क़बाइली इलाके में ताल ठोक रही हैं एक महिला

  • 23 जुलाई 2018
पाकिस्तान
Image caption 25 जुलाई 2018 को होने वाले आम चुनाव से पहले भी पाकिस्तान की महिला वोटरों के पंजीकरण का एक बड़ा अभियान शुरू किया गया है

हमीदा शाहिद इतिहास रचने जा रही हैं. वो पाकिस्तान के एक रूढ़िवादी जनजातीय क्षेत्र से संसदीय चुनाव लड़ रही हैं. ये इलाक़ा पाकिस्तान-अफ़गानिस्तान सीमा के पास है.

इस इलाक़े का नाम है दीर जो कभी तालिबान का गढ़ रहा है. कहा जाता है कि कुछ वक़्त पहले तक यहाँ की महिलाओं को वोट देने का अधिकार ही नहीं था.

हमीदा पूर्व क्रिकेटर इमरान ख़ान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक़-ए-इंसाफ़ के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं.

जब वो घर से बाहर क़दम रखती हैं तो इलाक़े के पुरुष नारे लगाते हैं, "पीटीआई ज़िंदाबाद". कुछ स्कूली बच्चे थोड़ी दूरी पर खड़े होकर उन्हें नज़रें थामकर देखते हैं.

हमीदा शाहिद कहती हैं, "मैंने सोचा कि अगर कोई महिला वोट दे सकती है, तो वो चुनाव भी लड़ सकती है. बस इसी बात ने मेरी सोच बदलकर रख दी."

पिछले साल ही पाकिस्तान के चुनाव आयोग ने दीर में हुए परिषद चुनावों के नतीजों को स्वीकार करने से मना कर दिया था. आयोग का कहना था कि किसी भी महिला ने चुनाव में वोट नहीं दिया, इसलिए इस रिज़ल्ट को स्वीकार नहीं किया जा सकता.

चुनाव आयोग के अनुसार, किसी भी निर्वाचन क्षेत्र में कम से कम 10 प्रतिशत महिलाओं का मतदान करना अनिवार्य है. वरना चुनाव को रद्द कर दिया जाता है.

हमीदा कहती हैं कि आयोग के इस फ़ैसले से उन्हें मदद मिली है. उन्होंने बताया, "मैं सभी महिलाओं से मिल रही हूँ. भले ही वो मेरी पार्टी की समर्थक हों या नहीं. ज़्यादातर महिलाएं कहती हैं कि वो मुझे ही वोट देंगी. वो इस बात से ख़ुश हैं कि उन्हें वोट देने की आज़ादी मिली और वो चाहती हैं कि मैं जीतकर संसद में एक महिला सीट पक्की करूँ."

Image caption हमीदा पूर्व क्रिकेटर इमरान ख़ान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक़-ए-इंसाफ़ के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं

लंबा इतिहास

दीर इलाक़े से वो पहली महिला प्रत्याशी हैं. और दिलचस्प बात ये है कि इलाक़े के पुरुष भी उनके साथ खड़े हैं.

पार्टी के कुछ पुरुष सदस्यों ने उन्हें पाकिस्तान तहरीक़-ए-इंसाफ़ के रंग का एक स्कार्फ़ भेंट किया है. चुनाव प्रचार के दौरान हमीदा अक्सर उसे गले में डाले रहती हैं.

लेकिन ये सिर्फ़ दीर इलाक़े की ही बात नहीं है, जहाँ महिलाओं के वोट देने पर पहले रोक थी. पाकिस्तान के सबसे विकसित समझे जाने वाले पंजाब प्रांत में भी कई इलाक़े थे जहाँ स्थिति कमोबेश ऐसी ही रही है.

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से महज़ 150 किलोमीटर दूर धुरनाल गाँव है. यहाँ महिलाओं को वोटिंग से रोकने का लंबा इतिहास रहा है.

एक दफ़ा 1962 में मतदान के दिन झगड़ा हो गया था. इसमें गाँव की महिलायें भी शामिल थीं. तभी से गाँव के पुरुषों का मानना है कि महिलायें उनके सम्मान को ठेस पहुँचाती हैं और झगड़े के कारण गाँव के पुरुषों का अपमान हुआ.

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इस घटना के बाद गाँव की महिलाओं के वोट डालने पर प्रतिबंध लगा दिया गया.

क़रीब पचास साल हो चुके हैं इस घटना को, लेकिन आज भी कई इलाक़ों में महिलाओं के वोट डालने पर बैन लगा हुआ है.

धुरनाल गाँव पोथोगर पठार की तलहटी में स्थित है. यहाँ क़रीब पंद्रह हज़ार लोग रहते हैं. ज़्यादातर लोग खेती करते हैं. मूंगफ़ली की खेती के लिए भी धुरनाल की एक अलग पहचान है.

यहाँ लोगों के घर काफ़ी बड़े हैं और उन्हें सीमेंट और ईंटों से बनाया गया है. इस गाँव की साक्षरता दर भी बाक़ी खेतिहर गाँवों की तुलना में ज़्यादा है.

यहाँ सभी लोग अपने काम धंधे में लगे हैं. लेकिन जब गाँव के पास एक जवां महिला से बात की, जो इस बार वोट डालना चाहती हैं, तो उनके तनाव के बारे में पता चला.

कोई महिला वोटर नहीं

सामाजिक दबाव इतना ज़्यादा है कि वो अपना नाम तक बताने को तैयार नहीं थीं.

बहरहाल, उन्होंने बताया, "मैंने अपने जीवन में किसी महिला को वोट डालते हुए नहीं देखा. गाँव के पुरुषों को पसंद नहीं है कि उनके घर की औरतें वोट डालने जायें. ये यहाँ एक परंपरा बन चुकी है."

इसके बाद वो बोलीं, "गाँव में एक भी ऐसा मर्द नहीं है जो ख़ुलकर ये कह सके कि महिलाओं को भी वोटिंग का अधिकार मिलना चाहिए. कोई समाज से टक्कर नहीं लेना चाहता."

इससे पता चलता है कि पिछले चुनाव में इलाक़े के 17 मतदान केंद्रों में से एक में भी कोई महिला वोट डालने क्यों नहीं आयी.

लेकिन गाँव की महिलाएं इन हालात को बदलना चाहती हैं. कुछ ग़ैर सरकारी संस्थाएं भी इस इलाक़ें में काम कर रही हैं. वो महिलाओं के एक समूह को मतदान के महत्व के बारे में समझाने की कोशिश कर रहे हैं.

नाहिदा अब्बासी ऐसे ही एक संगठन की क्षेत्रीय प्रबंधक हैं. उनके मुताबिक़ वो बीते दस सालों से इलाक़े के पुरुषों को मनाने की कोशिश कर रही हैं कि वो महिलाओं को मतदान करने दें.

Image caption नाहिदा अब्बासी एक संगठन की क्षेत्रीय प्रबंधक हैं

महिलाओं के लिए अलग मतदान केंद्र

वो कहती हैं कि पुरुषों की अनुमति के बिना गाँव की औरतों तक पहुँचना और उनसे बात करना ही अपने आप में एक बड़ी चुनौती है.

नाहिदा के संगठन के बैनर पर लिखा है, "वोट आपकी शक्ति है और आपका भविष्य इसी पर निर्भर है." वो अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रही हैं कि महिलाओं को वो मतदान केंद्रों तक ला सकें.

एक महिला जो नाहिदा से सहमत नहीं है, वो उनसे पूछती है, "हमारी सभी ज़रूरतों का ख़्याल रखा जाता है. घर के पुरुष कहते हैं कि इसके लिए हमें बाहर जाने की ज़रूरत नहीं है. वहाँ हमें अपमानित ही किया जायेगा. वैसे भी मतदान के दिन मतदान केंद्रों पर मर्दों की भीड़ लगी होती है. उनके बीच जाकर धक्के खाने से बेहतर है कि हम घर पर ही रहें."

नाहिदा अब्बासी उनकी पूरी बात सुनने के बाद उन्हें समझाती हैं कि पाकिस्तान के चुनाव आयोग ने ये फ़ैसला किया है कि धुरनाल जैसे रूढ़िवादी इलाक़ों में महिलाओं के लिए अलग मतदान केंद्र स्थापित किये जायेंगे.

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वो कहती हैं, "धुरनाल में महिलाओं को न तो ये समझ है कि वोट कैसे दिया जाता है और न ही उनमें राजनीतिक जागरूकता है. उन्हें हमेशा राजनीति से दूर रखा गया है. गाँवों के पुरुष चाहते हैं कि महिलाएं चुनावी प्रक्रिया से बाहर ही रहें. इसीलिए प्रत्याशी भी महिलाओं की माँगों को सुनने के लिए उनके बीच नहीं जाते."

पास की ही एक मस्जिद में मौलवी काज़ी हफ़ीज़ अली नमाज़ का नेतृत्व कर रहे हैं. काज़ी का गाँव के पुरुषों पर बड़ा प्रभाव समझा जाता है. वो कहते हैं कि महिलाओं के वोट देने पर कोई रोक नहीं है, ये सब बातें ग़लत हैं. जबकि महिलाओं ने बीबीसी से बात करते हुए एक दूसरी तस्वीर का ज़िक्र किया था.

काज़ी हफ़ीज़ अली कहते हैं, "किसी ने कभी महिलाओं को वोट डालने से नहीं रोका. कुछ साल पहले एक विवाद हुआ था बस. इस गाँव में और भी बहुत झगड़े हैं और अधिकांश मामलों में मूल कारण महिलायें ही हैं. शायद इसीलिए लोग महिलाओं को मतदान करने से रोकते हैं. लेकिन ये स्थिति अब बदल रही है."

ख़ैर, धुरनाल के चुनाव अभियान में पुरुषों का ही प्रभुत्व बना हुआ है. इस इलाक़े से इमरान ख़ान की पार्टी के उम्मीदवार अमर यासिर चुनाव लड़ रहे हैं. हमने उनकी रैली में भाग लिया. इस रैली को पुरुषों का सैलाब कहा जाये, तो ग़लत नहीं होगा.

Image caption पीटीआई उम्मीदवार अमर यासिर

पुरुष कर रहे हैं समीक्षा

अमर यासिर कहते हैं कि वो महिलाओं को वोटिंग से रोकने के फ़ैसले से सहमत नहीं हैं. हालांकि किसी भी उम्मीदवार ने इस स्थिति को बदलने के बारे में अभी तक कुछ नहीं कहा है.

यासिर कहते हैं, "मैंने उन क्षेत्रों का दौरा किया है जहाँ महिलाओं को मतदान से रोका जाता है. इसे लेकर मैं कई स्थानीय बुजुर्गों के संपर्क में हूँ. वो कहते हैं कि वो इसकी समीक्षा कर रहे हैं."

कुछ लोगों का कहना है कि अगर महिलाएं अब भी इस बात का इंतज़ार करती रहीं कि कुछ पुरुष ही उनके लिए लड़ेंगे तो वो हमेशा के लिए अपने अधिकारों से वंचित रह जायेंगी.

हालांकि पाकिस्तान के चुनाव आयोग ने महिलाओं को चुनाव में भागीदार बनाने के कई प्रयास किये हैं. हर सीट पर अनिवार्य रूप से 10 प्रतिशत महिला वोटर होने का नियम भी पिछले साल बनाया गया.

25 जुलाई को होने वाले आम चुनाव से पहले भी पाकिस्तान की महिला वोटरों के पंजीकरण का एक बड़ा अभियान शुरू किया गया है. माना जा रहा है कि इस अभियान की मदद से पहले की तुलना में तीस लाख अतिरिक्त महिलाएं वोट दे सकेंगे.

एक अनुमान के मुताबिक़, पाकिस्तान में अभी भी 90 लाख से अधिक महिलायें मतदान के अधिकार से वंचित हैं.

Image caption चुनाव आयोग की अतिरिक्त महानिदेशक निगहत सिद्दीक

पाकिस्तान के चुनाव आयोग की अतिरिक्त महानिदेशक निगहत सिद्दीक कहती हैं, "हमने पाया है कि महिलाएं भी आगे आ रही हैं और वे भी चुनाव में भाग लेना चाहती हैं. हम उनकी मदद कर रहे हैं ताकि वो बाहर आयें. पुरुषों से भी हम बात कर रहे हैं. हमें भरोसा है कि नतीजा अच्छा होगा. जिन इलाक़ों में कम से कम 10 प्रतिशत महिलाओं को भी वोटिंग का मौक़ा नहीं मिलेगा, हम वहाँ दोबारा वोटिंग कराने का आदेश देंगे."

पाकिस्तान में महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाली कार्यकर्ताओं ने कई सालों तक महिलाओं को वोटिंग में बराबर का अधिकार देने की वक़ालत की है.

पर अब जाकर ये हवा बनी है कि महिलाओं के वोटिंग के अधिकार की अब अनदेखी नहीं की जा सकती.

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