार्टी इस समय देश की ताक़तवर सेना से भिड़ी हुई है.

बीते सालों में पार्टी की राय काफ़ी बदली है. रूढ़िवादी और दक्षिणपंथी तथा एस्टेबलिशमेंट समर्थक दल से ये पार्टी अब एस्टेबलिशमेंट विरोधी और विकास पर केंद्रित उदारवादी दल में बदल गई है.

पद से हटाए जाने के बाद से नवाज़ शरीफ़ लगातार सेना और न्यापालिका पर टिप्पणियां कर रहे हैं और इन्हें ही खुद को प्रधानमंत्री पद से हटाने के लिए ज़िम्मेदार मानते हैं.

नवाज़ शरीफ़ भले ही चुनाव लड़ने के योग्य न हों लेकिन पीएमएल-एन के चुनाव अभियान का नेतृत्व वही कर रहे हैं.

उनकी बेटी मरियम नवाज़ ने उनका झंडा थामा हुआ है. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि सेना पीएमल-एन को नहीं, नवाज़ शरीफ़ को सत्ता से बाहर चाहती है.

लेकिन सेना हमेशा से ही राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोपों को नकारकर ख़ुद को तटस्थ बताती रही है.

हाल ही में पाकिस्तान की भ्रष्टाचार विरोधी अदालत ने नवाज़ शरीफ़ और मरियम नवाज़ को भ्रष्टाचार के एक मामले में दोषी क़रार देते हुए जेल भेजा है.

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Image caption इमरान ख़ान

पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई)

पीटीआई पाकिस्तान की मुख्य विपक्षी पार्टी है. पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेट कप्तान इमरान ख़ान ने साल 1996 में बदलाव का नारा देते हुए इस पार्टी का गठन किया था.

शुरुआत में ये पार्टी जन समर्थन हासिल करने में नाकाम रही थी. इमरान ख़ान पार्टी के इकलौते उम्मीदवार थे जिन्होंने 2002 आम चुनाव जीतकर संसद में जगह बनाई थी.

लेकिन अक्तूबर 2011 में इमरान ख़ान ने लाहौर में एक विशाल रैली करके राजनीतिक विरोधियों को चौंका दिया और पाकिस्तान की राजनीति के एक मज़बूत और शक्तिशाली क़िरदार बनकर उभरे.

कुछ अनुमानों के मुताबिक इमरान ख़ान की रैली में एक लाख से अधिक लोग जुटे थे जिनमें से अधिकतर पाकिस्तान के पढ़े-लिखे शहरी युवा थे.

पीटीआई पाकिस्तान को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के नारे के साथ आगे बढ़ी और सामाजिक बदलाव लाने का वादा किया. पार्टी स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक न्याय व्यवस्था सुधारकर एक जन कल्याणकारी राज्य स्थापित करने का वादा करती है.

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Image caption इमरान ख़ान की पार्टी पीटीआई

2013 के चुनावों में पीटीआई ने 75 लाख वोट हासिल किए और देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई. इमरान ख़ान केंद्र में तो सरकार नहीं बना सके लेकिन ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह प्रांत उनके हिस्से आ गया.

इमरान ख़ान ने नवाज़ शरीफ़ पर मतदान में छेड़छाड़ करने के आरोप लगाते हुए 2014 में नवाज़ शरीफ़ को पद से हटाने की मांग के साथ मार्च किया.

मार्च के बाद उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने इस्लामाबाद में छह महीने लंबा धरना दिया और नवाज़ शरीफ़ की सरकार बुरी तरह से हिल गई.

इमरान ख़ान नवाज़ शरीफ़ के सबसे कड़े आलोचकों में से हैं और उनकी पार्टी नवाज़ शरीफ़ पर भ्रष्टाचार के मामले दर्ज करवाने में भी मुख्य याचिकाकर्ता है.

इस मुक़दमे का नतीजा ये हुआ कि नवाज़ शरीफ़ पर आजीवन सार्वजनिक पद पर न बैठने का प्रतिबंध लग गया.

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Image caption बिलावल भुट्टो

पाकिस्तान पीपुल् पार्टी

पूर्व प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो ने साल 1967 में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का गठन किया था.

उन्होंने इसे वामपंथी समाजवादी पार्टी के तौर पर पेश किया. भुट्टो को सैन्य शासक ज़िया उल हक़ ने फांसी पर चढ़ा दिया था.

बाद में उनकी बेटी बेनज़ीर भुट्टो ने पार्टी का नेतृत्व किया और वो देश की प्रधानमंत्री बनी. फिलहाल उनके बेटे बिलावल भुट्टो के हाथ में पार्टी की कमान है.

अपने पिता को फांसी चढ़ाए जाने के बाद बेनज़ीर ने पार्टी की कमान संभाली और पाकिस्तान में लोकतंत्र बहाली का आंदोलन चलाया. 1988 में वो सत्ता तक पहुंचने में कामयाब रहीं.

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वो 1988 और 1993 में प्रधानमंत्री तो बनी लेकिन अपने कार्यकाल पूरे नहीं कर सकीं. 2008 में बेनज़ीर की हत्या के बाद पीपीपी फिर से सत्ता में आ गई.

लेकिन पार्टी की पकड़ ढीली होनी शुरू हो गई, ख़ासकर पंजाब में. धीरे-धीरे देश भर में पार्टी की धार कमज़ोर पड़ गई लेकिन सिंध में भी इस पार्टी का असर क़ायम है. सिंध के जागीरदारों और कामगारों दोनों में पार्टी के समर्थक हैं.

चुनावी विश्लेषकों का मानना है की पीपीपी भले ही केंद्र में सत्ता तक न पहुंच पाए लेकिन वो पीएमएल-एन और पीटीआई को प्रतिद्वंदिता तो देगी ही.

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Image caption पाकिस्तान में एक चुनावी रैली

धार्मिक पार्टियां

पाकिस्तान में धार्मिक पार्टियों का भी देशभर में मज़बूत आधार रहा है. धार्मिक पार्टियां कभी भी केंद्र में सत्ता तक नहीं पहुंच पाई हैं लेकिन केंद्रीय और प्रांतीय सरकारों में वो किंग-मेकर की भूमिका निभाती रही हैं. इस बार कई प्रमुख धार्मिक समूह चुनावों में हाथ आज़मा रहे हैं.

मुत्ताहिदा-मजली-ए-अमाल पांच धार्मिक पार्टियों का पुराना गठबंधन है और अब ये फिर से मैदान में है. एमएमए मुख्यधारा की पार्टियों के साथ गठबंधन में भी शामिल रहा है.

तहरीक-ए-लब्बैक या रसूलअल्लाह पाकिस्तान की ईशनिंदा विरोधी पार्टी है जिसने बीते साल नवंबर में इस्लामाबाद में बंद किया था.

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ये पार्टी भी चुनावों में सक्रिय है. ये पार्टी पूर्व क़ानून मंत्री ज़ाहिद हमीद का इस्तीफ़ा मांग रही थी. पार्टी ने उन पर ईशनिंदा के आरोप लगाए थे.

कनाडा स्थित धर्मगुरू अल्लामा ताहिर-उल-क़ादरी की पार्टी पाकिस्तान अवामी तहरीक भी इस बार चुनावों में सक्रिय है.

इसके अलावा भारत विरोधी जमात-उद-दावा के समर्थक भी चुनावों में सक्रिय हैं. हाफ़िज़ सईद के बेटे तलहा हाफ़िज़ भी एक गुमनान पार्टी अल्लाह-हू-अकबर तहरीक के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं.

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