नज़रिया: भारत को इमरान जितना जानते हैं, पाकिस्तान का कोई नेता नहीं जानता

  • 27 जुलाई 2018
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पाकिस्तान को 1992 के क्रिकेट वर्ल्ड कप में जीत दिलाने वाले कप्तान और तहरीक़-ए-इंसाफ़ पार्टी के प्रमुख इमरान ख़ान ने आम चुनाव में जीत का दावा किया है.

अब तक आए नतीजों और रुझान में उनकी पार्टी बहुमत से कुछ सीट पीछे है. इमरान ख़ान कुछ छोटी पार्टियों के साथ मिल कर सरकार बना सकते हैं.

पाकिस्तान में बुधवार (25 जुलाई ) को केंद्रीय असेंबली की 270 सामान्य सीटों के लिए मतदान हुए.

इमरान ख़ान ने गुरुवार को प्रेस कॉन्फ़्रेंस की और कहा कि वो पाकिस्तान को उस तरह का मुल्क बनाने चाहते हैं जहां एक कमज़ोर भी उनके साथ खड़ा हो सके.

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उन्होंने पाकिस्तान में क़ानून का शासन स्थापित करने का भी वादा किया.

इमरान ख़ान ने देश में व्यापार और निवेश बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करने की बात की और कहा कि वो चाहते हैं कि पाकिस्तानी मुद्रा की स्थिति को दुरुस्त किया जाए.

माना जाता है कि पाकिस्तान का पड़ोसी होने के कारण वहां के हालात का सीधा असर भारत पर पड़ सकता है.

इमरान ख़ान ने अपने भाषण में ये संकेत दिया है कि भारत और पाकिस्तान के रिश्ते अच्छे होंगे तो ये दोनों देशों के लिए बेहतर होगा.

भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के बाद से दोनों मुल्कों में हमेशा से तनाव रहा है और ऐसे में आने वाले वक्त में भारत के साथ पाकिस्तान के संबंधों की दिशा कैसी रहेगी इस ओर सभी की निगाहें हैं.

इमरान ख़ान ने कहा, "मैं चाहता हूं कि हमारे व्यापारिक संबंध और बेहतर हों. कश्मीर में जो हालात हैं, वहां के लोगों ने जो झेला है, हमारी कोशिश होगी कि दोनों देश एक साथ बैठ कर तय करें कि वहां की स्थिति कैसे बेहतर की जाए."

इमरान ख़ान ने माना कि दोनों देश एक दूसरे को ही ज़िम्मेदार ठहराते आए हैं, लेकिन ये ख़त्म होना चाहिए और दोनों मुल्कों में दोस्ती होनी चाहिए.

अभियान में चाहे जो कहें, बात करनी ही पड़ती है

बीबीसी से बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार सुहासिनी हैदर ने उम्मीद जताई कि हो सकता है कि इमरान ख़ान के सत्ता में आने के बाद भारत-पाकिस्तान के रिश्ते एक बार फिर से पटरी पर आ जाएं. हालांकि पुख्ता तौर पर कुछ कहना मुश्किल काम है.

वो मानती हैं कि इस बार पाकिस्तान में युवाओं और नए वोटरों ने एक नई सोच और विकास के वादों को चुना है.

यहाँ धार्मिक रुझान रखने वाली पार्टियों और कट्टरपंथ की तरफ रुझान रखने वाली पार्टियों को चुनाव में अधिक फायदा होता नहीं दिखा है. लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफ़िज़ सईद की नई पार्टी अल्लाह हू अक़बर तहरीक़ पार्टी ने चुनाव में कुल 265 उम्मीदवार खड़े किए थे. लेकिन इनमें से कोई भी जीत हासिल नहीं कर सका.

धार्मिक मानी जाने वाली पार्टियों के गठबंधन मुत्ताहिदा मजलिसे-अमल को भी दस से कम सीटों पर बढ़त मिली है.

सुहासिनी के मुताबिक पाकिस्तान में विपक्ष, पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की पार्टी मुस्लिम लीग (नवाज़) और आसिफ़ अली ज़रदारी की पीपुल्स पार्टी पर भारत के करीबी होने का आरोप लगाता रहा है, लेकिन सत्ता संभालने के बाद स्थितियां बदलेंगी.

इमरान ख़ान जब वोट देकर बूथ से बाहर निकले थे तब उन्होंने कहा था, "नवाज़ शरीफ़ भारतीय प्रधानमंत्री मोदी और भारतीय मीडिया के पसंदीदा हैं."

बुधवार को एक ट्वीट में उनकी पार्टी पीटीआई ने लिखा था, "नवाज़ शरीफ़ ने हमारे सुरक्षाबलों पर हमले करने वाली बाहरी ताकतों की हरसंभव मदद करने की कोशिश की है. मोदी नवाज़ शरीफ़ को पसंद करते हैं लेकिन देश की फ़ौज को नहीं."

सुहासिनी हैदर ने कहा , "इमरान ख़ान अपने चुनाव अभियान के दौरान कहते रहे हैं कि मैं अगर प्रधानमंत्री बना तो स्वतंत्र पीएम बनूंगा और पाकिस्तान के हक़ में बात करूंगा."

"लेकिन प्रधानमंत्री कोई भी बने कुछ वक्त के बाद वो भारत के साथ किसी ना किसी तरीके से बात करता ही है."

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इमरान भारत को बेहतर जानते हैं

अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इमरान ख़ान की छवि एक क्रिकेटर के तौर पर अच्छी है लेकिन एक नेता के तौर पर उन्हें 'तालिबानी ख़ान' कहा जाता है. उनकी इस छवि का असर क्या सरकार पर पड़ सकता है?

इस सवाल पर सुहासिनी हैदर कहती हैं, "ये बात सच है कि उन्हें वामपंथी और पॉपुलिस्ट नेता कहा जाता है. लेकिन फिलहाल इस दौर में दुनिया के कई देशों, जैसे अमरीका, तुर्की, ब्रिटेन में दक्षिणपंथ का उभार देखा जा रहा है. भारत में बीजेपी के उभरने को इसी कड़ी में देखा जा सकता है और इमरान ख़ान भी इसी मॉडल में फिट होते हैं. वो कट्टरपंथियों और युवाओं दोनों को साथ ले कर चलते हैं."

"लेकिन देखा जाए तो भारत के साथ सबसे लंबा और बेहतर संबंध रखने वाले इमरान ख़ान ही हैं, पहले क्रिकेटर के तौर पर और फिर एक कमेंटेटर के तौर पर वो भारत से जुड़े रहे हैं. ये कहा जा सकता है कि भारत के बारे में वो जितना जानते हैं शायद कोई और पाकिस्तानी नेता नहीं जानता होगा."

वो कहती हैं कि ये बात भी सच है कि क्रिकेटर और जानकार के तौर पर भारत के साथ संबंध रखना एक मुल्क के नेता के तौर पर संबंध रखने से अलग है.

प्रधानमंत्री बनने के बाद एक राजनेता के तौर पर इमरान ख़ान का भारत के प्रति क्या रवैया रह सकता है ?

इस पर सुहासिनी हैदर कहती हैं, "एक नेता के तौर पर वो कोई एजेंडा ले कर काम नहीं कर सकते. मौजूदा वक़्त में ये ज़रूर होना चाहिए कि पहले जानें कि वहां फिलहाल प्रशासन क्या चाहता है. ख़ास कर तब जब पाकिस्तान सरकार हमेशा से कहती आई है कि भारत के साथ उनकी विदेश नीति में सेना की भूमिका अहम होती है."

ये भी ग़ौर करने वाली बात है कि इस तरह के आरोप पहले से ही लगते रहे हैं कि पाकिस्तान की राजनीति में, ख़ास कर विदेश नीति में सेना का हस्तक्षेप मायने रखता है."

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Image caption 11 दिसंबर 2015 को इमरान ख़ान ने दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी से मुलाक़ात की थी. दोनों के बीच और घनिष्ठ संबंध बनाने पर बात हुई थी.

व्यापार बढ़ान चाहते थे इमरान ख़ान

ये भी नहीं भूला जा सकता है कि 2015 में जब इमरान ख़ान भारत आए थे और उन्होंने मोदी से मुलाक़ात की थी उन्होंने दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाने और द्विपक्षीय बातचीत बढ़ाने पर ज़ोर दिया था.

सुहासिनी हैदर कहती हैं, "इससे पहले इमरान ने एक बार ये भी कहा था कि पूर्व प्रधानमंत्री परवेज़ मुशर्रफ़ के शासन के दौरान भारत-पाकिस्तान रिश्तों को भी एक बार फिर से देखा जाना चाहिए."

माना जाए तो मुशर्रफ़ के शासनकाल के दौरान दोनों देशों के बीच दोस्ती बढ़ी थी. दोनों देशों के बीच तनाव होने के बावजूद इस दौरान कई बार बातचीत हुई थी. मुशर्रफ़ इस दौरान आगरा में दो दिवसीय सम्मेलन के लिए भी पहुंचे थे.

"रही बात पाकिस्तानी सेना का तो ये बात याद रखनी पड़ेगी कि वहां जो भी चुनाव जीत के आएगा उसे कहीं ना कहीं सेना का समर्थन होगा ही. वहां पर सेना की भूमिका काफी अहम मानी जाती है."

"इमरान ख़ान पर भी सेना की पसंदीदा उम्मीदवार होने का आरोप लगा है. लेकिन फिर भी भारत को प्रशासन और सेना दोनों से ही बातचीत आगे बढ़ानी होगी."

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Image caption 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अफ़ग़ानिस्तान से लौटते हुए नवाज़ शरीफ़ से मिलने के लिए अचानक लाहौर में उतर गए थे

मोदी के चुनावी अभियान को याद करें तो अभियान में उन्होने पाकिस्तान के बारे में कई बातें कहीं और सरकार की विदेश नीति की भी आलोचना की.

लेकिन जब वो नेता बन कर आए तो उन्होंने एक अलग तरह की कूटनीत दिखाई. कभी वो अचानक पाकिस्तान जा कर नवाज़ शरीफ़ से मिले तो कभी उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बैठकों के दौरान उनसे बात नहीं की.

फिलहाल नहीं कहा जा सकता कि दोनों रिश्ते किस करवट बैठेंगे लेकिन काफी कुछ नेता के अपने रवैये पर भी निर्भर होता है.

('द हिंदू' की रेज़िडेंट एटिडर और कूटनीतिक मामलों की जानकार सुहासिनी हैदर से बात की बीबीसी संवाददाता इक़बाल अहमद है.)

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